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Tuesday, 17 February 2026

रत्न धारण कैसे करें?

Jyotishgurumk बृहद संहिता पुराणों पर आधारित आचार्य वाराहमिहिर द्वारा स्वरचित सुन्दर ग्रन्थ है। वाराहमिहिर के इस ग्रन्थ में रत्नों की उत्पत्ति व गुण दोषों का सुन्दर वर्णन मिलता है। इसके अलावा रत्न के विषय में अनेक ग्रंथों में वर्णन है । 👉 रत्न धारण करने से ना शुभता आती है ना अशुभता आती है । रत्नों के माध्यम से ग्रहों से संबंधित रश्मि या ऊर्जा की मात्रा में वृद्धि किया जाता है । 👉 जन्म कुंडली विश्लेषण के अनुसार यदि कोई ग्रह हमें लाभ देने वाले हैं या हमारे जीवन में उनका बहुत ज्यादा महत्व है यदि वह कमजोर हैं , तब उनके बल में वृद्धि करने के लिए रत्न धारण किया जाता है । जिससे हमें पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके । 👉 मुख्यतः ग्रह अंश बल , स्थान बल , पक्ष बल ( और भी कई प्रकार से ग्रहों का बल देखा जाता है ) में कमजोर होते हैं या 6 , 8 , 12 भाव में चले जाते हैं तब कमजोर होते हैं या नीच राशि में विराजमान होते हैं तब कमजोर होते हैं । अब ऐसी स्थिति में उन ग्रहों से संबंधित लाभ लेने के लिए रत्न धारण किया जाता है । 👉 परंतु रत्न धारण करते समय यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जो ग्रह कमजोर है उसकी दृष्टि किस राशि एवं किस ग्रह पर पड़ रही है । यदि वहां दृष्टि डालकर वह परेशानी का योग बना रहे हैं या जहां विराजमान है वहां के अनुसार भी परेशानी का योग बना रहे हैं तब रत्न धारण नहीं करेंगे बल्कि उसका मंत्र जाप इत्यादि करेंगे । 👉 यदि कोई ग्रह बल में कमजोर नहीं है तो उसका रत्न धारण नहीं करना चाहिए उससे आपको कोई लाभ नहीं होगा । 👉 कुछ लोग जिन्होंने कभी कोई रत्न धारण नहीं किया है ना करवाया है । रत्न ज्योतिष का कोई ज्ञान नहीं है ना ही उसका कोई एक्सपीरियंस है ऐसे लोग लोगों को भड़काते रहते हैं कि 6 , 8 , 12 में चला गया तो उसका रत्न मत धारण करो । नीच राशि में विराजमान ग्रह का रत्न धरण मत करो जबकि मैंने सैकड़ो लोगों को 6 , 8 , 12 भाव में गए ग्रह का धारण करवाया है । मैं स्वयं 12 भाव में विराजमान ग्रह का रत्न धारण किया हूं । और श्रेष्ठ लाभ प्राप्त हुआ है । 👉 परंतु बिना संपूर्ण विश्लेषण के किसी भी ग्रह का रत्न धारण नहीं किया जा सकता है । क्योंकि रत्न धारण करने से पहले ग्रहों के फलादेश को समझना आवश्यक है । ♦️ यहां दो वृष लग्न की कुंडली पोस्ट किया गया है । पहली कुंडली में शनि द्वादश भाव में नीच राशि में विराजमान है । वह किसी ग्रह पर दृष्टि डालकर पीड़ित नहीं कर रहा है । इसलिए इसका रत्न धारण किया जा सकता है । दूसरी कुंडली में शनि द्वितीय भाव में सूर्य एवं मंगल पर दृष्टि डाल रहे हैं । जिसके कारण धन , कुटुंब , माता , भूमि , भवन एवं वैवाहिक जीवन में परेशानी का योग बनेगा । अतः यहां पर शनि का रत्न नहीं धारण कर सकते हैं । यहां हम उसका मंत्र जाप कर सकते हैं या लोहे का छल्ला धारण कर सकते हैं । 👉 अब यदि दोनों व्यक्ति नीलम धारण करेंगे तो अपना-अपना अनुभव बताएंगे । एक बोलेगा मुझे तो लाभ हुआ दूसरा बोलेगा मुझे हानि हुई । अब दूसरा सब लोगों को भड़काएगा की 12 भाव में विराजमान ग्रह का रत्न नहीं धारण करना चाहिए हानि पहुंचती है । जबकि वह अपनी कुंडली का विश्लेषण नहीं चेक कर रहा है कि क्यों परेशानी हो रही है । 🔹🔹🔹🔹🔹 जन्मकुंडली का संपूर्ण विश्लेषण करवाना चाहते हैं तो मेरा Website देखें । एवं फोन करें 👇 https://whatsapp.com/channel/0029VbBKJUV2phHULNytR638 Mo - 9333112719

Tuesday, 18 February 2025

राशि अनुसार विवाह के उपाय, तुरंत बनेंगे विवाह के योग।

आप में से कई लोग ऐसे होंगे, जो विवाह तो करना चाह रहे हैं लेकिन विवाह होने में कोई ना कोई परेशानी बनी रहती है। Jyotish Guru Mk, Astrology or Vastu Resolve, whatsapp. 9333112719 . कुछ लोग ऐसे होते हैं,जीवनसाथी तो मिल गया है लेकिन विवाह में समस्या आ रही है। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके विवाह में ऐन मौके पर कोई ना कोई अड़चन आ रही है,इस वजह से विवाह में देरी हो रही है। शास्त्र के अनुसार, किसी भी जातक की कुंडली में विवाह का कारक भाव *सप्तम भाव* को माना गया है। सप्तम भाव के कारक ग्रह शुक्र और गुरु ग्रह हैं। जब व्यक्ति की कुंडली में शुक्र और गुरु की अवस्था सही नहीं होती है तो विवाह में दिक्कतें आती हैं। इसके अलावा अगर सप्तम भाव राहु, केतु और शनि जैसे पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो भी व्यक्ति के विवाह में कोई ना कोई परेशानी रहती है। ऐसे में राशि अनुसार उपाय करेंगे तो आपकी समस्या का जल्द समाधान मिलेगा। जानते हैं शीघ्र विवाह के लिए राशि अनुसार कौन से उपाय करें.... मेष राशि:- मेष राशि के स्वामी मंगल ग्रह हैं इसलिए मेष राशि के व्यक्ति शिवालय में जाकर *माता गौरी* को गुड़ अर्पित करें और गुड़ के प्रसाद के तौर पर ग्रहण भी कर लें। ऐसे में विवाह के शुभ योग बनने लग जाते हैं। वृष राशि:- वृष राशि के स्वामी शुक्र ग्रह हैं इसलिए वृष राशि वाले *माता गौरी *को पीपल का पत्ता अर्पित करें। ऐसा करने से विवाह संबंधी समस्याएं दूर हो जाएंगी और शीघ्र विवाह के योग बनने लग जाएंगे। मिथुन राशि:- मिथुन राशि के स्वामी बुध ग्रह हैं इसलिए मिथुन राशि वाले *माता गौरी को हरे रंग* का धागा अर्पित करें और फिर उसको अपने पास रखें। ऐसा करने से योग्य जीवनसाथी मिलेगी और विवाह में आ रही परेशानियां दूर होंगी। कर्क राशि:- कर्क राशि के स्वामी चंद्र ग्रह हैं इसलिए कर्क राशि वाले माता गौरी को *पीपल के पत्ते पर सिंदूर* लगाकर अर्पित करें। ऐसा करने से विवाह संबंधी परेशानियां खत्म होंगी और माता गौरी की कृपा से विवाह के शुभ योग भी बनने लग जाएंगे। सिंह राशि:- सिंह राशि के स्वामी सूर्यदेव हैं इसलिए सिंह राशि *माता मंगला गौरी को लाल धागा* अर्पित करें और फिर उस धागे को अपने पास रखें। ऐसा करने से विवाह संबंधी समस्या दूर होगी और योग्य जीवनसाथी मिलेगा। कन्या राशि:- कन्या राशि के स्वामी बुध ग्रह हैं इसलिए कन्या राशि वाले जातक को *ॐ गौरी शंकराय नमः* मंत्र का सुबह शाम 108 बार जप करें। ऐसा करने से विवाह और वैवाहिक जीवन में जो भी परेशानियां चल रही हैं, वे सभी दूर हो जाएंगी। तुला राशि:- तुला राशि के स्वामी शुक्र ग्रह हैं इसलिए तुला राशि के जातक *माता मंगला गौरी को मसूर दाल* अर्पित करें और इसके बाद मसूर दाल के कुछ दाने अपने पास रख लें। ऐसा करने से जिनकी शादी नहीं हो रही है, उनकी शादी जल्द हो जाएगी और दांपत्य जीवन में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे। वृश्चिक राशि:- वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल ग्रह हैं इसलिए वृश्चिक राशि वाले हर रोज शाम के समय *चमेली के तेल* का दीपक जलाएं। ऐसा करने से विवाह के शीघ्र योग बनने लग जाते हैं। धनु राशि:- धनु राशि के स्वामी बृहस्पति ग्रह हैं इसलिए धनु राशि वाले हर रोज *मंगला गौरी स्तोत्र* का पाठ करें। ऐसा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होगी और शादी विवाह में आ रही परेशानियों से मुक्ति मिलेगी। मकर राशि:- मकर राशि के स्वामी शनि ग्रह हैं इसलिए मकर राशि वाले किसी शिवालय में जाकर *देवी मंगला गौरी* को *लाल चुनरी* अर्पित करें। ऐसा करने से जीवन में शुभता आएगी और शीघ्र विवाह के योग बनने लग जाते हैं। कुंभ राशि:- कुंभ राशि के स्वामी शनि ग्रह हैं इसलिए कुंभ राशि वाले *पान के पत्ते में सिंदूर* लगाकर माता *मंगला गौरी *को अर्पित करें। ऐसा करने से माता की आप पर विशेष कृपा होगी और शादी में आ रही बाधा दूर होंगी। मीन राशि:- मीन राशि के स्वामी गुरु ग्रह हैं इसलिए मीन राशि वाले देवी माता के मंदिर में *माता के चरणों में सिंदूर* अर्पित करें। ऐसा करने से समस्याओं से छुटकारा मिलेगा। किसी भी समस्या के समाधान के लिए सम्पर्क करें व्हाट्सऐप नंबर 9333112719 पर। हमारे प्रसिद्ध ज्योतिष गुरु के द्वारा सटीक मार्गदर्शन देंगे। धन्यवाद 🙏

Monday, 23 January 2023

संतान सुख की प्राप्ति किस ग्रह के कारण होते हैं?

संतान सुख में कौन से ग्रह बाधक बनते हैं? नीचे पढ़ें समाधान @
JyotishGuru Mk http://asthajyotish.in WhatsApp now 9333112719 एक कुशल ज्योतिषी व्यक्ति के जन्मांग से ज्योतिष के द्वारा उसके भूत, भविष्य, प्रकृति और चरित्र को जान लेता है। जन्मांग व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का दर्पण होता है। कुंडली के बाहर भाव जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से संबंधित रहते हैं लेकिन मैं यहां केवल पंचम भाव से संबंधित संतान क्षेत्र को ही पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं। बुद्धि प्रबंधात्मजमंत्र विद्या विनेयगर्भ स्थितिनीति संस्था:। सुताभिधाने भवने नराणां होरागमज्ञै: परिचिन्तनीयम्।। जातकाभरणम् बुद्धि, प्रबंध, संतान, मंत्र (गुप्त विचार), गर्भ की स्थिति, नीति आदि शुभाशुभ विचार पंचम भाव से करना चाहिए। पंचम भाव की राशि एवं पंचमेश, पंचमेश किस राशि एवं स्थान में बैठा है तथा उसके साथ कौन-कौन से ग्रह स्थित हैं। पंचम भाव पर किन-किन ग्रहों की दृष्टि है, पुत्र कारक गुरु, नवम भाव तथा नवमेश की स्थिति, नवम भाव पंचम से पंचम होता है। अत: यह पोते का स्थान भी कहलाता है। पंचम भाव के स्वामी पर किन-किन भावेशों की दृष्टि है, पंचमेश कारक है या अकारक, सौम्य ग्रह है या दृष्ट ग्रह तथा पंचम भाव से संबंधित दशा, अंतर्दशा और प्रत्यंतदशा आदि। संतानधिपते: पञ्चषष्ठरि: फस्थिवेखले। पुत्रोभावो भवेत्तस्य यदि जातो न जीवति।। पंचमेश से 5/6/10 में यदि केवल पापग्रह हो तो उसको संतान नहीं होती, हो भी तो जीवित नहीं रहती हैं। मंदस्य वर्गे सुतभाव संस्थे निशाकरस्थेऽपि च वीक्षितेऽमिन्। दिवाकरेणोशनसा नरस्क पुनर्भवासंभव सूनुलब्धे:।। पंचम भाव में शनि के वर्ग हों तथा उसमें चंद्रमा बैठा हो और रवि अथवा शुक्र से दृष्ट हो तो उसको पौनर्भ व (विधवा स्त्री से विवाह करके उत्पन्न) पुत्र होता है। नवांशका: पंचम भाव संस्था यावन्मितै : पापखगै:द्रदृष्टा:। नश्यंति गर्भ: खलु तत्प्रमाणाश्चे दीक्षितं नो शुभखेचरेंद्रे :।। पंचम भाव नवमांश पर जितने पापग्रह की दृष्टि हो उतने गर्भ नष्ट होते हैं किन्तु यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो। भूनंदनों नंदनभावयातो जातं च जातं तनयं निहन्ति। दृष्टे यदा चित्र शिखण्डिजेन भृगो: सुतेन प्रथमोपन्नम्।। पंचम भाव में केवल मंगल का योग हो तो संतान बार-बार होकर मर जाती है। यदि गुरु या शुक्र की दृष्टि हो तो केवल एक संतति नष्ट होती है और अन्य संतति जीवित रहती है। बंध्या योग, काक बंध्या योग, विषय कन्या योग, मृतवत्सा योग, संतित बाधा योग एवं गर्भपात योग स्त्रियों की कुंडली में होकर उन्हें संतान सुख से वंचित कर देते हैं। इस प्रकार के कुछ योग निम्रलिखित हैं : लगन और चंद्र लगन से पंचम एवं नवम स्थान से पापग्रहों के बैठने से तथा उस पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। लगन, पंचम, नवम तथा पुत्रकारक गुरु पर पाप प्रभाव हो लगन से पंचम स्थान में तीन पाप ग्रहों और उन पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। आठवें स्थान में शनि या सूर्य स्वक्षेत्री हो। तीसरे स्थान पर स्वामी तीसरे ही स्थान में पांचवें या बारहवें में हो और पंचम भाव का स्वामी छठे स्थान में चला गया हो। जिस महिला जातक की कुंडली में लगन में मंगल एवं शनि इकट्ठे बैठे हों। लगन में मकर या कुम्भ राशि हो। मेष या वृश्चिक हो और उसमें चंद्रमा स्थित हो तथा उस पर पापग्रहों की दृष्टि हो। पांचवें या सातवें स्थान में सूर्य एवं राहू एक साथ हों। पांचवें भाव का स्वामी बारहवें स्थान में व बारहवें स्थान का स्वामी पांचवें भाव में बैठा हो और इनमें से कोई भी पाप ग्रह की पूर्ण दृष्टि में हो। आठवें स्थान में शुभ ग्रह स्थित हो साथ ही पांचवें तथा ग्यारहवें घर में पापग्रह हों। सप्तम स्थान में मंगल-शनि का योग हो और पांचवें स्थान का स्वामी त्रिक स्थान में बैठा हो। पंचम स्थान में मेष या वृश्चिक राशि हो और उसमें राहू की उपस्थिति हो या राहू पर मंगल की दृष्टि हो। शनि यदि पंचम भाव में स्थित हो और चंद्रमा की पूर्ण दृष्टि में हो और पंचम भाव का स्वामी राहू के साथ स्थित हो। मंगल दूसरे भाव में, शनि तीसरे भाव में तथा गुरु नवम या पंचम भाव में हो तो पुत्र संतान का अभाव होता है। यदि गुरु-राहू की युति हो। पंचम भाव का स्वामी कमजोर हो एवं लग्न का स्वामी मंगल के साथ स्थित हो अथवा लगन में राहू हो, गुरु साथ में हो और पांचवें भाव का स्वामी त्रिक स्थान में चला गया हो। पंचम भाव में मिथुन या कन्या राशि हो और बंधु मंगल के नवमांश में मंगल के साथ ही बैठ गया हो और राहू तथा गुलिक लगन में स्थित हो। आदि-आदि कई योगों का वर्णन ज्योतिष ग्रंथों में मिलता है जो संतति सुख हानि करता है तथा कुंडली मिलान करते समय सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए इन्हें विचार में लाना अति आवश्यक होता है। पति या पत्नी में से किसी एक की कुंडली में संतानहीनता योग होता है तो दाम्पत्य जीवन नीरस हो जाता है। अनुभव में यह भी नहीं पाया गया है कि संतानहीनता योग वाली महिला की शादी संतति योग वाले पुरुष के साथ की जाए अथवा संतानहीन योग वाले पुरुष की शादी संतित योगा वाली महिला के साथ की जाए और इस प्रकार का कुयोग दूर हो जाए लेकिन यह कुयोग नहीं कटता और जीवन भर संतान का अभाव बना रहता है। ऐसी स्थिति में ईश कृपा, देव कृपा या संत कृपा ही इस कुयोग को काट सकती है। निम्र उपाय भी संतान सुख देने में सहायक होते हैं। षष्ठी देवी का जप पूजन एवं स्त्रोत पाठ आदि का अनुष्ठान पुत्रहीन व्यक्ति को सुयोग पुत्र संतान देने में सहायक होता है। संतान गोपाल मंत्र- ॐ क्लीं ॐ क्लीं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि ने तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ का जप एवं संतान गोपाल स्रोत का नियमित पाठ भी संतति सुख प्रदान करने वाला होता है। इसके अतिरिक्त भगवान शिव की आराधना एवं जप, पूजा, अनुष्ठान, कन्या दान, गौदान एवं अन्य यंत्र-तंत्र तथा औषधियां अपनाने से भी संतति सुख प्राप्त किया जा सकता है। गुरु, माता-पिता, ब्राह्मण, गाय आदि की सेवा, पुण्य, दान, यज्ञ आदि संतानहीनता को मिटाने वाले होते हैं। नवरात्रि में सर्ववाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:। मनुष्यों मत्प्रसादेन भवि यति न संशय:।। इस मंत्र से दुर्गा सप्तशती का नवचंडी या शतचंडी पाठ का अनुष्ठान भी संतान सुख देता है।

Tuesday, 13 September 2022

केंद्र भाव, पनफर भाव, एपोकलिक भाव के कुंडली में गुण और अवगुण

भाव और उनका महत्व
http://asthajyotish.in WP. 9333112719 ◾ आत्मा बर्बर हो या सभ्य, कमजोर हो या ताकतवर, बुद्धिमान हो या मूर्ख, वह शरीर के ही माध्यम से काम करती है। ◾ राशियो मे ग्रह की स्थति बाह्य जगत की घटना और संयोग की अपेक्षा, आतंरिक शक्ति व गुण के लिए अधिक मत्वपूर्ण है। ◾ राशि और भावो की विशिष्टता आत्मा की उम्र अनुसार परवर्तित होती रहती है। ◾ ग्रह Planets राशि और भाव के अलावा अस्थायी व्यक्तित्व और भौतिक शरीर की अपेक्षा व्यक्तिगत आध्यात्मिक व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते है। आत्म विकास के तीन स्तर है। 1. तरुण और अनुभव हीन आत्मा = यह बारह भावो मे थोपा गया कार्य करती है। यह स्वयम मे अल्प कार्य कर सकती है। 2. बलवान और अनुभव युक्त आत्मा = यह अपने गुण और संकाय रखती है। जो मुख्य रूप से राशियो की स्थिति से व्यक्त होती है। 3. राशियो के अलावा ग्रह मानव के सर्वोत्तम विकास का प्रतिनिधित्व करते है। ➤ राशि अनुरूप भाव भी त्रियुग्म और चतुयुग्म होते है। त्रियुग्म राशि स्वभाव के नाम और भाव त्रियुग्म के नाम अलग अलग है। चर (मेष, कर्क, तुला, मकर) केंद्र 1, 4, 7, 10 Angular स्थिर (वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ) फणफर 2, 5, 8, 11 Succedent द्विस्भाव (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) आपोक्लिम 3, 6, 9, 12 Cadent चतुयुग्म मे राशि और भाव के नाम समान है। अग्नि 1, 5, 9 पृथ्वी 2, 6, 10 वायु 3 7, 11 जल 4, 8, 12 ➤ वृत्त के लम्बवत दो भाग दिन और रात है। लग्न यानि पूर्वी क्षितिज से सप्तम भाव अर्थात पश्चिमी क्षितिज तक अर्थात 1,2,3,4,5,6 तक दिन और सातवे भाव से बाहरवे भाव तक अर्थात 7, 8, 9, 10, 11, 12 तक रात्रि है। ➤ दिन वाला अर्धवृत्त अभिव्यक्ति या प्रस्फुटन, अनावरण या प्रकाश मे लाना, सृजन, सार्वजनिकता, शक्ति मन्वन्तर का द्योतक है। रात्रि वाला अर्द्धवृत्त संवृत्ति या आश्रय, विलम्बता, वापसी, विघटन, प्रलय का द्योतक है। ➤ इसी प्रकार क्षितिजवत उदय और अस्त दो भाग है। कोई भी पिंड चतुर्थ से दशम तक 5 6 7 8 9 10 भाव में हो, तो उदित कहलाता है और कोई भी पिण्ड 10 11 12 1 2 3 भाव मे हो, तो अस्त या अनुदित कहलाता है। ➧ भावो अनुसार उदयास्त और ग्रहो की गति अनुसार उदयास्त, मे भ्रमित नही होना चाहिये क्योकि दोनो अलग अलग घटनाए है। ➤ पूर्वी अर्द्धवृत्त या उदित वाला भाग स्वयम, अहंकारवाद, निश्चयीकरण, दूसरो से अलग, संकायो या शक्तियो के लाभ का द्योत्तक है। पश्चिमी अर्द्धवृत्त या अस्त या अनुदित वाला भाग स्वयं की कमी, पेचीदगी या अविकसितता शेष जगत से मित्रता या शत्रुता, संघ या एकता, परोपकारिता का द्योतक है। ➤ लम्बवत और क्षितिजवत दोनो चार वृत्त खण्ड बनाते है। इनमे लग्न की नोक (दन्ताग्र) सूर्योदय बिन्दु है, दशम भाव का नोक दोपहर है, सप्तम भाव का नोक सूर्यास्त बिन्दु है, चतुर्थ भाव की नोक (कस्प) मध्यरात्रि है। ➤ ये चार बिन्दु सूर्य से सम्बंधित है लेकिन अन्य ग्रहो पर भी यही सिद्धान्त लागू होता है। जब ग्रह उदित हो या उदय हो रहा हो, तब वह आविर्भाव (अभिव्यक्ति) मे अलग स्वयम बाहर आता है। जब ग्रह पराकाष्ठा की स्थिति मे हो अर्थात दशम मे हो, तब वह अभिव्यक्ति का मध्य अवस्था मे होता है। जब वह अस्त हो रहा हो, तब उसका अलगाव कम होता है और वह संयोजन के शुरुआत मे होता है। जब ग्रह निम्न मध्यान्ह (मध्यरात्रि) अर्थात चतुर्थ पर होता है, तब अभिव्यक्ति से पूरा बाहर होता है। ➤ वृत्त का चौगुना विभाजन अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल के चार त्रियुग्म देता है। जब समभुज त्रिकोण वृत्त के अंदर चिन्हित किया जाय तब चर या राजसिक, स्थिर या तामसिक, द्विस्वभाव या राजसिक राशियो का चतुयुग्म परिणाम होता है। भावो के प्रभाव केन्द्र या कोण = 1, 4, 7, 10 जन्मांग मे सबसे पहले महत्व पूर्ण है। केन्द्र भावो का प्रभाव चर राशियो के सामान राजसिक गुणो वाले है। प्रकट और ठोस करने से सम्बंधित है और खुले मे बाहर लाते है। अव्यक्त व्यक्तित्व की सभी वस्तुओ या बातो का अनावरण और अभिव्यक्त करते है। इन भावो से सम्बंधित ग्रह और राशि द्वारा व्यक्त सभी तथ्यो का अनावरण और प्रकटीकरण करते है। प्रथम भाव : इसे लग्न भी कहते है। अपने भाव मे केवल व्यक्तिगत है और इसकी शक्ति की अभिव्यक्ति आध्यात्म शक्ति पर निर्भर करती है। यहा आत्मा या तो प्रतिबंधित या अभिवर्धित अर्थ मे प्रबल है। दशम भाव : दशम भाव के प्रभाव प्रथम भाव जैसे ही होते है। लेकिन आत्म या स्वयं की प्रतिभा के लिये व्यापक क्षेत्र प्रदान किया जाता है। सप्तम भाव : दूसरे अर्थ मे लिया गया गैर आत्म के अनुभव से सम्बंधित है। मित्र, सहभागी, भागीदार आदि या तो प्रेम या नफरत, या सहायता या होड़ सभी जिनके हित जातक से मिश्रित हो, सातवे भाव से सम्बन्धित है। चतुर्थ भाव : चौथा भाव न तो व्यक्तिगत और न ही निजी अर्थ मे है। यहा अलगाव या तो नष्ट या निष्प्रदीप हो जाता है। फणफर = 2, 5, 8, 11 भाव फणफर कहलाते है। ये इच्छा, भावना, भावुकता और तामसिक गुणो से सम्बंधित है। ये उतने खुले और कार्रवाही से भरे नही है जितने केन्द्र भाव है। फणफर भावो का प्रभाव स्थिर राशियों के सामान है। द्वितीय और पंचम भाव अधिक अनुदार और इनके प्रभाव आठवे और ग्यारहवे की अपेक्षा कम खुले है। आठवा और ग्यारहवा भाव कार्रवाही मे इच्छा को अधिक बाहरी व्यक्त करते है। आपोक्लिम = 3, 6, 9, 12 भाव आपोक्लिम कहलाते है। ये मानसिक है और विचार द्वारा कार्रवाही और इच्छा के पथ प्रदर्शन व निर्देशन को व्यक्त करते है। आपोक्लिम भावो का प्रभाव द्विस्वभाव राशियो के समान है। तृतीय और नवम भाव पूर्णतया बौद्धिक और धनात्मक होता है। ये कई और लाभ देते है। यदाकदा एक ही समय पर दो या दो से अधिक गतिविधिया होती है। छठा और बारहवा भाव श्रमिको और व्यवसायियो से सम्बंधित है। ये भाव अधिक शांत आरक्षित, धीमी गति, अल्प महत्वाकांक्षी और स्वतंत्र है। इनमे उत्पन्न घटना या तो व्यक्तिगत या निजी या अधितर रहस्यमय और गोपनीयता से घिरी होती है। ग्रहो और राशियो का भावो से सम्बन्ध भाव, भौतिक शरीर के जीवन की सघन अभिव्यक्ति करते है। समान ग्रह और राशि इनके महत्व मे या तो वृद्धि या न्यूनता कर सकते है। कोई भी राशि भावो के नोक पर हो सकती है। यहा केवल चतुयुग्म राशियों की विविधता का वर्णन है। केन्द्र 1,4,7,10 पनफर 2,5,8,11 आपोक्लिम 3,6,9,12 ज्योतिष और वास्तु समाधान 🏠Vastu Guru_ Mk.✋ 👉WP. 9333112719 ◾ चर रशिया केन्द्र मे हो, तो बाहरी दुनिया मे होने वाली घटनाऐ स्वयम से प्रेरित या आमंत्रित होते है। ◾स्थिर रशिया फणफर स्थान मे इच्छा और कार्रवाही की गति से सम्बंधित होती है। ◾द्विस्वभाव राशियो का आपोक्लिम मे कार्रवाही की अपेक्षा विचारो पर अधिक असर है। ◾जन्म के समय जो ग्रह और रशिया आपोक्लिम भाव मे होती है वे प्रारम्भिक जीवन मे कम या ज्यादा सुप्तावस्था मे रहती है और कुण्डली की दिशात्मक गति से केन्द्र / कोण की ओर प्रगति मे कार्रवाही मे परिवर्तित हो जाते है।

Wednesday, 27 July 2022

जन्मकुंडली का कौनसा भाव मजबूत होना जरूरी है

जन्म कुंडली का कौनसा घर(भाव) सबसे मजबूत होना चाहिए, यदि वह कमजोर है तो मजबूत कैसे किया जा सकता हैं।?
ज्योतिष और वास्तु समाधान 🏠Vastu Guru_ Mk.✋ 👉WP. 9333112719 प्रश्न के दो भाग हैं :१-जन्म पत्रिका में कौन सा भाव सबसे मजबूत होना चाहिए ? २-यदि वह कमजोर है तो ऐसे भाव को कैसे मजबूत किया जा सकता है? पहले प्रश्न पर मेरा सुझाव यह है कि सबसे अधिक बली होने की धारणा तर्क संगत नहीं इसके स्थान पर पर्याप्त बली कहना अधिक व्यावहारिक होगा। ★जन्म पत्रिका में लग्न चन्द्रमा और सूर्य ये तीन शरीर,मन और जीवात्मा के प्रतिनिधि होते हैं। ◆क्रम की दृष्टि से लग्न भाव शरीर का प्रतिनिधि होता है ।इसलिए सबसे पहले लग्न भाव ही सबसे अधिक नहीं तो पर्याप्त बली होना चाहिए। क्योंकि यह नींव है जिसके आधार पर जीवन टिका होता है। लग्न से ही ग्रहों की शुभाशुभ प्रकृति तय होती है। ◆दूसरे क्रम में मन का कारक चन्द्रमा है।कहा गया है,मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।। यदि लग्न कमजोर है तो चन्द्रमा पर्याप्त बली होना चाहिए।ऐसी स्थिति में शरीर दुर्बल होने पर भी मन की दृढ़ता के बल पर व्यक्ति जीवन में बहुत कुछ उपलब्ध कर लेता है। ★तीसरे क्रम में आत्मा का कारक सूर्य है।सच तो यह है कि आत्म बल के आगे शरीर और मन की कमजोरी भी उन्नति में आड़े नहीं आ सकती है। www.asthajyotish.in इस प्रकार तीनो का अपना अपना महत्व है।इसलिए मेरा विचार और अनुभव यही है कि तीनों को पर्याप्त बली होना चाहिए। फिर भी यदि जन्म लग्न, चन्द्र और सूर्य- इन तीनों में से एक भी बली है तो जातक उन्नति कर सकता है। ◆पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार पुरुष की पत्रिका में सूर्य का बली होना आवश्यक जब कि स्त्री की पत्रिका में चन्द्र का बली होना आवश्यक माना गया है। ★प्रश्न का दूसरा भाग यह है कि यदि अपेक्षित भाव कमजोर है तो कैसे मजबूत किया जा सकता है? ★जिस प्रकार दीपक पहले से रखी वस्तु को केवल दिखाता है वैसे ही ग्रह भी पहले के कर्मों के फल को केवल दिखाते हैं।इसलिए ज्योतिष का आधार पुनर्जन्म और कर्मफ़ल का गीता व शास्त्रों में वर्णित कर्मफल सिद्धांत है। इसलिए यदि— ★1 शरीर भाव को मजबूत करना है तो शरीर की प्रकृति जानना होगी जो लग्न भाव पर वात पित्त कफ त्रिदोष में से किसका प्रभाव अधिक है- इसे देख कर ज्ञात की जा सकती है। प्रकृति ज्ञात हो जाने पर उसी प्रकृति अनुसार आहार विहार दिनचर्या ,ऋतुचर्या को नियमित करना होगा। ★ व्यक्ति के शरीर की प्रकृति जानने के लिए ज्योतिष बहुत उपयोगी सिद्ध होता है, कैसे ? आइए आप भी जानिए यह सरल है। ज्योतिर्विज्ञान में — (क) 12 राशियों का अग्नि पृथ्वी वायु जल इन चार तत्व के अनुसार वर्गीकरण है। (ख) फिर नौ ग्रहों का वात पित्त कफ अनुसार वर्गीकरण है। (ग) फिर काल पुरुष के अनुसार लग्न में आने वाली राशि के अनुसार शरीर के उस अंग विशेष में व्याधि के प्रति संवेदनाशीलता भी विचारणीय होती है। •उदाहरण के लिए जैसे कि कर्क लग्न है जो जल तत्त्व प्रधान है तो व्यक्ति को कफ विकार अधिक शीघ्रता से होंगे। ••शनि शीतल वात प्रधान हैऔर लग्न पर इसका भी प्रभाव है तो वातज कफज रोग अधिक संभावित रहेंगे। जन्मलग्न में जो राशि आ रही है (मेष से सिर, कर्क से छाती,मीन से पैर -इस क्रम से ) वह राशि काल पुरुष के जिस अंग का प्रतिनिधि है, तो व्यक्ति के शरीर का वह अंग अधिक प्रभावित होता है। ◆यह चन्द्रकला नाड़ी का सूत्र है जो मेरे अनुभव के अनुसार शत प्रतिशत सही है। •जैसे लग्न में धनु राशि है तो धनु कालपुरुष की कमर का प्रतिनिधि होने से व्यक्ति की कमर सम्बन्धी व्याधि के प्रति संवेदनशीलता अधिक होगी । यदि लग्न में कन्या है तो उदर आंतों की व्याधि की संभावना रहेगी पर जैसा ग्रह प्रभाव लग्न पर होगा उसी अनुसार । •लग्न यदि अग्नि तत्व के कारक मंगल से प्रभावित तो पित्तज रोग, शस्त्र कष्ट संभावित रहेंगे। इत्यादि। ◆सारांश यह कि लग्न को अर्थात शरीर को बली करना तो उपरोक्त बचाव समझ कर सबसे पहले आयुर्वेदिक प्राकृतिक उपचार करने चाहिए। आहरविहार दिनचर्या इसी व्याधि से बचने के लिए नियमित करना चाहिए ★2 चन्द्र को बली करना है तो उत्साह जनक वातावरण में रहना चाहिए और मन को सदैव प्रसन्न रखने का प्रयास-अभ्यास करना चाहिए।मन को इसतरह से मजबूत बनाने के लिए सबसे सरल , साइडइफेक्ट रहित तरीका यह है कि नित्य 10 से 20 मिनिट प्राणायाम व योगाभ्यास करना चाहिए। इससे मन मजबूत होगा। क्योंकि श्वास से मन का सीधा सम्बन्ध है। ( आपने गौर किया होगा कि क्रोध होने पर साँस बहुत तेज चलती है;मन भारी होने पर व्यक्ति दीर्घ श्वास छोडता है -हाय! हाँ s s ! अरे ! कहते हुए ; शांत चित्त होने पर श्वास बहुत धीमी चलती है। ) इसलिए मन मजबूत होगा तो चन्द्र मजबूत होगा। ★ विशेष ध्यान देने योग्य बात है: मनुष्य केवल शरीर नहीं; मनुष्य केवल मन नहीं। मनुष्य दोनों का जोड़ है- यह 'मनः शरीरी' है psycho somatic है। एक के मजबूत होने से दूसरा भी मजबूत होता है । ★3 सूर्य को बली करना है तो सूर्योदय समय की लालिमा में खड़े हों। इसके साथ अपने इष्ट देवी-देवता का या गायत्री का या निराकार ब्रह्म का, अपनी अपनी रुचि सामर्थ्य और परम्परा के अनुसार ध्यान करने से आत्म तत्व मजबूत होगा- आत्म तत्व मजबूत हुआ तो जन्मत्रिका का सूर्य मजबूत हुआ समझिए। इस प्रकार व्यक्ति अपने शरीर ,मन और आत्मतत्व—इन तीनों को मजबूत कर सकता है। Jyotish Guru Mk https://youtube.com/c/JyotishGuruMk हो सकता है कि मेरा उत्तर अधिकांश पाठकों को मन माफिक न लगे पर ज्योतिर्विज्ञान से सही मायनों में लाभ लेना है तो यही श्रेष्ठ विधि है अर्थात जिस मार्ग को पूर्वजों ने अपनाया है वही मार्ग श्रेष्ठ है। अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु WhatsApp करें 9333112719 पर।

Wednesday, 13 July 2022

संतान योग ग्रह शुभ या अशुभ पंचम भाव से जाने

कौन से ग्रह बाधक बनते है संतान सुख में? जानें उचित समाधान
ज्योतिष और वास्तु समाधान 🏠Vastu Guru_ Mk.✋ 👉WP. 9333112719 वेदों के अनुसार आत्मा को अजर-अमर कहा गया है। गीता में भी कहा गया है कि, जिस प्रकार मनुष्य फटे हुए जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण कर लेता है। ठीक उसी प्रकार यह जीवात्मा पुराने जीर्ण शरीर को त्यागकर नई देह को धारण कर लेती है। हमारे यहां पुनर्जन्म का सिद्धांत है। हर जीवात्मा अपने पूर्व कर्मों के अनुसार निश्चित मां-बाप के यहां जन्म लेती है और जन्म लेते समय आकाश में ग्रहों और नक्षत्रों की जो स्थिति होती है उस आकाशीय नक्शे के अनुसार व्यक्ति का जीवन निर्धारण होता है। जिसे ज्योतिष शास्त्र जन्मांग या कुंडली का नाम देता है। एक कुशल ज्योतिषी व्यक्ति के जन्मांग से ज्योतिष के द्वारा उसके भूत, भविष्य, प्रकृति और चरित्र को जान लेता है। जन्मांग व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का दर्पण होता है। कुंडली के बाहर भाव जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से संबंधित रहते हैं लेकिन मैं यहां केवल पंचम भाव से संबंधित संतान क्षेत्र को ही पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं। बुद्धि, प्रबंध, संतान, मंत्र (गुप्त विचार), गर्भ की स्थिति, नीति आदि शुभाशुभ विचार पंचम भाव से करना चाहिए। पंचम भाव की राशि एवं पंचमेश, पंचमेश किस राशि एवं स्थान में बैठा है तथा उसके साथ कौन-कौन से ग्रह स्थित हैं। पंचम भाव पर किन-किन ग्रहों की दृष्टि है, पुत्र कारक गुरु, नवम भाव तथा नवमेश की स्थिति, नवम भाव पंचम से पंचम होता है। अत: यह पोते का स्थान भी कहलाता है। पंचम भाव के स्वामी पर किन-किन भावेशों की दृष्टि है, पंचमेश कारक है या अकारक, सौम्य ग्रह है या दृष्ट ग्रह तथा पंचम भाव से संबंधित दशा, अंतर्दशा और प्रत्यंतदशा आदि। पंचमेश से 5/6/10 में यदि केवल पापग्रह हो तो उसको संतान नहीं होती, हो भी तो जीवित नहीं रहती हैं। https://asthajyotish.business.site पंचम भाव में शनि के वर्ग हों तथा उसमें चंद्रमा बैठा हो और रवि अथवा शुक्र से दृष्ट हो तो उसको पौनर्भ व (विधवा स्त्री से विवाह करके उत्पन्न) पुत्र होता है। पंचम भाव नवमांश पर जितने पापग्रह की दृष्टि हो उतने गर्भ नष्ट होते हैं किन्तु यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो। पंचम भाव में केवल मंगल का योग हो तो संतान बार-बार होकर मर जाती है। यदि गुरु या शुक्र की दृष्टि हो तो केवल एक संतति नष्ट होती है और अन्य संतति जीवित रहती है। बंध्या योग, काक बंध्या योग, विषय कन्या योग, मृतवत्सा योग, संतित बाधा योग एवं गर्भपात योग स्त्रियों की कुंडली में होकर उन्हें संतान सुख से वंचित कर देते हैं। इस प्रकार के कुछ योग निम्रलिखित हैं : लगन और चंद्र लगन से पंचम एवं नवम स्थान से पापग्रहों के बैठने से तथा उस पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। लगन, पंचम, नवम तथा पुत्रकारक गुरु पर पाप प्रभाव हो लगन से पंचम स्थान में तीन पाप ग्रहों और उन पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। आठवें स्थान में शनि या सूर्य स्वक्षेत्री हो। तीसरे स्थान पर स्वामी तीसरे ही स्थान में पांचवें या बारहवें में हो और पंचम भाव का स्वामी छठे स्थान में चला गया हो। जिस महिला जातक की कुंडली में लगन में मंगल एवं शनि इकट्ठे बैठे हों। लगन में मकर या कुम्भ राशि हो। मेष या वृश्चिक हो और उसमें चंद्रमा स्थित हो तथा उस पर पापग्रहों की दृष्टि हो। पांचवें या सातवें स्थान में सूर्य एवं राहू एक साथ हों। पांचवें भाव का स्वामी बारहवें स्थान में व बारहवें स्थान का स्वामी पांचवें भाव में बैठा हो और इनमें से कोई भी पाप ग्रह की पूर्ण दृष्टि में हो। आठवें स्थान में शुभ ग्रह स्थित हो साथ ही पांचवें तथा ग्यारहवें घर में पापग्रह हों। सप्तम स्थान में मंगल-शनि का योग हो और पांचवें स्थान का स्वामी त्रिक स्थान में बैठा हो। पंचम स्थान में मेष या वृश्चिक राशि हो और उसमें राहू की उपस्थिति हो या राहू पर मंगल की दृष्टि हो। शनि यदि पंचम भाव में स्थित हो और चंद्रमा की पूर्ण दृष्टि में हो और पंचम भाव का स्वामी राहू के साथ स्थित हो। मंगल दूसरे भाव में, शनि तीसरे भाव में तथा गुरु नवम या पंचम भाव में हो तो पुत्र संतान का अभाव होता है। यदि गुरु-राहू की युति हो। पंचम भाव का स्वामी कमजोर हो एवं लग्न का स्वामी मंगल के साथ स्थित हो अथवा लगन में राहू हो, गुरु साथ में हो और पांचवें भाव का स्वामी त्रिक स्थान में चला गया हो। पंचम भाव में मिथुन या कन्या राशि हो और बंधु मंगल के नवमांश में मंगल के साथ ही बैठ गया हो और राहू तथा गुलिक लगन में स्थित हो। आदि-आदि कई योगों का वर्णन ज्योतिष ग्रंथों में मिलता है जो संतति सुख हानि करता है तथा कुंडली मिलान करते समय सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए इन्हें विचार में लाना अति आवश्यक होता है। पति या पत्नी में से किसी एक की कुंडली में संतानहीनता योग होता है तो दाम्पत्य जीवन नीरस हो जाता है। अनुभव में यह भी नहीं पाया गया है कि संतानहीनता योग वाली महिला की शादी संतति योग वाले पुरुष के साथ की जाए अथवा संतानहीन योग वाले पुरुष की शादी संतित योगा वाली महिला के साथ की जाए और इस प्रकार का कुयोग दूर हो जाए लेकिन यह कुयोग नहीं कटता और जीवन भर संतान का अभाव बना रहता है। ऐसी स्थिति में ईश कृपा, देव कृपा या संत कृपा ही इस कुयोग को काट सकती है। निम्र उपाय भी संतान सुख देने में सहायक होते हैं। षष्ठी देवी का जप पूजन एवं स्त्रोत पाठ आदि का अनुष्ठान पुत्रहीन व्यक्ति को सुयोग पुत्र संतान देने में सहायक होता है। संतान गोपाल मंत्र- ॐ क्लीं ॐ क्लीं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि ने तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ का जप एवं संतान गोपाल स्रोत का नियमित पाठ भी संतति सुख प्रदान करने वाला होता है। इसके अतिरिक्त भगवान शिव की आराधना एवं जप, पूजा, अनुष्ठान, कन्या दान, गौदान एवं अन्य यंत्र-तंत्र तथा औषधियां अपनाने से भी संतति सुख प्राप्त किया जा सकता है। गुरु, माता-पिता, ब्राह्मण, गाय आदि की सेवा, पुण्य, दान, यज्ञ आदि संतानहीनता को मिटाने वाले होते हैं। नवरात्रि में सर्ववाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:। मनुष्यों मत्प्रसादेन भवि यति न संशय:।। इस मंत्र से दुर्गा सप्तशती का नवचंडी या शतचंडी पाठ का अनुष्ठान भी संतान सुख देता है। अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु हमारे WhatsApp no . 9333112719 पर मैसेज कर सही और सफल समाधान ले सकते हैं।

Sunday, 12 June 2022

10 भाव से जाने किस क्षेत्र में सफल होंगे

बहुत से लोगों के मन में दुविधा होती है कि उसे @नौकरी करना चाहिए या कि व्यापार।
@नौकरी में प्राइवेट नौकरी करना चाहिए या सरकारी? https://asthajyotish.business.site व्यापार फलीभूत होगा तो कौनसा व्यापार करना चाहिए? इन्हीं प्रश्नों के समाधान के लिए यहां प्रस्तुत है कुछ सामान्य जानकारी। कुंडली में क्या है नौकरी या व्यापरा का भाव : कहते हैं कि दशभ भाव से पता चलता है कि व्यक्ति क्या करेगा, ग्यारहवें भाव से पता चलता है कि व्यक्ति क्या कमाएगा और दूसरे भाव से पता चलता है कि व्यक्ति कितना बचा पाएगा। कुंडली में दशम भाव से देखा जाता है कि व्यक्ति क्या करेगा। दशम भाव : दशम भाव के स्वामी को दशमेश या कर्मेश या कार्येश कहते हैं। इस भाव से यह देखा जाता है कि व्यक्ति सरकारी नौकरी करेगा अथवा प्राइवेट, या व्यापार करेगा तो कौन सा, उसे किस क्षेत्र में अधिक सफलता मिलेगी। सप्तम भाव साझेदारी का होता है। इसमें मित्र ग्रह हों तो पार्टनरशिप से लाभ। शत्रु ग्रह हो तो पार्टनरशिप से नुकसान। मित्र ग्रह सूर्य, चंद्र, बुध, गुरु होते हैं। शनि, मंगल, राहु, केतु ये आपस में मित्र होते हैं। http://asthajyotish.in WP. 9333112719 सूर्य, बुध, गुरु और शनि दशम भाव के कारक ग्रह हैं। दशम भाव में केवल शुभ ग्रह हों तो अमल कीर्ति नामक योग होता है, किंतु उसके अशुभ भावेश न होने तथा अपनी नीच राशि में न होने की स्थिति में ही इस योग का फल मिलेगा। दशमेश के बली होने से जीविका की वृद्धि और निर्बल होने पर हानि होती है। लग्न से द्वितीय और एकादश भाव में बली एवं शुभ ग्रह हो तो जातक व्यापार से अधिक धन कमाता है। धनेश और लाभेश का परस्पर संबंध धनयोग का निर्माण करता है। दशम भाव का कारक यदि उसी भाव में स्थित हो अथवा दशम भाव को देख रहा हो तो जातक को आजीविका का कोई न कोई साधन अवश्य मिल जाता है। दशम भावस्थ नवग्रह फलः- सूर्यः- दसवें भाव में स्थित वृश्चिक राशि का सूर्य चिकित्सा अधिकारी बनाता है। मेष, कर्क, सिंह या धनु राशि का सूर्य सेना, पुलिस या आवकारी अधिकारी बनाता है। चंद्रः- शुभ प्रभाव में बली चंद्र यदि दशमस्थ हो तो धनी कुल की स्त्रियों से लाभ होता है। यदि ऐसा व्यक्ति दैनिक उपयोग में आनेवाली वस्तुओं का व्यापार करे तो लाभप्रद होता है। चंद्र से मंगल या शनि की युति विफलता का सूचक है। मंगलः- मेष, सिंह, वृश्चिक या धनु राशि का मंगल जातक को प्राइवेट चिकित्सक और सर्जन बनाता है। ऐसे डाक्टरों को मान-सम्मान और धन की प्राप्ति होती है। मंगल का सूर्य से संबंध हो तो व्यक्ति सुनार या लोहार का काम करता है। बुधः- लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश या दशमेश होकर कन्या या सिंह राशि का बुध गुरु से दृष्ट या युत हो तो व्यक्ति प्रोफेसर या लेक्चरर बनकर धन अर्जित करता है। बुध बैंकर भी बनाता है। बुध शुक्र के साथ या शुक्र की राशि में हो तो जातक फिल्म या विज्ञापन से संबंधित व्यवसाय करता है। गुरुः- गुरु का संबंध जब नवमेश से हो तो व्यक्ति धार्मिक कार्यों द्वारा धन अर्जित करता है। गुरु मंगल के प्रभाव में हो तो जातक फौजदारी वकील बनता है। बलवान और राजयोगकारक हो तो जातक न्यायाधीश बना देता है। शुक्रः- जातक सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, फैंसी वस्तुओं आदि का निर्माता/विक्रेता होता है। शुक्र का संबंध द्वितीयेश, पंचमेश या बुध से हो तो गायन-वादन के क्षेत्र में सफलता मिलती है। शनिः- शनि का संबंध यदि चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से हो तो जातक लोहे, कोयले मिट्टी के तेल आदि के व्यापार से धन कमाता है। बलवान शनि का मंगल से संबंध हो तो जातक इलेक्ट्रीक/इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर होता है। यदि बुध से संबंध हो तो मेकैनिकल इंजीनियर होता है। शनि का राहु से संबंध हो तो व्यक्ति चप्पल, जूते, रेक्सिन बैग, टायर-ट्यूब आदि के व्यापार में सफल होता है। राहुः- दशम भाव में मिथुन राशि का राहु राजनीति के क्षेत्र में सफलता दिलाता है। ऐसा जातक सेना, पुलिस, रेलवे में या राजनेता के घर नौकरी करता है। केतुः- धनु या मीन राशि का दशमस्थ केतु व्यापार में सफलता, वैभव, धन और यश का सूचक है। ऊपर वर्णित बिंदुओं के आधार पर अपने अनुकूल आजीविका का निर्णय करें। शुभ/ योगकारक ग्रहों की महादशा में उनसे या जिन ग्रहों से उनका संबंध हो उनसे संबंधित व्यवसाय करने पर अच्छा लाभ होता है। आजीविका हेतु अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मंत्र, यंत्र, रत्न, दान और पूजा अर्चना आदि समय-समय पर करते रहना चाहिए। 1.यदि लग्न सप्तम, दशम भाव का कार्येश हो तब जातक को कारोबार के द्वारा धनार्जन होगा और यदि षष्ठ और दशम का कार्येश हो तो नौकरी से धन अर्जित करेगा। 2.तृतीय भाव का कार्येश हो तो लेखन, छपाई, एजेंसी, कमीशन एजेंट, रिपोर्टर, सेल्समेन और संस्‍थाओं से धन प्राप्त होगा। मतलब यह कि वह इस क्षेत्र में अपना करियर बनाएगा। 3.अगर द्वितीय और पंचम का कार्येश हो तो जमीन, घर, बगीचे, वाहन और शिक्षा संस्थानों से धन प्राप्त करेगा। इसके अतिरिक्त नाटक, सिनेमा, ढोल, रेस, जुआ, मंत्र, तंत्र और पौरोहित्य कर्म से धन अर्जित करेगा। 4.यदि द्वितीय और सप्तम का कार्येश हो तो विवाह, विवाह मंडल, पार्टनरशिप और कानूनी सलाहकार के कार्य से धन अर्जित करेगा। 5.यदि दशम भाव में एक से अधिक ग्रह हों और उसमें से जो ग्रह सबसे अधिक बलवान होगा जातक उसके अनुसार ही व्यापार करेगा। जैसे दशम भाव में मंगल बलवान हो तो जातक प्रॉपर्टी, निवेश आदि का व्यवसाय करेगा अथवा पुलिस या सेना में जाएगा। 7.यदि दशम भाव में कोई ग्रह न हो तो दशमेश यानी दशम भाव के स्वामी के अनुसार व्यापार तय होगा। यदि दशम भाव में शुक्र हो तो व्यक्ति कॉस्मेटिक्स, सौंदर्य प्रसाधन, ज्वेलरी आदि के कार्यों से लाभ अर्जित करता है। दशम भाव का स्वामी जिन ग्रहों के साथ होता है उनके अनुसार व्यक्ति व्यापार करता है। 8. सूर्य के साथ गुरु हो तो व्यक्ति होटल व्यवसाय, अनाज आदि के कार्य से लाभ कमाता है। एकादश भाव आय स्थान है। इस भाव में मौजूद ग्रहों की स्थिति के अनुसार व्यापार तय किया जाता है। 9.जन्मकुंडली में कोई ग्रह जब लग्नेश, पंचमेश या नवमेश होकर दशम भाव में स्थित हो, या दशमेश होकर किसी भी त्रिकोण (1, 5, 9 भावों) में, या अपने ही स्थान में स्थित हो तो व्यक्ति की आजीविका के पर्याप्त साधन होते हैं। वह व्यवसाय या नौकरी में अच्छी प्रगति करता है। दशमेश या दशम भावस्थ ग्रह का बल और शुभता दोनों उसके शुभफलों में द्विगुणित वृद्धि करते हैं। अधिक जानकारी प्राप्त करें https://wa.me/message/BTNUEIEYYDMDN1

Thursday, 17 February 2022

हस्तरेखा में * निशान होने पर क्या असर होगा

व्यक्ति को बदनामी दिलाता है इस रेखा पर बना निशान
ज्योतिष और वास्तु समाधान 🏠Vastu Guru_ Mk.✋ 👉WP. 9333112719 हस्तरेखा में क्रॉस का निशान भी बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन इस निशान का कुछ पर्वत पर शुभ परिणाम मिलता है तो कुछ पर नकारात्मक। यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्रॉस का चिह्न कहां है। यहां पर हम आपको क्रॉस के निशान और इसके परिणाम के बारे में बताने जा रहे हैं। -यदि किसी व्यक्ति के गुरु पर्वत पर क्रॉस का निशान है तो यह उसके सुख में बढ़ोतरी करता है। गुरु पर्वत पर क्रॉस का निशान व्यक्ति के जीवनसाथी के शिक्षित एवं धनी कुल से मिलने का इशारा करता है। हस्तरेखा विज्ञान में गुरु पर्वत यानी बृहस्पति पर्वत पर क्रॉस के चिह्न को शुभ माना गया है। बाकी पर्वत पर इसके नकारात्मक परिणाम मिलते हैं। -यदि क्रॉस का चिह्न शनि पर्वत पर है तो ऐसे व्यक्ति को लड़ाई में चोट लगती है। इस पर्वत पर निशान व्यक्ति को अकाल मृत्यु की ओर ले जाता है। -सूर्य पर्वत पर क्रॉस का निशान शुभ नहीं माना गया है। यहां क्रॉस का निशान होने से व्यक्ति बदनामी का पात्र बनता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा व्यापार में घाटा बना रहता है। -बुध पर्वत पर क्रॉस का निशान व्यक्ति को झूठा और धोखेबाज बनाता है। ऐसे लोगों से हमेशा दूर रहना चाहिए। -केतु पर्वत पर क्रॉस का निशान होना व्यक्ति की शिक्षा में अवरोध को बताता है। बचपन में बीमारी अथवा अन्य किसी कारण से ऐसे व्यक्ति अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते। -मंगल पर्वत पर क्रॉस का चिह्न होना व्यक्ति को झगड़ालू बनाता है। यह निशान व्यक्ति को जेल तक पहुंचाता है। (इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं तथा इन्हें अपनाने से अपेक्षित परिणाम मिलेगा। जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।) क्या आप अपनी लाईफ को लेकर चिंतित हैं। आपके बनते कार्य बिगड़ रहे हैं। आप घर, परिवार, व्यापार, नौकरी में परेशानी आ रही है।, कन्या/पुरुष विवाह में देरी हो रही है। आप एक ही स्थान पर समाधान प्राप्त कर सकते हैं। बस WhatsApp करें हमारे no. 9333112719 पर। 💯% 👉(आप अपना name, 👉date of birth, 👉Time of birth, 👉Palase of birth, दें)🔯 आपके समस्या का समाधान हम देंगे। 👉(Online समाधान pay prices in ₹ 300/- only) ✋नाम नहीं कर्म में विश्वास रखें 🙏 हमारे साईट पर जाएं:✓ http://asthajyotish.in https://asthajyotish.business.site https://sites.google.com/view/asthajyotish https://www.youtube.com/c/JyotishGuruMk https://asthajyotish10.wixsite.com/asthajyotish-1 http://vastujyotishsamadhan.blogspot.com https://www.instagram.com/poddarjeevastu https://m.facebook.com/profile.php?ref=bookmarks# 👉Fee only 300/-🔯

त्रिक और त्रिकोण भाव की विशेषता

त्रिक भाव, त्रिकोण भाव, पनफर भाव, अपोकोलिक भाव, उपचय भाव की विशेषता क्या है.... http://asthajyotish.in ज्योतिष और वास्तु समाधान 🏠Vastu Guru_ Mk.✋ 👉WP. 9333112719
क्या आप अपनी लाईफ को लेकर चिंतित हैं। आपके बनते कार्य बिगड़ रहे हैं। आप घर, परिवार, व्यापार, नौकरी में परेशानी आ रही है।, कन्या/पुरुष विवाह में देरी हो रही है। आप एक ही स्थान पर समाधान प्राप्त कर सकते हैं। बस WhatsApp करें हमारे no. 9333112719 पर। 💯% 👉(आप अपना name, 👉date of birth, 👉Time of birth, 👉Palase of birth, दें)🔯 आपके समस्या का समाधान हम देंगे। 👉(Online समाधान pay prices in ₹ 300/- only) ✋नाम नहीं कर्म में विश्वास रखें 🙏 हमारे साईट पर जाएं:✓ http://asthajyotish.in https://asthajyotish.business.site https://sites.google.com/view/asthajyotish https://www.youtube.com/c/JyotishGuruMk https://asthajyotish10.wixsite.com/asthajyotish-1 http://vastujyotishsamadhan.blogspot.com https://www.instagram.com/poddarjeevastu https://m.facebook.com/profile.php?ref=bookmarks# 👉Fee only 300/-🔯

Saturday, 22 January 2022

कुंडली में ग्रहों का फल कैसे जानें

अपनी जन्म कुंडली के अनुसार ऐसे लें ग्रहों का सही फल! ऐसे करें जन्म समय की सही पहचान : यदि बालक का जन्म ठीक समय पर होगा तो ग्रहों का फल भी ठीक होगा , और यदि इष्ट में किसी भी प्रकार की चूक या गड़बड़ी हो ... https://sites.google.com/view/asthajyotish/home
ज्योतिषशास्त्र के जानकारों से यह बात छिपी नहीं है कि यदि बालक का जन्म ठीक समय पर होगा तो ग्रहों का फल भी ठीक होगा , और यदि इष्ट में किसी भी प्रकार की चूक या गड़बड़ी हो गई तो सम्पूर्ण फल में गड़बड़ी हो जाती है , इसलिए बालक के पिता को उचित तरीके से प्रसव के समय ऐसी चतुर और जानकार स्त्री को नियुक्त करें जो बच्चे के जन्म लेते ही पहली स्वांस का समय नॉट कर सके। और उसकी सुचना बाहर बच्चे के पिता को दे सके। बिना इस सही समय की जानकारी के जन्म पत्रिका को अशुद्ध माना जाता है। आपको यह सब मालूम करना चाहिए की बच्चे के जन्म का समय सही है या नहीं इसके लिए लग्न जातक से वह सब डाटा मेल मिल जाये तो मान लो की जन्म का समय ठीक है। यहाँ अपने सटीक समय पली को अपने सामने रख ले और लग्न को देखकर बच्चे के आचरण और उससे जुडी जानकारी से मिलान करें। : कुंडली में जिस घर में लग्न लिखा है उस घर में जो अंक लिखा है उस नंबर की राशि को ही उसका लग्न घर कहा जाता है जैसे लग्न घर में अंक 2 है या 4 है तो इस प्रकार देखें राशियों का क्रम 1 मेष, 2 वृष, 3 मिथुन, 4 कर्क, 5 सिंह, 6 कन्या, 7 तुला, 8 वृश्चिक, 9 धनु, 10 मकर, 11 कुम्भ, 12 मीन। 2 नंबर की राशि वृष है तो लग्न वृष होगा या लग्न में अंक 4 लिखा हो तो लग्न कर्क होगा , ईसी प्रकार आप अपने कुंडली में लग्न देखकर जन्म समय की सटीकता की जांच करें। प्रशव घर कोई भी कमरा हो सकता है इसको मुख्य घर न समझे यदि बालक के जन्म समय में लग्न तुला , वृश्चिक , कुम्भ , मेष , कर्क , हो तो प्रसव के घर का द्वार पूर्वमुख था। यदि कन्या धनु मीन मिथुन लग्न में बालक का जन्म हो तो प्रसूतिघर का द्वार उत्तर की ओर था। जन्म लग्न वृष लग्न हो तो प्रसूति द्वार पश्चिम मुख होगा। जन्म समय सिंह और मकर लग्न हो तो प्रसूता द्वार दक्षिण होना चाहिए। इसी प्रकार अपने प्रसूति घर के बारे में जानकारी सही मिलान करके भी जन्म समय के समय की सही गलत की जानकारी देख सकते है ज्योतिष विद्या में बालक के जन्म लेते ही रोने सम्बन्धी जानकारी से भी सही गलत समय की पहचान की जा सकती है बालक के जन्म समय में मेष , वृष , सिंह , मिथुन , तुला लग्न हो तो बालक जन्म लेते ही रोया करते है । कुम्भ, कन्या लग्न वाले बालक कुछ रोदन करते है कर्क , वृश्चिक , धनु , मीन लग्न में जन्मे बालक जन्म लेते ही नहीं रोते , ये कुछ समय बाद रोते है। मेष ,वृष , मिथुन , सिंह , तुला लग्नों बालक का जन्म हो तो यह बालक सब ज्ञान को भूलकर बहुत रोदन करता है कुम्भ और कन्या लग्न वाले कुछ समय के लिए रोते है। बालक के जन्म कुंडली से जानिए कुछ जन्म से जुड़े ग्रहों के फल **जिस बालक के जन्मकाल में शुक्र बुध हो और केंद्र स्थान १,४,७,१० में बृहस्पति हो तथा दश में मंगल हो तो उस बालक को कुल का दीपक माना जाता है *जिस बालक के जन्म लग्न में बुध शुक्र न हो और केंद्र में बृहस्पति न हो दशम घर में मंगल न हो तो उसका जन्म निरर्थक होता है जो छठे और बारहवें घर में पापग्रह हो तो मत को भयकारक होता है चौथे दशमें स्थान में पापग्रह हो तो पिता को अरिष्ट होता है। जो लग्न स्थान या सप्तम स्थान में मंगल हो पंचम में सूर्य और बारहवे स्थान में राहु हो तो वह बालक निस्चय प्रसिद्द पुरुष होता है। *यदि बुध और बृहस्पति दशम स्थान में हो और १,४,७,१० सूर्य मंगल तथा तीसरे ग्यारवें घर में पाप गृह हो तो बालक के हाथ या पेरो में विकार होता है और छ उंगलिया होती है। *यदि बारहवें स्थान में चन्द्र मंगल हो तो बाई आँख में खराबी करते है यदि बारहवें सूर्य और राहु हो तो दाहिना नेत्र में खराबी होती है। *यदि तीसरे स्थान में शुक्र हो सिंह और मेष का बृहस्पति हो और दशवें घर में मंगल सूर्य हो तो बालक गूंगा होता है। *यदि सिंह लग्न में जन्म हो और सप्तम स्थान में शनि हो तो ब्राह्मण घर में जन्म लेते हुए भी म्लेच्छ होगा। *जो पांचवें सातवें नवें बारहवें आठवें तथा लग्न में इनमे किसी स्थान में क्षिणचन्द्रमा पापगृहयुक्त हो और बलवान होकर शुक्र बुध बृहस्पति इनमे से कोई शुभगृह न देखता हो तो या इनसे युक्त न हो तो बालक की मृत्यु हो जाती है। *यदि कृष्ण पक्ष में दिन में जन्म हुआ हो और शुक्ल पक्ष में रात को जन्म हुआ हो उस वक्त छठे और आठवें स्थान में चन्द्रमा हो तो सम्पूर्ण अरिष्ट निवारण होते है। ज्योतिष उपाय से कुछ हद तक सहूलियत मिल जाती है। https://youtu.be/jHc8K5mwqvA http://asthajyotish.in https://www.youtube.com/c/JyotishGuruMk 1 2 3 4 5 6 2

Monday, 25 October 2021

वास्तु अनुसार घर के परदे के रंग कैसे लगाऐं

वास्तु के मुताबिक कैसे हों परदों के रंग वास्तु के मुताबिक, यह केवल दीवारों के रंग ही नहीं बल्कि कमरे में मौजूद सारे रंग हमें प्रभावित करते हैं. परदों के मुफीद रंग भी कमरे को सुकूनभरा बनाते हैं. आप ऑफ वाइट, वाइट, रोजी रेड इत्यादि रंग परदों के लिए चुन सकते हैं. ये रंग शांति और आराम से जुड़े होते हैं, जो बेडरूम के लिए शानदार माने जाते हैं. बेडरूम में काले रंग के परदे ना लगाएं. वास्तु के मुताबिक, लिविंग रूम के परदे आप पीले, हरे और नीले में चुन सकते हैं जबकि डाइनिंग रूम के लिए ग्रीन, पिंक और ब्लू रंग अच्छे रहेंगे. हरा रंग उम्मीद का प्रतीक है और सद्भाव और सेहत का प्रतिनिधित्व करता है. नीला रंग नई शुरुआत को दर्शाता है तो वहीं पिंक प्यार को. बाथरूम के परदे ग्रे, पिंक, वाइट और ब्लैक का मिश्रण हो सकते हैं. उत्तरमुखी कमरों में परदे हल्के हरे रंग के होने चाहिए. वास्तु के अनुसार उत्तर-पश्चिम की ओर मुंह वाले कमरों में सफेद रंग के परदे होने चाहिए. पश्चिममुखी कमरों में ग्रे रंग के परदे होने चाहिए. दक्षिण-पूर्व की ओर मुंह वाले कमरों में लाल या गुलाबी रंग के परदे होने चाहिए. उत्तर-पूर्व की ओर मुंह वाले कमरों में पीले रंग के परदे होने चाहिए. वास्तु के मुताबिक कैसी हो फ्लोरिंग वास्तु के अनुसार फर्श का रंग हल्का, पीला और तटस्थ रंगों में होना चाहिए. सफेद संगमरमर या ग्रेनाइट उपयुक्त हैं, क्योंकि वे शांतिपूर्ण वातावरण को बढ़ाते हैं. लकड़ी के फर्श का उपयोग घर के उत्तर, उत्तर-पूर्व या पूर्व दिशा में भी किया जा सकता है. इसके अलावा, उत्तर-पूर्व दिशा में, फर्श के लिए नीले रंग के शेड का इस्तेमाल किया जा सकता है. किचन में ब्लैक फ्लोरिंग से बचें. हालांकि, दक्षिण-पूर्व दिशा में लाल या गुलाबी रंग का फर्श रखना सही है. दक्षिण-पश्चिम दिशा के कमरों में फर्श पीले रंग का होना चाहिए.
http://asthajyotish.in वास्तु के मुताबिक रंगों का महत्व रंग प्रतिनिधित्व लाल उत्साह, ताकत, भावनाएं और गर्मजोशी नीला सौंदर्य, संतोष, भक्ति, सत्य हरा प्रगति, सेहतबक्श, उपजाऊ, समृद्धि सफेद पवित्रता, खुलापन, निर्दोष, लग्जरी पीला आशावाद, खुलापन, अध्ययन, बुद्धिमत्ता नारंगी दृढ़ संकल्प, लक्ष्य, अच्छा स्वास्थ्य, आराम भूरा स्थिरता, संतुष्टि, आराम पर्पल ऐश्वर्य, लग्जरी, अनुग्रह, अभिमान अधीक जानकारी प्राप्त करने हेतु संपर्क करें ज्योतिष और वास्तु समाधान 🏠Vastu Guru_ Mk.✋ 👉WP. 9333112719

Saturday, 16 October 2021

Diwali 2021 : कब है दीपावली पूजन और शुभ मुहूर्त

कब है दीपावली पूजन और शुभ मुहूर्त

2021 में।


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Diwali 2021: हिंदू धर्म में दिवाली के त्योहार का विशेष महत्व है. हिंदू कैलेंडर और पौराणिक कथाओं के अनुसार, दिवाली कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन मनाई जाती है. इस साल कार्तिक अमावस्या 4 नवंबर 2021 को है. लोगों को हर साल दिवाली (Diwali 2021) के त्योहार का बेसब्री से इंतजार रहता है.

दशहरा (Dussehra 2021) खत्म होते लोग दिवाली की तैयारी में लग गए हैं. दशहरा के पर्व से 20 दिन बाद दिवाली का पर्व मनाया जाता है. दिवाली का त्यौहार लक्ष्मी जी को समर्पित है. इस दिन धन की देवी मां लक्ष्मी और भगवान गणेश जी की पूजा की जाती है. ऐसे में लक्ष्मी पूजन के लिए शुभ मुहूर्त (Diwali Shubh Muhurt) की जानकारी होनी बहुत जरूरी है.

मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का समय

हिंदू कैलेंडर Diwali Muhurt in Calendar) के अनुसार, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का समय शाम 06 बजकर 09 मिनट से रात 08 बजकर 20 मिनट तक का माना जा रहा है. पूजा की अवधि- 1 घंटे 55 मिनट की होगी. वहीं प्रदोष काल- शाम 17:34:09 बजे से रात 20:10:27 बजे तक जबकि, वृषभ काल- शाम 18:10:29 बजे से रात 20:06:20 बजे तक माना जा रहा है.

दिवाली पर निशिता काल मुहूर्त

निशिता काल- रात 23:39 बजे से 5 नवंबर रात 00:31 बजे तक
सिंह लग्न- 5 नवंबर रात 00:39 बजे से तड़के 02:56 बजे तक

दिवाली शुभ चौघड़िया मुहूर्त

सुबह का मुहूर्त: 06:34:53 बजे से 07:57:17 बजे तक
सुबह का मुहूर्त: 10:42:06 बजे से दोपहर 14:49:20 बजे तक
सायंकाल मुहूर्त: शाम 16:11:45 बजे से रात 20:49:31 बजे तक
रात्रि मुहूर्त: रात 24:04:53 बजे से रात 01:42:34 बजे तक

एक ही राशि में होंगे चार ग्रह

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, इस साल दिवाली पर सूर्य, मंगल, बुध और चंद्रमा एक ही राशि पर विराजमान होंगे. माना जा रहा है कि तुला राशि में इन चारों ग्रहों के रहने से शुभ परिणाम देखने को मिलेंगे. बता दें कि तिष शास्त्र में सूर्य को ग्रहों का राजा, मंगल को ग्रहों का सेनापति, बुध को ग्रहों का राजकुमार और चंद्रमा को मन का कारक माना गया है.

लक्ष्मी पूजन की विधि

  • दिवाली की सफाई बहुत जरूरी है. अपने घर के हर कोने को साफ करने के बाद गंगाजल छिड़कें.
  • लकड़ी की चौकी पर लाल सूती कपड़ा बिछाएं और बीच में मुट्ठी भर अनाज रखें.
  • कलश (चांदी/कांस्य का बर्तन) को अनाज के बीच में रखें.
  • कलश में पानी भरकर एक सुपारी (सुपारी), गेंदे का फूल, एक सिक्का और कुछ चावल के दाने डाल दें. -कलश पर 5 आम के पत्ते गोलाकार आकार में रखें.
  • केंद्र में देवी लक्ष्मी की मूर्ति और कलश के दाहिनी ओर (दक्षिण-पश्चिम दिशा) में भगवान गणेश की मूर्ति रखें.
  • एक छोटी थाली लें और चावल के दानों का एक छोटा सा पहाड़ बनाएं, हल्दी से कमल का फूल बनाएं, कुछ सिक्के डालें और मूर्ति के सामने रखें.
  • अब देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश को तिलक करें और दीपक जलाएं. कलश पर भी तिलक लगाएं.
  • अब भगवान गणेश और लक्ष्मी को फूल चढ़ाएं.
  • नारियल, सुपारी, पान का पत्ता माता को अर्पित करें.
  • देवी की मूर्ति के सामने कुछ फूल और सिक्के रखें.
  • थाली में दीया लें, पूजा की घंटी बजाएं और लक्ष्मी जी की आरती करें.
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Monday, 11 October 2021

करवा चौथ व्रत कैसे करें सरल विधि

 करवा चौथ व्रत कैसे करें सरल विधि और सामग्री


स्त्रियां इस व्रत को पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं। यह व्रत अलग-अलग क्षेत्रों में वहां की प्रचलित मान्यताओं के अनुरूप रखा जाता है। भले ही इन मान्यताओं में थोड़ा-बहुत अंतर होता है, लेकिन सार सभी का एक होता है पति की दीर्घायु।  

करवा चौथ
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जानकारों के मुताबिक महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आ पड़ते हैं। द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। वह कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करें तो इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है। द्रौपदी विधि विधान सहित करवाचौथ का व्रत रखती है जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार की कथाओं से करवा चौथ का महत्त्व हम सबके सामने आ जाता है।
शास्त्र के अनुसार किसी भी व्रत में पूजन विधि का बहुत महत्व होता है। अगर सही विधि पूर्वक पूजा नहीं की जाती है तो इससे पूरा फल प्राप्त नहीं हो पाता है। करवा चौथ की पूजन सामग्री और व्रत की विधि-     
👉करवा चौथ पर्व की पूजन सामग्री
कुंकुम, शहद, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मेंहदी, मिठाई, गंगाजल, चंदन, चावल, सिन्दूर, मेंहदी, महावर, कंघा, बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, मिट्टी का टोंटीदार करवा व ढक्कन, दीपक, रुई, कपूर, गेहूँ, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, छलनी, आठ पूरियों की अठावरी, हलुआ, दक्षिणा के लिए पैसे।
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सम्पूर्ण सामग्री को एक दिन पहले ही एकत्रित कर लें। व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहन लें व शृंगार भी कर लें। इस अवसर पर करवा की पूजा-आराधना कर उसके साथ शिव-पार्वती की पूजा का  विधान है, क्योंकि माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके शिवजी को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था इसलिए शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा का धार्मिक और ज्योतिष दोनों ही दृष्टि से महत्व है। व्रत के दिन प्रात: स्नाानादि करने के बाद संकल्प बोल कर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें।
👉करवा चौथ पूजन विधि
1. प्रात: काल में नित्यकर्म से निवृ्त होकर संकल्प लें और व्रत आरंभ करें।
2. व्रत के दिन निर्जला रहे यानि जलपान ना करें।
3. व्रत के दिन प्रात: स्नानादि करने के बाद संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें।
4. प्रात: पूजा के समय मन्त्र के जप से व्रत प्रारंभ करें।
मंत्र: 'मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।'
5. घर के मंदिर की दीवार पर गेरू से फलक बनाकर चावलों को पीसे। फिर इस घोल से करवा चित्रित करें। इस रीती को करवा धरना कहा जाता है।
6. शाम के समय, मां पार्वती की प्रतिमा की गोद में श्रीगणेश को विराजमान कर उन्हें लकड़ी के आसार पर बिठाए।
7. मां पार्वती का सुहाग सामग्री आदि से श्रृंगार करें।
8. भगवान शिव और मां पार्वती की आराधना करें और कोरे करवे में पानी भरकर पूजा करें।
8. सौभाग्यवती स्त्रियां पूरे दिन का व्रत कर व्रत की कथा का श्रवण करें।
9. सायं काल में चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही पति द्वारा अन्न एवं जल ग्रहण करें।
10. पति, सास-ससुर सब का आशीर्वाद लेकर व्रत को समाप्त करें।
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Tuesday, 31 August 2021

कैंसर रोग दूर होंगे इस मंत्र द्वारा

 कैंसर जैसे रोग दूर कर सकते हैं सरल मंत्र जप द्वारा।

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मंत्रों की शक्ति से रोग भागते हैं। मंत्रों में गजब की शक्ति होती है। इनका नियमित जप न केवल जातक को मानसिक शांति देता है, बल्कि उन्हें होने वाली गंभीर बीमारियों को भी दूर भगा सकता हैं। अब आप कितना करते है यह तो आप पर निर्भर करता हैं। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं यदि कुछ रोग जड़ से सामाप्त हो जाएं।

मस्तिष्क रोग

ॐ उमा देवीभ्यां नम:।

यह मंत्र मस्तिष्क संबंधी विभिन्न रोगों जैसे सिरदर्द, हिस्टीरिया, याददाश्त जाने आदि में लाभदायी माना जाता है।


आंखों के रोग


ॐ शंखिनीभ्यां नम:।

इस मंत्र से जातक को मोतियाबिंद सहित रतौंधी, नेत्र ज्योति कम होने आदि की परेशानी में लाभ मिलता है।


हृदय रोग

ॐ नम: शिवाय संभवे व्योमेशाय नम:।

हृदय संबंधी रोगों से अधिकांश लोग पीड़ित होते हैं। इसलिए अगर वे इस मंत्र का जप करें, तो उन्हें लाभ मिलता है।


स्नायु रोग

ॐ धं धर्नुधारिभ्यां नम:।


कान संबंधी रोग

ॐ व्हां द्वार वासिनीभ्यां नम:।

कर्ण विकारों को दूर करने में यह मंत्र आश्चर्यजनक भूमिका निभाता है।


कफ संबंधी रोग

ॐ पद्मावतीभ्यां नम:।


श्वांस रोग

ॐ नम: शिवाय संभवे श्वासेशाय नमो नम:।


पक्षाघात रोग

ॐ नम: शिवाय शंभवे खगेशाय नमो नम:।



कैंसर रोग


ॐ नम: शिवाय शंभवे कर्केशाय नमो नम:।


यह मंत्र किसी भी तरह के कैंसर रोग में लाभदायक होता है।

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Monday, 16 August 2021

विवाह रुकवाने के उपाय

 विवाह रुकवाने के सरल उपाय


शादी रुकवाने का मंत्रज्योतिष और वास्तु समाधान  🏠Vastu Guru_ Mk.✋

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शादी व्याह के मामलें में ये कहावत बहुत प्रचलित हैं कि “आटें में चुटकी बराबर नमक चलता हैं|” अर्थात शादी-व्याह कराने के लिए यदि थोड़े बहुत झूठ बोलना भी पड़े तो बोल देनी चाहिए,क्योकि किसी कि शादी करवाना एक पुण्य का काम माना जाता हैं| ऐसे में यदि हम किसी कि शादी को रुकवाना चाहते हैं,तो हम पाप के भागीदारी होंगे| परंतु कई बार परिस्थिति ऐसी बनती हैं कि हम चाहते हैं कि अमुक की शादी रुक जाए|


शादी रुकवाने का मंत्र

शादी रुकवाने का मंत्र

क्योकि जिससे हम प्रेम करते हैं,उसकी शादी अपने आँखों के सामने किसी और से होते हुए नहीं देख सकते हैं| परंतु कई बार हम जिससे प्रेम करते हैं,घर वाले उसकी शादी किसी और से तय कर देते हैं| ऐसे में हम ज्योतिषशास्त्र में वर्णित टोटकों/उपायों को आजमा कर अपने प्रेमी कि शादी रुकवा सकते हैं| आज हम इस लेख में लाल किताब में उल्लेखित शादी रुकवाने के उपायों के बारे में जानेंगे|


यदि लड़की की शादी उसके घर वाले उसकी मर्जी के खिलाफ तय कर रहे हों,तो ऐसी परिस्थिति में लड़कियों को गुरुवार के दिन सवा लीटर दूध व सवा लीटर चना दाल का दान करना चाहिए|

यह प्रत्येक गुरुवार को तब तक करनी चाहिए,जब तक उन्हे अपना मनवांछित फल न मिल जाए| इस टोटकें को आजमाने से लड़की की शादी उस लड़के सा ना हो कर वहा होती हैं,जिस लड़के को वो पसंद करती हैं|

यदि आप अपने प्रेमी कि शादी रुकवाना चाहते हैं,तो एक नींबू लेकर उसपर अपने प्रेमी का नाम और जन्म तारीख लिख दें| अब इस नींबू को किसी भी तरीके से अपने प्रेमी के सिरहाने में रख दें|

इस टोटकें के असर से आपके प्रेमी कि शादी में अडचने पैदा हो जाएँगी| यह सतप्रतिशत आजमाया हुआ टोटका हैं|

अपनी शादी रोकने का टोटका

अपनी शादी रोकने का टोटका, यदि आपकी शादी आपके मर्जी के खिलाफ घर वालों ने तय कर दी हों,तो आप अपनी शादी रुकवाने के लिए ज्योतिषशास्त्र में दिये हुए टोटकों को आजमा सकते हैं| अपनी शादी रुकवाने के लिए कुछ टोटकाओं के बारे में जानते हैं:-


मंगलवार अथवा शनिवार को पास के भैरव मंदिर में, आटे का एक चौमुख दीप बनाए और बतियोंको लाल कुमकुम से रंग लें| तत्पश्चात दीया को प्रतिमा के समक्ष जलाए|

अब जिस लड़का अथवा लड़की से आपकी शादी की बात चल रही हों,उसका नाम लेते हुए कुछ सरसों के दाने दीपक में डाल दें| इसके बाद नीम मंत्र का जाप करे:-

मंत्र:- ध्यायेन्नीलाद्रिकांतम शशिश्कलधरम, मुंडमालं महेशम| दिगवस्त्रम पिंगकेशंग डमरूमथ सृणिं खडगपाशाभयानि||नागं घण्टाकपालं करसरसिरुहै र्बिभ्रतं भीमद्रष्टम।दिव्यकल्पम त्रिनेत्रं मणिमयविलसद किकिणी नुपुराढ्यम।।


२१ बार उपयुक्त मंत्र का जाप करने के उपरांत अब उस लड़का अथवा लड़की का नाम लेते हुए काले उरद के दानों को दीया में डाल दें| इस अनुष्ठान के पूर्ण होने के २४ घंटो के अंतराल में आपको आपकी शादी टूटने की खबर मिल जाएगी|

लौंग की सहायता से टोटका करने पर भी कोई अपनी शादी रुकवा सकता हैं| इसके लिए पाँच लौंग की आवश्यक्ता होती हैं| इन पाँच लौंगों को लेकर नीचे दिये हुए मंत्र के जाप से अभिमंत्रित कर ले|

मंत्र:- ॐ ह्रीं भैरवाय वं वं वं ह्रां क्ष्रौं नम:


अब इस अभिमंत्रित लौंग को जमीन में अपनी शादी तुड़वाने के संकल्प के साथ आधा गाड़ दें| ध्यान रहे की फूल वाला हिस्सा ऊपर रहे| यह प्रक्रिया कम से काम पाँच दिन करे| आपको अवश्य ही अपना मनवांछित फल की प्राप्ति होगी|


प्रेमी की शादी रोकने का उपाय

हमारे भारतीय समाज में शादी-व्याह तय करने में हमारे माता-पिता अहम भूमिका निभाते हैं| ऐसे में कई बार ऐसा होता हैं कि जिससे हम प्यार करते उसकी शादी उसके माता-पिता कही और तय कर देते हैं| यदि हम अपने प्रेमी कि शादी को रुकवाना चाहते हैं,तो हमें ज्योतिषशास्त्र में बताये हुए निम्न उपायों को आजमाना चाहिए:-


प्रेमी की शादी तोड़ने के लिए कन्या मासिक धर्म के समय होने वाले रक्तस्त्राव और अपने प्रेमी की तस्वीर दोनों को साथ में लेकर उन्हे जला कर एक भस्म तैयार कर लें| अब इस भस्म से किसी भी तरह से अपने प्रेमी को तिलक लगा दें| तत्पश्चात निम्न मंत्र का २१ बार तीन माला जाप करें-

मंत्र- अरहंताणं यीङ्ग हीङ्ग ब्रूम ब्रूम फट स्व:_


इस मंत्र के प्रभाव से आपके प्रेमी की शादी अथवा सगाई रुक जाएगी|

अपने प्रेमी की शादी अथवा सगाई रुकवाने के लिए ज्योतिषशास्त्र में एक सिद्ध मंत्र का उल्लेख मिलता हैं,जिसके प्रतिदिन १०८ माला जाप से आपके प्रेमी की शादी/सगाई किसी न किसी कारण से रुक जाएगी|

मंत्र- ए सः वल्लरी क्ली कर क्ली कामपिशाचप, अमुकी काम ग्राह स्वपने मम रुपे निखे विदास्य: ||


उपयुक्त मंत्र का उपयोग यदि सही ढंग से किया जाए तो,यह मंत्र बहुत ही प्रभावकारी सिद्ध होगा|

एक कच्चे मिट्टी के बर्तन में १०० किलोग्राम चावल, १०० किलोग्राम काले तिल भर लें| अब एक सफ़ेद कपड़ा पर अपने प्रेमी का नाम व जन्म तिथि लाल सिंदूर से लिख दें| अब इस बर्तन को उसी सफ़ेद कपड़े से बांध दें| इसके बाद इस बर्तन को किसी सुनसान चौराहे पर रात्री के १२ बजे रख दें| इस बर्तन के सामने एक दीपक जला कर सात बार अपने प्रेमी का नाम पुकारे| ध्यान रहे कि वापस आते हुए पीछे मुड़ कर ना देखे| प्रेमी कि शादी तुड़वाने का यह रामबाण टोटका हैं|

प्रेमी की सगाई तोड़ने के उपाय

प्रेमी की सगाई तोड़ने के उपाय, यदि आप जिससे प्रेम करते हैं,उसकी सगाई किसी और से तय हो गयी हों,तो यह सगाई तुड़वाने के लिए जातक निम्नलिखित ज्योतिष उपायों को आजमा सकता हैं:-


पुष्य नक्षत्र काल में जातक एक उंगली की मानव हड्डी को लेकर इसे कील का रूप दे दे|

अब इस कील रूपी हड्डी को नीचे दिये हुए मंत्र के १००८ माला जाप के साथ सिद्ध करलें|

“मंत्र- ॐ ह्रीं (अमुक) फट स्व:”


मंत्र जाप के समय अमुक की जगह प्रेमी कि जिससे सगाई हुई हैं,उसका नाम ले|

अब इस सिद्ध किए हुए हड्डी को जिन दों व्यक्ति कि सगाई हुई हैं,उनमे से एक के घर या तो फेक दे या मिट्टी में दबा दें|

इस टोटके के प्रभाव के चलते केवल ११ दिनों में आपकी मनोकामना पूर्ण हों जाएगी और आपके प्रेमी कि सगाई टूट जाएगी|

प्रेमी कि सगाई तोड़ने के मंत्र में निम्न मंत्र भी काफी कारगर सिद्ध हुई हैं:-

मंत्र –” ॐश्री हिं चूँडामनियाये स: रिद्धि-सिद्धि पिशाचिनी रूपाये स्व:”


सबसे पहले उपयुक्त मंत्र का १०८ बार जाप करे| तत्पश्चात कपड़े की एक पुतली बनाकर इस मंत्र से इस पुतली को अभिमंत्रित करते हुए प्रेमी के नाम की फूँक मारे|

अब इस पुतली को प्रेमी के घर के पास जमीन में गाड़ दें|

इस टोटकें का असर से आपके प्रेमी की सगाई किसी ना किसी वजह से टूट जाएगी|

जैसे कि लेख के शुरुआत में हमने इस विषय पर चर्चा कि की किसी की शादी अथवा सगाई तुड़वाना गलत कार्य हैं,परंतु यदि हमारा उद्देश सही हो,और हम निस्वार्थ भाव से किसी की शादी रुकवाना चाहते हैं,तो हम उपयुक्त वर्णित सभी उपायों व टोटकों में से किसी को भी आजमा सकते हैं|

Note- कोई भी उपाय करने से पहले किसी अच्छे ज्योतिष से परामर्श लें। हानि भी हो सकती है। इसके जिम्मेदार आप खुद होंगे। 

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रत्न धारण कैसे करें?

Jyotishgurumk बृहद संहिता पुराणों पर आधारित आचार्य वाराहमिहिर द्वारा स्वरचित सुन्दर ग्रन्थ है। वाराहमिहिर के इस ग्रन्थ में रत्नों की उत्पत्...