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Thursday, 17 February 2022

हस्तरेखा में * निशान होने पर क्या असर होगा

व्यक्ति को बदनामी दिलाता है इस रेखा पर बना निशान
ज्योतिष और वास्तु समाधान 🏠Vastu Guru_ Mk.✋ 👉WP. 9333112719 हस्तरेखा में क्रॉस का निशान भी बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन इस निशान का कुछ पर्वत पर शुभ परिणाम मिलता है तो कुछ पर नकारात्मक। यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्रॉस का चिह्न कहां है। यहां पर हम आपको क्रॉस के निशान और इसके परिणाम के बारे में बताने जा रहे हैं। -यदि किसी व्यक्ति के गुरु पर्वत पर क्रॉस का निशान है तो यह उसके सुख में बढ़ोतरी करता है। गुरु पर्वत पर क्रॉस का निशान व्यक्ति के जीवनसाथी के शिक्षित एवं धनी कुल से मिलने का इशारा करता है। हस्तरेखा विज्ञान में गुरु पर्वत यानी बृहस्पति पर्वत पर क्रॉस के चिह्न को शुभ माना गया है। बाकी पर्वत पर इसके नकारात्मक परिणाम मिलते हैं। -यदि क्रॉस का चिह्न शनि पर्वत पर है तो ऐसे व्यक्ति को लड़ाई में चोट लगती है। इस पर्वत पर निशान व्यक्ति को अकाल मृत्यु की ओर ले जाता है। -सूर्य पर्वत पर क्रॉस का निशान शुभ नहीं माना गया है। यहां क्रॉस का निशान होने से व्यक्ति बदनामी का पात्र बनता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा व्यापार में घाटा बना रहता है। -बुध पर्वत पर क्रॉस का निशान व्यक्ति को झूठा और धोखेबाज बनाता है। ऐसे लोगों से हमेशा दूर रहना चाहिए। -केतु पर्वत पर क्रॉस का निशान होना व्यक्ति की शिक्षा में अवरोध को बताता है। बचपन में बीमारी अथवा अन्य किसी कारण से ऐसे व्यक्ति अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते। -मंगल पर्वत पर क्रॉस का चिह्न होना व्यक्ति को झगड़ालू बनाता है। यह निशान व्यक्ति को जेल तक पहुंचाता है। (इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं तथा इन्हें अपनाने से अपेक्षित परिणाम मिलेगा। जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।) क्या आप अपनी लाईफ को लेकर चिंतित हैं। आपके बनते कार्य बिगड़ रहे हैं। आप घर, परिवार, व्यापार, नौकरी में परेशानी आ रही है।, कन्या/पुरुष विवाह में देरी हो रही है। आप एक ही स्थान पर समाधान प्राप्त कर सकते हैं। बस WhatsApp करें हमारे no. 9333112719 पर। 💯% 👉(आप अपना name, 👉date of birth, 👉Time of birth, 👉Palase of birth, दें)🔯 आपके समस्या का समाधान हम देंगे। 👉(Online समाधान pay prices in ₹ 300/- only) ✋नाम नहीं कर्म में विश्वास रखें 🙏 हमारे साईट पर जाएं:✓ http://asthajyotish.in https://asthajyotish.business.site https://sites.google.com/view/asthajyotish https://www.youtube.com/c/JyotishGuruMk https://asthajyotish10.wixsite.com/asthajyotish-1 http://vastujyotishsamadhan.blogspot.com https://www.instagram.com/poddarjeevastu https://m.facebook.com/profile.php?ref=bookmarks# 👉Fee only 300/-🔯

Sunday, 15 August 2021

कैंसर रोग और कारक ग्रह

 किस ग्रह के कारण कैंसर रोग होते हैं

ग्रह और कैंसर रोग  
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निरोगी शरीर का अर्थ है शरीर का रोग से रहित होना ।रोग दो प्रकार के होते है एक- साध्य रोग जो कि उचित उपचार, आहार,व्यबहार ठीक हो जाते हैं दूसरे – असाध्य रोग जो कि उपचार के बाद भी व्यक्तिओं का पीछा नही छोडते है. इन्ही असाध्य रोगों मे अधिकाश रोग जिन्दगी भर साथ रहते है तथा उचित उपचार के साथ जिन्दगी के लिये घातक नही होते हैं परन्तु दो असाध्य रोग ऐसे है जिनका कोई उपचार नही है तथा वे दोनो रोगी की जान लेकर ही रहते हैं वे दो रोग हैं 01.–कैंसर02.–एड्स.
इस आलेख मे हम कैंसर रोग के ज्योतिषीय पहलू का विवेचन करने का प्रयास करते है।
 आइये पहले यह जाने कि कैंसर रोग क्या है ??
आयुर्वेद के अनुसार त्वचा की छठी परत जिसे आयुर्वेद मे रोहिणी कहते है जिसका संस्कृत मे अर्थ है कोशिकाओं की रचना. जब ये कोशिकाये क्षतिग्रस्त होती हैं तो शरीर के उस हिस्से मे एक ग्रन्थि बन जाती है इस ग्रन्थि को असमान्य शोथ भी कहती है.जिसे आयुर्वेद मे बिभिन्न स्थान और प्रकार के नामों से जाना जा ता है जैसे: अर्बुद, गुल्म, शालुका आदि. जब ये शोथ त्रिदोषों (वात,पित्त,कफ) के नियंत्रण से परे हो जाते हैं . तब यह ग्रन्थि कैंसर क रूप ले लेती हैं
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार ज्योतिष पूर्वजन्म के किये हुए कर्मो का आधार है अर्थात हम ज्योतिष द्वारा ज्ञात कर सकते हैं कि हमारे पूर्वजन्म के किये हुए कर्मो का परिणाम हमे इस जन्म मे किस प्रकार प्राप्त होगा ज्योतिर्विग्यान के अनुसार कोई भी रोग पूर्व जन्मकृत कर्मों का ही फल होता है. ग्रह उन फलों के संकेतक हैं, ज्योतिष विग्यान कैंसर सहित सभी रोगों की पहचान मे बहुत ही सहायक होता है. पहचान के साथ –साथ यह भी मालूम किया जा सकता है कि कैंसर रोग किस अवस्था मे होगा तथा उसके कारण मृत्यु आयेगी या नही, यह सभी ज्योतिष द्वारा सटीक जाना जा सकता है
वर्तमान समय में कैंसर सर्वाधिक भयप्रद बीमारी के रुप में चर्चित है । वैज्ञानिकों की लाख चेष्टा के बावजूद अभी तक इसका समुचित उपचार ढूढ़ा नहीं जा सका है । थोड़े-बहुत जो भी उपचार हैं, वो बहुत ही अर्थ साध्य हैं और पूरे तौर पर सुनिश्चित भी नहीं हैं । समुचित उपचार का अभाव ही रोग को अधिक भयावह बना दिया है । रोग का निश्चय हो जाना, मृत्यु घोषित हो जाने जैसा है । सबसे बड़ी बात ये होती है कि प्रायः घोषणा ही तब होती है जब रोग चौथे स्तर में पहुँच चुका होता है । फलतः उपचार के लिए समुचित समय भी नहीं मिल पाता ।
मानव शरीर में कैंसर की उत्पत्ति में कोशिकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कोशिकाओं में श्वेत एवं लाल रक्त कण होते हैं। ज्योतिष में श्वेत रक्त कण का सूचक कर्क राशि का स्वामी चंद्र तथा लाल रक्त कण का सूचक मंगल है। कर्क राशि का अंग्रेजी नाम कैंसर है तथा इसका चिह्न केकड़ा है। केकड़े की प्रकृति होती है कि वह जिस स्थान को अपने पंजों से जकड़ लेता है, उसे अपने साथ लेकर ही छोड़ता है। इसी प्रकार कोशिकाएं मानव शरीर के जिस अंग को अपना स्थान बना लेती है उसे शरीर से अलग करके ही कोशिकाओं को हटाया जाता है। इसलिए ज्योतिष में कैंसर जैसे भयानक रोग के लिए कर्क राशि के स्वामी चंद्र का विशेष महत्व है। इसी प्रकार रक्त में लाल कण की कमी होने पर प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ जाती है। 
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि वैदिक ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार कोई भी रोग पूर्व जन्मकृत कर्मों का ही फल होता है। ग्रह उन फलों के संकेतक हैं, ज्योतिष विज्ञान कैंसर सहित सभी रोगों की पहचान में सहायक होता है। पहचान के साथ-साथ यह भी मालूम किया जा सकता है कि कैंसर रोग किस अवस्था में होगा तथा उसके कारण मृत्यु आयेगी या नहीं, यह सभी ज्योतिष विधि द्वारा जाना जा सकता है |
इस रोग के होने में ग्रहों के साथ भाव भी पीड़ित होना चाहिए। फिर दशा/अन्तर्दशा का आंकलन किया जाना चाहिए, उसके बाद अंत में गोचर देखा जाना चाहिए |कैंसर एक लम्बी अवधि तक होने वाला रोग हैं. इसलिए छ्ठे भाव व अष्टम भाव का संबंध बनना आवश्यक है क्योकि छठा भाव रोग और आठवाँ भाव लम्बी अवधि तक होने वाले रोग हैं. शनि और राहु लम्बे समय तक चलने वाले रोगो की सूचना देते हैं. इसलिए इन दोनो ग्रहों की भूमिका भी कैंसर रोग के होने में मुख्य होती है।
कैंसर रोग का संबंध राहु, पीड़ित चंद्रमा, पीड़ित बृहस्पति या शनि से होता है और यह मेष, वृष, कर्क, तुला और, मकर राशियों से संबंधित होता है. किसी व्यक्ति की कुण्डली में चंद्रमा जब षष्ठेश या अष्टमेश होकर पीड़ित होता है और साथ ही दशा भी प्रतिकूल चल रही हो तब व्यक्ति को कैंसर रोग होने की संभावना बनती है.|शनि असाध्य एवं भयानक लंबे समय तक चलने वाले रोगों का परिचालक है। इसके संयोग से अधिक इसकी दृष्टि पीड़ादायक है।शरीर में किसी भी प्रकार की रसौली जल से होता है। अत: जल राशियों कर्क, वृश्चिक और मीन। ये जल राशियां हैं। इनके पाप ग्रस्त होने पर कैंसर की संभावना प्रबल होती है |
जन्म कुंडली में जब एक भाव पर ही अधिकतर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है, विशेषकर शनि, राहु व मंगल से तब उस संबंधित भाव वाले अंग में कैंसर होने की संभावना बनती है. जन्म कुंडली में यदि नेप्च्यून व यूरेनस आमने-सामने हो तब इसे अत्यधिक अशुभ माना जाता है और यह बहुत ही घातक परिणाम देने वाले सिद्ध हो सकते हैं। 
यदि जन्म कुंडली में दशानाथ पीड़ित होता है तब इस रोग के होने की संभावना अधिक होती है। कैंसर रोग जिस दशा में होता है, उसके बाद आने वाली दशाओं का आंकलन किया जाना चाहिए. यदि यह दशाएँ शुभ ग्रहों की है या अनुकूल ग्रह की है या योगकारक ग्रह की दशा आती है तब रोग का पता आरंभ में ही चल जाता है और उपचार भी हो जाता है.
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए भले ही कैंसर एक नयी बीमारी हो, किन्तु भारतीय विज्ञान- आयुर्वेद और ज्योतिषशास्त्र के लिए बिलकुल नया नहीं है । आयुर्वेद में कर्कटार्बुद नाम से विशद वर्णन है इस व्याधि का और समुचित चिकित्सा भी सुझायी गयी है । इसी भांति ज्योतिष में भी इसकी पर्याप्त चर्चा है । किन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि हमें अपने शास्त्रों पर भरोसा नहीं है । इसे पढ़ने, जानने, अनुसंधान करने में उतनी अभिरुचि नहीं है, जितनी पाश्चात्य पद्धतियों में । ये भी सोलह आने सच है कि हमारे शास्त्रीय विज्ञान को वर्बरता पूर्वक विदेशियों द्वारा नष्ट-भ्रष्ट किया गया है । खेद है कि आज भी वही काम , पहले से भी कहीं बढ़-चढ़कर स्वदेशियों द्वारा जारी है ।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राहु-केतु जिन भावों में होते हैं, उनसे संबंधित अंगों में कैंसर की आशंका होती है। इसके अतिरिक्त इनकी जिन ग्रहों से युति हो उनसे संबंधित अंगों में भी कैंसर होने की संभावना अधिक होती है। इनके अलावा भी जन्म कुंडली में कुछ दोष होने पर कैंसर हो सकता है। ये उपाय करें ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुंडली में स्थित जिन ग्रहों के कारण कैंसर होने की संभावना बन रही है, उन ग्रहों से संबंधित ज्योतिषिय उपाय करें व उन ग्रहों के जप पूर्ण विधि-विधान से करें। उपरोक्त उपाय करने से कैंसर होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं अथवा कैंसर होने पर भी इसका समुचित उपचार हो जाता है।

कैंसर के मुख्य कारक ग्रह मंगल, शनि, राहु, केतु एवं यूरेनस हैं। खासकर केतु एवं यूरेनस जब शनि, मंगल एवं राहु को अशुभ रूप से प्रभावित करते हैं तो कैंसर रोग होता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि राहु ग्रह का कुंडली के छठे भाव पर बुरे प्रभाव से रोग उत्पन्न होते हैं।


 
सर्वविदित है कि ज्योतिषशास्त्र पूर्वानुमान और सुनिश्चय का शास्त्र है । इसका सहारा लेकर यदि विचार करें तो समय से बहुत पहले ही स्थिति ज्ञात हो जा सकती है और तदनुरुप समुचित उपचार भी कर सकते हैं । आज इसी आलोक में अर्बुदकर्कट / कर्कटार्बुद पर विचार करते हैं ।
ज्योतिर्विग्यान के अनुसार कोई भी रोग पूर्व जन्मकृत कर्मों का ही फल होता है. ग्रह उन फलों के संकेतक हैं, ज्योतिष विज्ञान, सहित सभी रोगों की पहचान मे बहुत ही सहायक होता है. पहचान के साथ –साथ यह भी मालूम किया जा सकता है कि कैंसर रोग किस अवस्था मे होगा तथा उसके कारण मृत्यु आयेगी या नही, यह सभी ज्योतिष द्वारा सटीक जाना जा सकता है केंसर या कर्क रोग की पहचान निम्न ज्योतिषीय योग होने पर बडी आसानी से की जा सकती है—
रोग होने की स्थिति में जन्म कुंडली के साथ नवांश कुंडली, षष्टियाँश कुंडली और अष्टमांश कुंडली का भी भली-भाँति विश्लेषण करना चाहिए उसके बाद किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए। राहु को कैंसर का कारक माना गया है लेकिन शनि व मंगल भी यह रोग देते हैं. गुरु को वृद्धि का कारक ग्रह माना जाता है और कैंसर शरीर के किसी अंग में अवांछित वृद्धि से ही होता है और साथ ही यदि यह षष्ठेश या अष्टमेश होकर पीड़ित है तब कैंसर की संभावना बनती है। योगानुसार निम्न योग कैंसर कारक हो सकते हैं…
1. राहु को विष माना गया है यदि राहु का किसी भाव या भावेश से संबंध हो एवं इसका लग्न या रोग भाव से भी सम्बन्ध हो तो शरीर में विष की मात्रा बढ़ जाती है।
2. षष्टेश लग्न, अष्टम या दशम भाव मे स्थित होकर राहु से दृष्ट हो तो कैंसर होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
3. बारहवें भाव में शनि-मंगल या शनि-राहु, शनि-केतु की युति हो तो जातक को कैंसर रोग देती है।
4. राहु की त्रिक भाव या त्रिकेश पर दृष्टि हो भी कैंसर रोग की संभावना बढ़ाती है।
5. षष्टम भाव तथा षष्ठेश पीडि़त या क्रूर ग्रह के नक्षत्र में स्थित हो।
6. बुध ग्रह त्वचा का कारक है अत: बुध अगर क्रूर ग्रहों से पीडि़त हो तथा राहु से दृष्ट हो तो जातक को कैंसर रोग होता है।
7. बुध ग्रह की पीडि़त या हीनबली या क्रूर ग्रह के नक्षत्र में स्थिति भी कैंसर को जन्म देती है।
बृहत पाराशरहोरा शास्त् के अनुसार षष्ठ पर क्रूर ग्रह का प्रभाव स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद होता है यथा ”रोग स्थाने गते पापे , तदीशी पाप….. अत: जातक रोगी होगा और यदि षष्ठ भाव में राहु व शनि हो तो असाध्य रोग से पीडि़त हो सकता है।
8.सभी लग्नो में कर्क लग्न के जातकों को सबसे ज्यादा खतरा इस रोग का होता है|
9.कर्क लग्न में बृहस्पति कैसर का मुख्य कारक है, यदि बृहस्पति की युति मंगल और शनि के साथ छठे, आठवे, बारहवें या दूसरे भाव के स्वामियों के साथ हो जाये व्यक्ति की मृत्यु कैंसर के कारण होना लगभग तय है|
10.शनि या मंगल किसी भी कुंडली में यदि छठे या आठवे स्थान में राहू या केतु के साथ हों तो कैंसर होने की प्रबल सम्भावना होती है|
11.छठे भाव का स्वामी लग्न, आठवे या दसवे में भाव में बैठा हो और पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो भी कैंसर की प्रबल सम्भावना होती है|
12.किसी जातक की कुंडली में सूर्य यदि छठे, आठवे या बढ़ावे भाव में पाप ग्रहों के साथ हो तो जातक को पेट या आंतों में अल्सर और कैंसर होने की प्रबल सम्भावना होती है|
13.किसी जातक की कुंडली में यदि सूर्य कही भी पाप ग्रहों के साथ हो और लग्नेश या लग्न भी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो भी कैंसर की प्रबल सम्भावना रहती है|
14.कमज़ोर चंद्रमा पापग्रहों की राशी में छठे, आठवे या बारहवे हो और लग्न अथवा चंद्रमा, शनि और मंगल से दृष्ट हो तो अवश्य ही कैंसर होता है|
15. चंद्रमा व शनि छठे भाव में स्थिति है तब व्यक्ति को पचपन वर्ष की उम्र पार करने के बाद रक्त कैंसर हो सकता है.
16. आश्लेषा नक्षत्र, लग्न या छठे भाव से संबंधित होने पर और मंगल से पीड़ित होने पर कैंसर होने की संभावना बनती है.
17. शनि छठे भाव में राहु के नक्षत्र में स्थित हो और पीड़ित हो तब कैंसर रोग की संभावना बनती है.
18. शनि और मंगल की युति छठे भाव में आर्द्रा या स्वाति नक्षत्र में हो रही हो.तो कैंसर की संभावना बनती है |
19. मंगल और राहु छठे या आठवें भाव को पीड़ित कर रहे हों तब त्वचा का कैंसर हो सकता है.
20. छ्ठे भाव में मेष राशि हो या स्वाति या शतभिषा नक्षत्र पड़ रहा हो और शनि छठे भाव को पीड़ित कर रहा हो तब त्वचा कैंसर का रोग हो सकता है.
21. जन्म कुंडली में राहु या केतु लग्न में षष्ठेश के साथ हो तो पेट का कैंसर हो सकता है |
22. छठा भाव पीड़ित हो और राहु या केतु, आठवें या दसवें भाव में स्थित हो तो पेट का कैंसर हो सकता है |
23. यदि किसी जातिका की कुण्डली में लग्नेश अष्टम, षष्टम अथवा द्वाद्श में चला गया हो, लग्न स्थान पर क्रूर व पापी ग्रहों की स्थिति हो, चतुर्थ स्थान का अधिपति शत्रुगृही होकर पीड़ित हो, छठे भाव का अधिपति चतुर्थेश से संबंध बना रहा हो तो ऐसी स्थिति में जातिका को ब्रेस्ट कैंसर या स्तनों में बड़े विकार की संभावना प्रबल रूप से मौज़ूद होती है।
24. छठे भाव में कर्क अथवा मकर राशि का शनि स्तन कैंसर का संकेत देता है।
25. छठे भाव में कर्क या मकर का मंगल स्तन कैंसर का द्योतक है।
26. यदि छठे भाव का स्वामी पाप ग्रह हो और लग्नेश आठवें या दसवें घर में बैठा हो तो कैंसर रोग की आशंका रहती है।
27. छठे भाव में कर्क राशि में चंद्रमा हो, तब भी कैंसर का द्योतक है।
28. चंद्रमा से शनि का सप्तम होना कैंसर की संभावना को प्रबल बनाता है।
इनके अतिरिक्त ज्योतिष रत्न के पाठ 24 के अनुसार—
१. राहु को विष माना गया है यदि राहु का किसी भाव या भावेश से संबन्ध हो एवम इसका लग्न या रोग भाव से भी सम्बन्ध हो तो शरीर मे विष की मात्रा बढ जाती है
२. षष्टेश लग्न ,अष्टम या दशम भाव में स्थित होकर राहु से दृष्ट हो तो कैंसर होने की सम्भावना बढ जाती है
३. बारहवे भाव मे शनि-मंगल या शनि –राहु,शनि-केतु की युतिहो तो जातक को कैंसर रोग देती है.
४. राहु की त्रिक भाव या त्रिकेश पर दृष्टि हो भी कैंसर रोग की संभावना बढाती है.
इनके अलावा निम्न बिन्दु भी कैसर रोग की पह्चान के लिये मेरे अनुभव सिद्ध है
१ षष्टम भाव तथा षष्ठेश पीडित या क्रूर ग्रह के नक्षत्र मे स्थित हो
२ बुध ग्रह त्वचा का कारक है अतः बुध अगर क्रूर ग्रहो से पीडित हो तथा राहु से दृष्ट हो तो जातक को कैसर रोग होता है
३ बुध ग्रह की पीडित या हीनबली या क्रूर ग्रह के नक्षत्र मे स्थिति भी कैंसर को जन्म देती है
बृहत पाराशरहोरा शास्त् के अनुसार षष्ठ पर क्रूर ग्रह का प्रभाव स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद होता है यथा ” रोग स्थाने गते पापे , तदीशी पाप..
अतः जातक रोगी होगा और यदि षष्ठ भाव में राहु व शनि हो तो असाध्य रोग से पीडित हो सकता है
कैंसर नाम की एक राशि होती है, जिसे भारतीय ज्योतिष में कर्कराशि कहते हैं । मेषादि राशिक्रम में इसका स्थान चौथा है । इसके स्वामी चन्द्रमा हैं । स्वभाव से यह चर राशि है । कालपुरुष के हृदय का प्रतिनिधित्व करती है ये राशि, फलतः जातक के हृदय से इसका विशेष सम्बन्ध माना जाता है । लग्नादि क्रम से चतुर्थ भाव को कर्क का प्रतिनिधित्व मिला है । अतः भले ही किसी जातक का जन्मलग्न कोई भी हो, उसके चतुर्थ भाव का विचार कर्करोग (कैंसर) विचार के सम्बन्ध में अवश्य करना चाहिए । साथ ही ये भी देखना चाहिए कि कर्कराशि जातक की कुण्डली में किस भाव में पड़ी हुयी, यानी कि जातक का जन्मलग्न क्या है ।  
जन्मांकचक्र के चतुर्थ भाव में राहु की अवस्थिति हो, अथवा कर्कराशि पर आरुढ़ होकर राहु किसी भी भाव में विराज रहा हो तो कर्करोग होने की सर्वाधिक आशंका जतायी जा सकती है । साथ ही ये भी देखना चाहिए कि चतुर्थ भाव और इसका भावेश किसी न किसी तरह यदि राहु से प्रभावित – दृष्ट, पीड़ित हो तो कर्करोग की आशंका जतायी जा सकती है । राहु की पूर्ण दृष्टिभोग के सम्बन्ध में अन्यान्य ग्रहों से किंचित भिन्न मत पर ध्यान देना चाहिए ।
यथा—सुत मदन नवान्ते पूर्ण दृष्टिं तमस्य , युगल दशम गेहे चार्द्ध दृष्टिं वदन्ति । सहज रिपु पश्यन् पाददृष्टिं मुनीन्द्राः , निज भुवन मुपेतो लोचनांधः प्रदिष्टः ।।  
(पंचम,सप्तम,नवम- पूर्ण दृष्टि, द्वितीय और दशम- अर्द्ध दृष्टि, तृतीय और षष्ठम पाद दृष्टि तथा स्वगृह(कन्या राशि पर)राहु लोचनांध होते हैं । )
 चतुर्थ भावपति का नीचस्थ वा शत्रुक्षेत्रस्थ होने पर भी कर्करोग की स्थिति हो सकती है । इन स्थितियों के अतिरिक्त चन्द्रमा, शनि, मंगल, सूर्य आदि का भी गम्भीरता से विचार अवश्य कर लेना चाहिए । क्यों कि उक्त ग्रहों की स्थिति, युति, दृष्टि आदि का सीधा प्रभाव पड़ता है रोग की स्थिति, मात्रा और अंग वा प्रकार पर । जैसे मंगल की विकृति से ब्लडकैंसर का खतरा हो सकता है । बुध की विकृति से ग्रन्थियों का बाहुल्य रहेगा इत्यादि 
मुख्यतः लोग षष्ठम भाव से रोग का विचार करते हैं, किन्तु इसके अतिरिक्त प्रथम, अष्टम व द्वादश भाव का भी गहन विचार करना चाहिए । साथ ही द्वितीय एवं सप्तम भाव को मारकेशत्व प्रधान होने के कारण इनपर भी विचार अवश्य करना चाहिए । रोग की साध्यासाध्यता की जानकारी हेतु सूर्य के बलाबल का ध्यान देना आवश्यक है । प्रभावी (जिम्मेवार) ग्रह (रोगकारक) की महादशा, अन्तर्दशादि के समय रोग की उग्रता समझनी चाहिए । मारकेशत्वों के बलाबल से साध्यासाध्यता की पहचान की जा सकती है ।
समझें केंसर के उपचार और उपाय को–
जन्म कुंडली में भावों के अनुसार शरीर से संबंधित ग्रहों के रत्नों का धारण करने से रोग-मुक्ति संभव होती है। लेकिन कभी-कभी जिसके द्वारा रोग उत्पन्न हुआ है, उसके शत्रु ग्र्रह का रत्न धारण करना भी लाभप्रद होता है। इसका आकलन किसी नीम हकीम ज्योतिषी से करवाना घातक हो सकता है |जिसे बहुत गंभीर समझ हो उसकी ही सलाह इस रोग में लेनी चाहिए और ज्योतिषीय उपाय करने चाहिए।
एक बात बहुत स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि मात्र ज्योतिषीय मंत्र-तंत्र-यंत्र से ही किसी रोग का निवारण नहीं किया जा सकता है।क्योकि ग्रह स्थितियों को सुधारकर भी आप शरीर में आये भौतिक परिवर्तन को नहीं बदल सकते |दूध जब तक दूध है तभी तक उसे बचा सकते हैं ,दही बनने पर वह दूध नहीं हो सकता वापस |इसलिए मात्र ज्योतिषीय उपायों के बल पर बैठना घातक होगा |
तंत्र मंत्र की सीमा वहां तक है की रोगी में सकारात्मक ऊर्जा ,धनात्मक ऊर्जा बढ़ा देंगे जिससे लड़ने की क्षमता बढ़ जाए |भाग्य अगर किन्ही नकारात्मक ऊर्जा के कारण बाधित है अथवा नकारात्मक ऊर्जा रोग बढ़ा रही है तो उसे तंत्र मंत्र हटा देंगे |जीवनी शक्ति बढ़ा देंगे ,पर रोग हो गया तो उसे केवल इनसे ख़त्म करना मुश्किल है। 
ज्योतिषीय उपाय ,तंत्र मंत्र के साथ अवचेतन को बल देना बेहतर होता है क्योकि अंततः सारा खेल अवचेतन को ही करना होता है अगर यह निराश हताश हुआ तो फिर न दवा काम करेगी न कोई उपाय | इन सभी के साथ-साथ औषधि सेवन, चिकित्सकों के द्वारा दी गई सलाह आदि का पालन किया जाना उतना ही आवश्यक है। तभी इसका पूर्ण लाभ उठाया जा सकता हैै। अगर समय से पूर्व किसी भी घटना या दुर्घटना के बारे में जानकारी हो जाये तो उससे बचने का हर संभव प्रयास किया जा सकता है पर दुर्घटना होने के बाद मुश्किल हो जाती है।
स्तन कैंसर के ज्योतिषीय कारण –आखिर ब्रेस्ट कैंसर होता क्यों है ??
इसका जवाब जब आप ज्योतिष से जानने की कोशिश करेंगे तो आपको आसानी होगी।
क्या स्तन कैंसर का कोई ज्योतिषीय कारण भी हो सकता है? विज्ञान इसे खारिज कर सकता है परंतु सदियों पुराने ज्योतिष शास्त्र में इस व्याधि की ओर भी संकेत किया गया है।
जातक की कुंडली के कई योग बताते हैं कि अगर वे प्रभावशाली हो जाएं तो स्तन कैंसर जैसा रोग उत्पन्न हो सकता है। जानिए कारण और निवारण के बारे में।
यदि लग्नेश स्वस्थान से आठवें, छठे या बारहवें भाव में चला गया हो एवं लग्न के स्थान पर क्रूर ग्रह बैठे हों तो, चौथे स्थान का स्वामी शत्रु के घर में विराजमान हो और छठे का मालिक चौथे से संबंध बनाए तो संभव है कि उस महिला को स्तन संबंधी कोई बड़ा रोग हो जाए। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि यदि किसी महिला की कुंडली का लग्न कमजोर हो, उस पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि हो अथवा वहां ऐसे ग्रह विराजमान हों जो शुभ फल देने में सक्षम न हों तो रोगी होने की आशंका प्रबल होती है। 
अगर उसके साथ ही छठा भाव भी श्रेष्ठ परिणाम न देने वाला हो, चंद्र की स्थिति प्रभावी न हो तो महिला को स्तन कैंसर हो सकता है।
अगर महिला की कुंडली में छठे या आठवें भाव में कोई क्रूर ग्रह स्थित हो तो उसे असाध्य रोग होने की आशंका होती है। 
वहीं चतुर्थ भाव में क्रर ग्रहों का योग सीने में दर्द एवं बड़े रोगों की ओर इशारा करता है। अगर समय रहते उनका इलाज नहीं कराया तो स्थिति बेकाबू हो सकती है।
ऐसे में रोगी महिला को अपने खानपान पर पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। स्वस्थ जीवनशैली की आदत डालते हुए योग, ध्यान, प्राणायाम आदि करने चाहिए। इससे वह इस स्तन कैंसर के संकट को टाल सकती है।
कुण्ष्ली् क्या आप अपनी लाईफ को लेकर चिंतित हैं।

आपके बनते कार्य बिगड़ रहे हैं। आप घर, परिवार, व्यापार, नौकरी में परेशानी आ रही है।, कन्या/पुरुष विवाह में देरी हो रही है। आप एक ही स्थान पर समाधान प्राप्त कर सकते हैं। बस WhatsApp करें हमारे no. 9333112719 पर। 💯% आपके समस्या का समाधान देंगे।

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Saturday, 7 August 2021

ट्रांसफर करने/रुकबाने के उपाय

 ट्रांसफर करवाने रुकवाने के टोटके

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संसार में लगभग सभी एक अच्छी नौकरी की चाह रखते हैं, और साथ ही यह भी चाहते हैं कि नौकरी में स्थायित्व हो। बार – बार तबादले तथा असुविधाजनक यात्राओं का झंझट ना रहे। हर कोई चाहता है कि वह एक ऐसी जगह अपना रोजगार पाए, जो उसके अनुकूल हो। मगर अधिकतर यह संभव नहीं हो पाता। सरकार की कार्यशैली, बड़े अधिकारियों की मनमर्जी या अन्य कारणों से तबादलों की प्रक्रिया सभी को झेलनी पड़ती है। कभी – कभी तो अधिकारी व्यक्तिगत चिढ़ के कारण अपने अधीनस्थ को ऐसी जगह ट्रांसफर करा देते हैं जहां जीवन बहुत मुश्किल हो। इस कारण व्यक्ति की जीवन शैली में काफी व्यवधान पड़ता है, ना ही दिनचर्या संतुलित रह पाती है और ना ही परिवार ठीक से चल पाता है। सबसे ज्यादा दिक्कत तो बच्चों की पढ़ाई के कारण आती है, तबादलों के फेर में उनकी पढ़ाई काफी अव्यवस्थित हो जाती है।


तबादला/ट्रांसफर करवाने रुकवाने के टोटके

तबादला/ट्रांसफर करवाने रुकवाने के टोटके

लेकिन सभी के मन में यही प्रश्न उठता है कि इस असुविधा से छुटकारा कैसे पाया जाए? इसलिए हम आज आपको कुछ ऐसे तरीके बताएंगे जो ना सिर्फ आपको इन तबादलों की तकलीफों से मुक्त कराएंगे, बल्कि आपके जीवन को व्यवस्थित करने में आपकी सहायता भी करेंगे।


तबादला/ट्रांसफर रोकने का टोटका


यदि आपके शीर्ष अधिकारियों द्वारा आपका तबादला किसी ऐसी जगह करवाया जा रहा है, जो आपके अनुकूल नहीं है अथवा आपकी इच्छा के विपरीत है । तो फिर आप निम्नलिखित उपाय कीजिये । इन उपायों के माध्यम से आपका तबादला रुक जाएगा और आपको कहीं और जाने के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा:


1- इसके लिए आप रविवार का व्रत रख सकते हैं या रविवार के दिन सिर्फ मीठा भोजन करें और सूर्यदेव को ताम्बे के लोटे में जल अर्पित करें । जितना हो सके नमक का सेवन रविवार को ना करें शीघ्र ही अच्छी खबर प्राप्त होगी ।


2- साथ ही प्रतिदिन नहाने के बाद “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र की एक माला का जाप करें।


3- एक इस प्रकार का सिक्का लें जिसमें किसी चेहरे की आकृति बनी हुई हो, और उसे लेकर ऐसी गली में जाएं जो पूरी तरह सुनसान हो। यह सोचते हुए जाएं यह सोचें कि वह चेहरा उस आदमी या उस अधिकारी का है, जो आपका ट्रांसफर करा रहा है; और उस सिक्के को टॉस की तरह उछालें तथा उछालते वक्त मन में बोलें कि “जो ऊपर जा रहा है वह नीचे भी आएगा”। इस विधि को करते समय ध्यान रखें कि कोई आपको देख ना पाए।


4- ढाक जिसे पलाश भी कहते हैं, के पत्तों को लेकर एक कटोरी नुमा दोना बनाएं, इस दोने में सुर्ख गुलाब की पंखुड़ियों को भर दें तथा शाम के समय अपनी कामना मन में रख कर किसी नदी में प्रवाहित कर दें ।


मनचाहे स्थानांतरण के उपाय


यदि आप अपने वर्तमान नियुक्ति स्थल से प्रसन्न नहीं हैं अथवा आपकी पोस्टिंग किसी ऐसी जगह है , जहाँ आप सहज महसूस नहीं करते हैं; और किसी ऐसी विशेष जगह तबादला चाहते हैं जो आपकी पसंदीदा हो । तो अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए आप यह उपाय आजमा सकते हैं-


1- जब भी आप अपनी नौकरी पर जाने के लिए घर से निकलें, तो एक कटोरी दही को गुड़ के साथ खाएं । ऐसा निरंतर करने से आपके तबादले की मनोकामना पूर्ण हो जाती है।


2- लगातार 21 दिन तक सूर्य देव को जल अर्पण करें, तथा अपने अधिकारी को कोई लाल रंग की वस्तु गिफ्ट करें । यदि अधिकारी को नहीं देना चाहें तो लाल रंग की कोई भी वस्तु किसी अन्य को दान करें।


3- रविवार के दिन लाल चंदन, ताम्बे का लोटा, गुड़, बिना छिलके की मसूर की दाल या गेहूं दान करें । इससे आपकी इच्छित जगह पर आपके तबादले के योग बनते हैं ।


4- अगर आप अपनी मनचाही जगह पर हैं और कहीं और तबादला होने से रोकना चाहते हैं तो 10 बड़े नींबू लेकर किसी बहती हुई नदी की धारा में अर्पित कर दें, मोकामना पूरी होगी।


मनोवांछित तबादला होने का उपाय/मंत्र:


यहाँ हम आपको कुछ मंत्र बता रहे हैं जिनकी साधना से आप अपने मनवांछित स्थल पर ट्रॉन्सफर करवा सकते हैं तथा अपनी पसंदीदा जगह पर स्थिर हो सकते हैं:


प्रतिदिन नहा धो कर पीले वस्त्र पहनें तथा एक आसन पर बैठ कर ध्यान लगाएं तथा

👉ॐ परमब्रह्म परमात्मने नमः उत्पत्ति-स्थिति-प्रलयं-कराय ब्रह्म हरिहराय,

त्रिगुणात्मने सर्व कौतुकानि दर्शय, दत्तात्रेयाय नमः (आपका नाम) सिद्धिं कुरू-कुरू स्वाहा।🌹


इस मंत्र का 21 बार जाप करें। पूजा समाप्त करने के उपरान्त भोजन कर लें, भोजन में यदि सम्भव हो तो गुड़ भी खाएं। यदि मीठे से परहेज है तो मसूर की दाल खाएं। इस विधि द्वारा मनवांछित स्थल पर नौकरी की मनोकामना की सिद्धि हो सकती है।🕉️


👉लगातार 21 दिन तक हर रोज नहाने के बाद एक तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें 108 लाल मिर्च के बीज डाल दें। और इस जल का अर्घ भगवान सूर्यदेव को दें, तथा अर्घ देते समय इस मंत्र का जाप करें

⭐ॐ घृणि सूर्याय आदित्याय नमः⭐


इस मंत्र के लगातार 21 दिनों तक जाप से मनोकामना पूरी होती है और मनचाही जगह नौकरी प्राप्त होती है।🌹


👉किसी भी शुक्रवार को प्रातः ब्रह्ममुहूर्त से पूर्व जागकर स्नान कर लें तथा इसके बाद दही या सफ़ेद मिठाई लेकर सात बार अपने ऊपर से ऊसार लें। ऐसा करते समय मन ही मन में साथ बार चंद्र देवता से प्रार्थना करें कि “हे चंद्र देव! मेरा स्थानांतरण (मनवांछित स्थान का नाम) पर करवा दीजिये। इसके बाद उस दही या मिठाई को सूर्योदय से पहले ही अपने घर के पास किसी चौराहे पर रख दें, जहाँ चन्द्रमा साफ़ नज़र आ रहा हो । अगर आपकी इच्छा पूरी हो जाए, तो उसी स्थान पर चन्द्रमा को खीर अर्पित करें।🕉️

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Friday, 6 August 2021

नवजात बेबी और शूभ मुहूर्त अनुष्ठान कब करें

 

नवजात शिशु से सम्बंधित शुभ महूर्त


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जल पूजन

संतान होने के 26वें दिन या एक महीने बाद माता का संतान के साथ जाकर जल पूजन के शुभ महूर्त

वारसोमवार,बुधवार एवं गुरूवार
मासचैत्र, पौष और क्षय मॉस को छोड़कर सभी मास मान्य हैं
पक्षदोनों
तिथिद्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, नवमी, दशमी, द्वादशी , चतुर्दशी
नक्षत्रमृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त,  श्रवण

कर्ण वेध

वारसोमवार एवं बुधवार
मासक्षय मास, अधिक मास, मल मास त्याग कर जन्म से छठे या सातवें माह में.
पक्षशुक्ल
तिथिद्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी,सप्तमी, दशमी,द्वादशी
नक्षत्रअश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्र, अनुराधा,
श्रवण, रेवती
लग्नवृषभ, मिथुन, कर्क, कन्या, तुला, धनु
विशेषजन्म से 12वें या 16वें दिन भी कर्ण वेध शुभ माना जाता है.  बालक का पहले दांया और फिर बांया और कन्या का पहले बांया और फिर दांया कान पूर्व दिशा की और मुख करके स्वर्णकार या सुहागिन स्त्री द्वारा  ही छेदना चाहिए

बालक के मुंडन हेतु शुभ महूर्त

वारसोमवार, बुधवार, गुरूवार और शुक्रवार शुभ हैं
मासचैत्र मास छोड़कर , जन्म से तीसरे, पांचवें, सातवें, या विषम वर्षों में.
पक्षशुक्ल
तिथिद्वितीया, तृतीया, पंचमी,सप्तमी एवं विशेष परिसिथियों में नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमा.
नक्षत्रअश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त,स्वाति, ज्येष्ठा, धनिष्ठा,  श्रवण, रेवती
लग्नशुभ लग्न
विशेषमाता के गर्भवती समय और रजस्वला के समय को त्यागना चाहिए.  यदि बालक पांच वर्ष से अधिक हो गया हो तो गर्भावस्था में भी मुंडन किया जा सकता है.  ज्येष्ठ मास में ज्येष्ठ  पुत्र का मुंडन निषेध है.

नामकरण संस्कार हेतु शुभ महूर्त

वारसोमवार, मंगलवार, गुरूवार और शुक्रवार शुभ हैं
माससभी
पक्षकृष्ण पक्ष
तिथिप्रथमा, द्वितीया, तृतीया,  सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी
नक्षत्रअश्विनी,  रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण,धनिष्ठा और रेवती शुभ लग्न माने गये हैं.
लग्नवृषभ, कन्या, तुला
विशेषशुभ चन्द्रमा और चार लग्न में नामकरण शुभ माना
गया है.  अनिष्ट योग, ग्रहण, श्राद्ध, क्षय मास और
व्यतिपात में नामकरण नहीं करें.
विद्वानों के मतानुसार माता और पिता कुल की तीन पीढीयों में चले आ रहे नाम नहीं रखने चाहिए.

प्रथम बार अन्न प्राशन हेतु शुभ महूर्त

वारसोमवार, बुधवार, गुरूवार और शुक्रवार शुभ हैं
मासक्षय मास, मल मास, अधिक मास छोड़कर जन्म से
छठे, सातवें, आठवें, दसवें और बाहरवें महीने में.
पक्षशुक्ल पक्ष
तिथियाँद्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, द्वादशी
, त्रयोदशी,चतुर्दशी, पूर्णिमा
नक्षत्रअश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु,  उत्तराभाद्रपद,
उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ापुष्य,  हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा,श्रवण,धनिष्ठा,शतभिषा,  रेवती
लग्नवृषभ, मिथुन, कर्क, तुला, धनु, मकर
विशेषमध्याह्न पूर्व अन्न प्रशन शुभ मन गया है. क्षय
तिथि वर्जित है.

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Thursday, 8 July 2021

छिपकिली के शुभ/अशुभ संकेत

 अगर आपके घर में छिपकली दिखाई देती है तो समझ लीजिए ये काम होने वाला है।


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आज हम आपको घर में दिखाई देने वाली छिपकली के बारे में बताने जा रहे हैं | इस लेख में आपको आपके सभी सवाल जैसे Ghar Mein Chipkali Kyu Aati Hai अगर घर में छिपकली दिखे तो क्या करना चाहिए पूजा घर में छिपकली का होना छिपकली की आवाज सुनने से क्या होता है Chipkali Ka Ghar Mein Aana Kaisa Hai सुबह-सुबह छिपकली देखना घर में छिपकली का बोलना छिपकली का घर में मरना घर में मरी हुई छिपकली देखना छिपकली का मल गिरना पॉटी करना पेशाब करना छिपकली का जमीन पर गिरना या जमीन पर चलाना छिपकली का घर में होना शुभ या अशुभ अगर घर में छिपकली दिखे तो क्या होता है, के जवाब दिए गए है | छिपकली का कौन सा रूप फलदायी होता है या छिपकली का घर में होने हमने भविष्य में होने वाली कौनसी घटना का संकेत देती है, ये जानने के लिए इस आर्टिकल को ध्यानपूर्वक पूरा पढ़े | ज्योतिष और वास्तु समाधान  🏠Vastu Guru_ Mk.✋

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Ghar Mein Chipkali Dikhai Dena

हमारे आसपास कई तरह के जीव जन्तु मौजूद होते हैं, जिनमें से कुछ तो बहुत ही डरावने होते हैं तो कुछ बहुत ही ज्यादा प्यारे लगते हैं | इनमे से कई जीव जन्तु हमारे घर में भी पाए जाते हैं, जिसमें छिपकली भी शामिल है | छिपकली लगभग हर घर में पाई जाती है | जाड़ो के मुक़ाबले गर्मियों में ये ज्यादा दिखाई पड़ती हैं | गर्मियों के मौसम में दिवार – दिवार पर छिपकली पाई जाती है, लेकिन ठंड के मौसम में छिपकली कहीं गुम हो जाती हैं और बहुत मुश्किल से दिखाई देती हैं | घर में छिपकली दिखाई देने के पीछे कई कारण होते हैं और वो आप इस लेख के अंत तक जान सकते है |

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अगर घर में छिपकली दिखे तो क्या करें

बहुत से लोगो के मन ये सवाल आते है की अगर घर में छिपकली दिखे तो क्या करना चाहिए अगर घर में छिपकली दिखे तो क्या होता है | आपको बतादे की घर में छिपकली का आना आम बात हैं | लगभग सभी के घर में छिपकली पाई जाती है | शास्त्रों में छिपकली को माता लक्ष्मी का प्रतिक बताया गया है | शकुन शास्त्र में छिपकली के दिखने और उससे जुडी गतिविधियों के बारे में विस्तृत जानकारी भी दी गई है | यहाँ तक की भारत के कुछ मंदिरों में छिपकली की पूजा तक भी जाती है | इसलिए अगर घर में छिपकली है तो हमे उनसे डरना नहीं चाहिए और ना ही कमरे / घर से बाहर निकलना चाहिए ।

छिपकली का घर में होना शुभ या अशुभ संकेत

छिपकली से मिलने वाले कई संकेत हमे भविष्य में होने वाली घटनाओ के बारे में बताते है | शास्त्र के अनुसार छिपकली का किसी विशेष समय पर दिखना, जमीन पर या शरीर पर गिरना भविष्य की शुभ-अशुभ घटनाओं का संकेत होता है | अगर आप जानना चाहते है की छिपकली का घर में होना कौनसे शुभ और अशुभ संकेत देती है | 

जानकारी यहाँ पढ़े

अगर आपको दीवाली की रात घर में छिपकली दिख जाए तो यह आपको आने वाले पूरे साल साल में किसी भी प्रकार की पैसों की कमी नही होगी | आपके जीवन मे सुख समृद्धि सदैव ही बनी रहेगी |

छिपकली की आवाज सुनने से क्या होता है : छिपकली की आवाज सुनना संभव नहीं है, फिर भी अगर भोजन करने के दौरान छिपकली का बोलना सुनाई दे जाए तो कोई शुभ समाचार या शुभ फल की प्राप्ति होती है |

छिपकली का आपस में लड़ना : छिपकली का आपस में लड़ना शुभ नहीं होता है | अक्सर ऐसा होते दिखाई देने पर घर के सदस्यों का आपस में अथवा दूसरों के साथ झगड़ा या मतभेद होता है

नर और मादा छिपकलियों का समागम : अगर छिपकली आपको समागम दिख जाए तो जरूर आपका कोई पुराना मित्र मिलने वाला हैं | नर और मादा छिपकलियों का समागम किसी पुराने मित्र या परिचित से मिलन की संभावना को बताता है |

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अगर घर में छिपकली दिखे तो क्या करना चाहिए : अगर आपको घर में छिपकली दिख जाए तो तुरंत मंदिर में या भगवान की मूर्ति के पास रखा कंकू-चावल ले आएं और इसे दूर से ही छिपकली पर छिड़क दें | ये काम करते समय अपने मन की किसी मुराद को भी मन ही मन बोलें और यह कामना करें कि वह पूरी हो जाए | शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि छिपकली की पूजा से धन सम्बन्धी समस्याएं खत्म है और धन प्राप्ति के नए मार्गों की प्राप्ति होती है |

नए घर में छिपकली के दर्शन होने के संकेत : अगर आपको नए घर में कोई छिपकली दिख जाए तो इसका सीधा-सीधा मतलब होता है कि उस घर का गृह स्वामी बीमार पड़ने वाला है, इसलिए आप कोशिश करें कि जब कभी-भी आप नए घर में दस्तक दें तो आपको छिपकली के दर्शन न हो |

घर में छिपकली आने के अच्छे बुरे संकेत  यदि आप सपने में छिपकली को शिकार करते हुए, कीड़े-मकोड़े खाते या हमला करते हुए या सपने में छिपकली को मारना छिपकली से डरना या रेंगती हुई छिपकली के सपने आते है तो बहुत ही अशुभ माने जाते है क्योकि ये सभी संकेत भविष्य में होने वाले अशुभ कार्यो या घटनाओ को दर्शाते है और अगर आप सपने में छिपकली को पकड़ते है या छिपकली आपसे डरती हुई दिखाई देती है तो ये शुभ कार्यो के संकेत होते है | इसका यह मतलब होता है की आपको भविष्य में जल्द ही शुभ समाचार या आपके साथ अच्छा होगा |

पूजा घर में छिपकली का होना : छिपकली को माँ लक्ष्मी का प्रतिक माना जाता है | इसलिए पूजा घर में छिपकली का होना बेहद शुभ माना जाता है |

सुबह-सुबह मरी हुई छिपकली देखना : मरी हुई छिपकली का बार-बार दिखना राहु के अशुभ होने का संकेत माना गया है |

घर में छिपकली का बोलना : यदि आपको छिपकली का बोलना सुनाई दे तो समझ जाइएगा कि आपको कोई शुभ समाचार सुनाई देने वाला है अन्यथा आपको कोई शुभ प्रतिफल प्राप्त होने वाला है |

छिपकली का मल गिरना पॉटी करना पेशाब करना : छिपकली के मल और इसके लार में सल्मोनेला नाम का एक बैक्टीरियम होता है, जिससे फूड प्वायजनिंग का खतरा बहुत ज्यादा होता है। आपने अक्सर सुना होगा कि खाने में छिपकली के गिरने से और उस खाने को खाने से लोगों की मौत हो जाती है या तबीयत खराब हो जाती है

छिपकली का जमीन पर गिरना या जमीन पर चलना : जमीन पर छिपकली का चलना भविष्य में होने वाली घटनाओं की तरफ इशारा करता है और भविष्य में होने वाली घटनाओं को प्रभावित भी करता है। इस तरह की हरकत जब छिपकली करती है तो व्यक्ति के जीवन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है

छिपकली का घर में होना शुभ या अशुभ : छिपकली माँ लक्ष्मी का प्रतिक है इसलिए घर में छिपकली का होना अशुभ नहीं मन जाता है |

नए घर में प्रवेश करते समय यदि गुहस्वामी को छिपकली मरी हुई व मिट्टी लगी हुई दिखाई दे तो उसमें निवास करने वाले लोग रोगी हो सकते हैं। इस अपशकुन से बचने के लिए पूरे विधि विधान से पूजन करने के बाद ही नए घर में प्रवेश करना चाहिए

अगर छिपकली किसी भी कीड़े या फतिंगे पर झपट्टे तो समझ लीजिये की घर में चोरी हो सकती है

अगर आप कहीं बाहर जा रहे हैं और आपको छिपकली की पूर्व, उत्तर, ईशान दिशाओं में आवाज सुनाई दे तो आपके लिए यह शुभ संकेत है | माना जाता है कि आपको धन की प्राप्ति होती है और नौकरी पेशा लोगों को प्रमोशन का अवसर प्राप्त होता है |

अगर छिपकली की तीसरे और चौथे प्रहर में पूर्व दिशा की ओर आवाज सुनाई तो यह आपके लिए शुभ संकेत है, धन की प्राप्ति होती है और व्यापारी के व्यापार में वृद्धि आने लगती है |

छिपकली के शरीर पर गिरने के शुभ और अशुभ संकेत 

शकुन शास्त्र के अनुसार छिपकली के शरीर पर गिरने को भी शकुन/अपशकुन माना जाता है | स्त्री के शरीर के बायें भाग पर, पुरुष के शरीर के दाहिनी तरफ गिरना शुभ होता है | इसी प्रकार छिपकली का नीचे से ऊपर की ओर चढ़ना शुभ और ऊपर से नीचे की ओर गिरना अशुभ माना जाता है | आइये जानते है की शारीर के कौनसे हिस्से / अंग पर छिपकली का गिरना क्या संकेत देता है |

Chipkali Ke Sanket छिपकली का शरीर पर गिरने के शुभ संकेत / शकुन

माथे पर छिपकली के गिरने से धन मिलने की संभावना बढ़ती है |

दाहिने कान पर छिपकली के गिरने से गहनों की प्राप्ति होती है |

बायें कान पर गिर जाए तो आयु में वृद्धि होती है |

छिपकली का नाक पर गिरना भाग्‍योदय का संकेत होता है |

मुख पर छिपकली गिरना स्वादिष्ट खाने की प्राप्ति होती है |

यदि छिपकली बायें गाल में गिरे तो पुराने मित्र से भेंट होती है |

दाहिने गाल में गिरे तो आयु में बढ़ोतरी होती है |

गर्दन पर छिपकली गिरे तो प्रसिद्धि मिलती है |

दाहिनी आंख पर छिपकली का गिरना मित्र से भेंट का संकेत है |

पीठ के दाहिनी ओर छिपकली का गिरना सुख की प्राप्ति का संकेत है |

छिपकली दाहिने कंधे पर गिरे तो जीत हासिल होती है |

हाथ के दाहिने ओर यानि दाहिनी भुजा पर छिपकली का गिरना शीघ्र लक्ष्मी प्राप्ति होना माना जाता है |

छिपकली का सीने के दाहिने भाग पर गिरना खुशियों के आगमन माना जाता है |

यदि छिपकली पेट पर गिरे तो गहनों की प्राप्ति होती है |

कमर के बीच में छिपकली गिरने पर आर्थिक लाभ होता है |

नाभि पर छिपकली के गिरने से इच्छाएं / मनोकामनाए पूरी होती है |

Chipkali Ke Sharir Par Girane Ke Shubh Ashubh Sanket

छिपकली के दाहिनी जांघ पर गिरने से सुख मिलता है |

दाहिने घुटने पर छिपकली के गिरने से यात्रा का मौका मिलता है |

दाहिने पैर पर छिपकली गिरना यात्रा लाभ देता है |

मूंछ पर छिपकली गिरना यानि सम्मान की प्राप्ति होना |

कंठ पर छिपकली गिरने का मतलब शत्रुओ का नाश होगा |

दाहिनी हथेली पर छिपकली गिरने से कपडे मिलते है |

दाहिनी जांघ पर छिपकली गिरने से सुख मिलता है |

दाएं पैर के तलवे पर छिपकली गिरने का मतलब ऐश्वर्य की प्राप्ति है |

घर की छत पर रेंगती हुई छिपकली किसी व्यक्ति की छाती पर गिरे तो स्वादिष्ट भोजन की प्राप्ति होती है |

घर में दीवारों पर रेंगती छिपकली अगर किसी व्यक्ति के घुटनों को छूकर नीचे गिर जाती है तो यह इस बात का संकेत होता है कि उस व्यक्ति के जीवन में आने वाले दिनों में बहुत सारी खुशियाँ मिलने वाली हैं |

पीठ के बीच में छिपकली गिरने पर घर में बड़ा क्लेश होता है |

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छिपकली का शारीर पर गिरने के शुभ संकेत / अपशकुन

बालों पर छिपकली का गिरना मौत आने का संकेत माना जाता है |

बायीं आंख पर गिरने से शीघ्र बड़ी हानि का सामना करना पड़ सकता है |

पीठ के मध्य छिपकली के गिरने से घर में विरोध होता है |

पीठ के बायीं और गिरना बीमारियों के आगमन का संकेत माना जाता है |

छिपकली बायीं ओर कंधे पर गिरने से नए दुश्मन बनते हैं |

बाएं पैर के तलवे पर गिरने पर व्यापार में नुकसान उठाना पड़ता है |

हाथ के बायीं ओर यानि बायीं भुजा पर छिपकली के गिरने से धन छिन जाने की चिंता बढ़ जाती है |

छिपकली का सीने के बायें भाग पर गिरना घर में ज्यादा कलह होने का संकेत है |

Chipkali Ke Sharir Par Girane Ke Shubh Ashubh Sanket

छिपकली के बायीं जांघ पर गिरने से शारीरिक कष्ट होता है |

बायें घुटने पर छिपकली के गिरने पर तो बुद्धि हानि होती है |

बाये पैर पर छिपकली गिरने से घर में कलह, दुख, बीमारी और व्यापर में हानि होती है |

दाढ़ी पर छिपकली गिरने से किसी बड़े और भयावह संकट का सामना करना पड़ सकता है |

भौंह पर छिपकली गिरना यानि धन हानि |

बाई हथेली पर छिपकली गिरने से धन की हानि होती है |

बाई जांघ पर छिपकली गिरने से दुःख ही दुःख यानि शाररिक पीड़ा होती है |

घर की छत पर रेंगती हुई छिपकली किसी सोते हुए या लेटे व्यक्ति की पेट पर आकर गिरे तो उक्त व्यक्ति निकट भविष्य में

कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है |

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Monday, 5 July 2021

हस्थरेखा और अपनी जन्म तारीख समय ज्ञात करें

 

जन्म समय आपके हाथ पर लिखा है ®

हाथ पर लिखा

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हथेली पर जन्म तारीख

कभी कभी किसी कारणवश जन्म तारीख और दिन माह वार आदि का पता नही होता है,कितनी ही कोशिशि की जावे लेकिन जन्म तारीख का पता नही चल पाता है,जातक को सिवाय भटकने के और कुछ नही प्राप्त होता है,किसी ज्योतिषी से अगर अपनी जन्म तारीख निकलवायी भी जावे तो वह क्या कहेगा,इसका भी पता नही होता है,इस कारण के निवारण के लिये आपको कहीं और जाने की जरूरत नही है,किसी भी दिन उजाले में बैठकर एक सूक्षम दर्शी सीसा लेकर बैठ जावें,और अपने दोनो हाथों बताये गये नियमों के अनुसार देखना चालू कर दें,साथ में एक पेन या पैंसिल और कागज भी रख लें,तो देखें कि किस प्रकार से अपना हाथ जन्म तारीख को बताता है।

अपनी वर्तमान की आयु का निर्धारण करें

हथेली मे चार उंगली और एक अगूंठा होता है,अंगूठे के नीचे शुक्र पर्वत,फ़िर पहली उंगली तर्जनी उंगली की तरफ़ जाने पर अंगूठे और तर्जनी के बीच की जगह को मंगल पर्वत,तर्जनी के नीचे को गुरु पर्वत और बीच वाली उंगली के नीचे जिसे मध्यमा कहते है,शनि पर्वत,और बीच वाली उंगले के बाद वाली रिंग फ़िंगर या अनामिका के नीचे सूर्य पर्वत,अनामिका के बाद सबसे छोटी उंगली को कनिष्ठा कहते हैं,इसके नीचे बुध पर्वत का स्थान दिया गया है,इन्ही पांच पर्वतों का आयु निर्धारण के लिये मुख्य स्थान माना जाता है,उंगलियों की जड से जो रेखायें ऊपर की ओर जाती है,जो रेखायें खडी होती है,उनके द्वारा ही आयु निर्धारण किया जाता है,गुरु पर्वत से तर्जनी उंगली की जड से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें जो कटी नही हों,बीचवाली उंगली के नीचे से जो शनि पर्वत कहलाता है,से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें,की गिनती करनी है,ध्यान रहे कि कोई रेखा कटी नही होनी चाहिये,शनि पर्वत के नीचे वाली रेखाओं को ढाई से और बृहस्पति पर्वत के नीचे से निकलने वाली रेखाओं को डेढ से,गुणा करें,फ़िर मंगल पर्वत के नीचे से ऊपर की ओर जाने वाली रेखाओं को जोड लें,इनका योगफ़ल ही वर्तमान उम्र होगी।

अपने जन्म का महिना और राशि को पता करने का नियम

अपने दोनो हाथों की तर्जनी उंगलियों के तीसरे पोर और दूसरे पोर में लम्बवत रेखाओं को २३ से गुणा करने पर जो संख्या आये,उसमें १२ का भाग देने पर जो संख्या शेष बचती है,वही जातक का जन्म का महिना और उसकी राशि होती है,महिना और राशि का पता करने के लिये इस प्रकार का वैदिक नियम अपनाया जा सकता है:-

१-बैशाख-मेष राशि

२.ज्येष्ठ-वृष राशि

३.आषाढ-मिथुन राशि

४.श्रावण-कर्क राशि

५.भाद्रपद-सिंह राशि

६.अश्विन-कन्या राशि

७.कार्तिक-तुला राशि

८.अगहन-वृश्चिक राशि

९.पौष-धनु राशि

१०.माघ-मकर राशि

११.फ़ाल्गुन-कुम्भ राशि

१२.चैत्र-मीन राशि

इस प्रकार से अगर भाग देने के बाद शेष १ बचता है तो बैसाख मास और मेष राशि मानी जाती है,और २ शेष बचने पर ज्येष्ठ मास और वृष राशि मानी जाती है।

हाथ में राशि का स्पष्ट निशान भी पाया जाता है

प्रकृति ने अपने द्वारा संसार के सभी प्राणियों की पहिचान के लिये अलग अलग नियम प्रतिपादित किये है,जिस प्रकार से जानवरों में अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार उम्र की पहिचान की जाती है,उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में दाहिने या बायें हाथ की अनामिका उंगली के नीचे के पोर में सूर्य पर्वत पर राशि का स्पष्ट निशान पाया जाता है। उस राशि के चिन्ह के अनुसार महिने का उपरोक्त तरीके से पता किया जा सकता है।

पक्ष और दिन का तथा रात के बारे में ज्ञान करना

वैदिक रीति के अनुसार एक माह के दो पक्ष होते है,किसी भी हिन्दू माह के शुरुआत में कृष्ण पक्ष शुरु होता है,और बीच से शुक्ल पक्ष शुरु होता है,व्यक्ति के जन्म के पक्ष को जानने के लिये दोनों हाथों के अंगूठों के बीच के अंगूठे के विभाजित करने वाली रेखा को देखिये,दाहिने हाथ के अंगूठे के बीच की रेखा को देखने पर अगर वह दो रेखायें एक जौ का निशान बनाती है,तो जन्म शुक्ल पक्ष का जानना चाहिये,और जन्म दिन का माना जाता है,इसी प्रकार अगर दाहिने हाथ में केवल एक ही रेखा हो,और बायें हाथ में अगर जौ का निशान हो तो जन्म शुक्ल पक्ष का और रात का जन्म होता है,अगर दाहिने और बायें दोनो हाथों के अंगूठों में ही जौ का निशान हो तो जन्म कृष्ण पक्ष रात का मानना चाहिये,साधारणत: दाहिने हाथ में जौ का निशान शुक्ल पक्ष और बायें हाथ में जौ का निशान कृष्ण पक्ष का जन्म बताता है।

जन्म तारीख की गणना

मध्यमा उंगली के दूसरे पोर में तथा तीसरे पोर में जितनी भी लम्बी रेखायें हों,उन सबको मिलाकर जोड लें,और उस जोड में ३२ और मिला लें,फ़िर ५ का गुणा कर लें,और गुणनफ़ल में १५ का भाग देने जो संख्या शेष बचे वही जन्म तारीख होती है। दूसरा नियम है कि अंगूठे के नीचे शुक्र क्षेत्र कहा जाता है,इस क्षेत्र में खडी रेखाओं को गुना जाता है,जो रेखायें आडी रेखाओं के द्वारा काटी गयीं हो,उनको नही गिनना चाहिये,इन्हे ६ से गुणा करने पर और १५ से भाग देने पर शेष मिली संख्या ही तिथि का ज्ञान करवाती है,यदि शून्य बचता है तो वह पूर्णमासी का भान करवाती है,१५ की संख्या के बाद की संख्या को कृष्ण पक्ष की तिथि मानी जाती है।

जन्म वार का पता करना

अनामिका के दूसरे तथा तीसरे पोर में जितनी लम्बी रेखायें हों,उनको ५१७ से जोडकर ५ से गुणा करने के बाद ७ का भाग दिया जाता है,और जो संख्या शेष बचती है वही वार की संख्या होती है। १ से रविवार २ से सोमवार तीन से मंगलवार और ४ से बुधवार इसी प्रकार शनिवार तक गिनते जाते है।

जन्म समय और लगन की गणना

सूर्य पर्वत पर तथा अनामिका के पहले पोर पर,गुरु पर्वत पर तथा मध्यमा के प्रथम पोर पर जितनी खडी रेखायें होती है,उन्हे गिनकर उस संख्या में ८११ जोडकर १२४ से गुणा करने के बाद ६० से भाग दिया जाता है,भागफ़ल जन्म समय घंटे और मिनट का होता है,योगफ़ल अगर २४ से अधिक का है,तो २४ से फ़िर भाग दिया जाता है।

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हस्तरेखा से अनुमानित आयु की गणना  


हस्त परीक्षण के समय तक मनुष्य के जीवन में कितनी घटनाएं घटित हो चुकी हैं और कितनी आने वाले समय में घटित होंगी, इसका सटीक कथन करने के लिए उसकी वर्तमान आयु की गणना कार्य में प्रवीण् ाता प्राप्त कर लेना उचित होगा। इस कार्य में निपुण होने तक उसकी आयु और उसके उत्तर को अनुमान का आधार बनाना ही उचित रहता है। सभी मनुष्य अपनी ठीक आयु नहीं बता पाते हैं परंतु सही आयु के आस-पास की जानकारी अवश्य दे देते हैं। इस कच्चे अनुमान को हाथ की त्वचा, रेखा और रंगत एवं संगति इत्यादि के साथ देखकर सही आयु की गणना सरलता से की जा सकती है। हस्त परीक्षण करते समय आयु गणना करने का एक सुलभ सूत्र यह है कि मनुष्य की जीवन रेखा को ऊपर से नीचे की ओर बारंबार दबाया जाये तो रक्त प्रवाह की लालिमा में क्षण मात्र के लिए एक सफेद बिंदु सा उभरता है। यह बिंदु हाथ की सटीक आयु दर्शाने वाले स्थान पर होता है। किंतु यह प्रयोग कमरे का तापमान अनुकूल होने पर ही विशुद्ध परिणाम देता है। परिस्थितिवश भिन्नताओं के होने पर परिणामों में परिवर्तन भी आ सकता है।

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अतः इस साधन को हमेशा आयु का सही अनुमान लगाने वाला नहीं माना जा सकता। इस संभावना का कसौटी पर खरा उतरना हस्तरेखा के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा। हस्तरेखाओं को जीवन की वास्तविक दिशादर्शक मानने पर रेखाओं के भिन्न-भिन्न अंशों से यह संकेत प्राप्त हो जाता है कि उसका संबंध जीवन के निम्न भागों से है। प्रयोगों से स्पष्ट हो चुका है कि रेखा जहां से शुरू होती है, वह स्थान आरंभिक वर्षों का हिसाब रखता है तथा आगे का वर्षवार लेखा-जोखा उसमें जुड़ता जाता है। अतः रेखाओं के प्रांरभिक स्थान की जानकारी होना आवश्यक है। किस आयु में क्या-क्या घटनाएं घटी हैं या घटने वाली हंै इस बात को ठीक-ठीक बता पाने की कुशलता पूरी तरह हस्तरेखाविद् की तीक्ष्ण दृष्टि एवं सही परख पर निर्भर करती है। कुछ हस्तरेखाविद् एक वर्ष के भीतर घटित या घटने वाली घटना को बता सकते हैं किंतु ऐसे बहुत ही कम लोग हैं, जिन्होंने ऐसी कुशलता प्राप्त कर ली है। हस्तरेखा शास्त्र के नियमों की पूर्ण रूप से जानकारी रखने वाला व्यक्ति अधिक से अधिक इतना ही बता सकता है कि किस वर्ष में कौन सी घटना घटित होगी।

घटना घटित होने के महीने या दिन को बता पाना असंभव है। केवल हाथ को देखकर किसी व्यक्ति का नाम या उसके नाम का आद्यक्षर बताना भी संभव नहीं है। गौण घटनाओं या दैनिक जीवन के चिह्न व्यक्ति के हाथों में नहीं उभरते। हाथ में बना जीवन का मानचित्र केवल महत्वपूर्ण घटनाओं, गंभीर बीमारी, दशा परिवर्तन, गंभीर संकट, बड़ी खुशियों या खतरों या गहन प्रभाव डालने वाली घटनाओं या मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ने वाले अथवा जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन करने वाले व्यक्तियों को ही दर्शाता है। रेखाओं से आयु की गणना करते समय सर्वप्रथम मनुष्य की औसत आयु पर विचार करना चाहिए। व्यक्ति की 100 वर्ष या उससे अधिक मापने वाले मापदंड निश्चित करना त्रुटिपूर्ण है; क्योंकि यह देखा गया है कि लोग बहुधा इतनी आयु तक नहीं पहुंच पाते। जीवन रेखा का विभाजन गुरु अंगुली के नीचे, रेखा के प्रारंभ होने के स्थान से शुरू होता है तथा मणिबंध पर समाप्त होता है (देखिये चित्र क्रमांक 1 आयु गणना हेतु जीवन रेखा का विभाजन), मध्यवर्ती खंडों में जीवन के विभिन्न वर्षों का रिकार्ड रहता है। रेखा के परीक्षण में सुविधा एवं शीघ्रता की दृष्टि से रेखा को मध्य बिन्दु से विभाजित करके केंद्र बिंदु पर छत्तीस वर्ष की आयु निर्धारित की गई है जो सत्तर की लगभग आधी है। इस केंद्र बिंदु के ऊपर के स्थानों में दिए गये रेखा चित्र में चार, छः, बारह, अठारह, चैबीस तीस वर्षों में और केतु बिंदु के बाद के भाग को तैतालीस, इक्यावन, साठ और सत्तर वर्षों की आयु बताने वाले खंडों में बांटा गया है। इस तारीख तक पहुंचने के लिए चार से लेकर सत्तर वर्षों की आयु के बीच एक-एक वर्ष की कालावधि में समय का विभाजन करना आवश्यक है।

कींचित अभ्यास के पश्चात रेखा पर 4, 6, 12, 18, 24, 30, 36, 43, 51, 60 और 70 वर्ष की आयु का पता लगाना आसान हो सकता है। ऐसे अभ्यास से इन कालावधियों की शीघ्र और ठीक-ठीक पढ़ने की जानकारी प्राप्त हो जायेगी। भविष्यकथन करने के स्थान पर हाथ में आयु का कोई चिह्न न दिखाई देने की स्थिति में उस रेखा को ही वर्षों में विभाजित करके इस विधि के अनुसार सही तिथि निकाली जा सकती है। रेखा को पेंसिल से चिह्नित किए बिना खाली हाथ का निरीक्षण करते समय हाथ की लंबाई या छोटे होने की स्थिति को ध्यान में रखकर लंबाई के अनुपात में केंद्रबिंदु पर छत्तीस वर्ष की आयु मानकर कई स्थानों को मन में निश्चित करना आवश्यक है। याद रहे कि लंबे हाथ में प्रत्येक छः वर्ष की अवधि के मध्य अधिक और छोटे हाथ में कम अंतराल होता है। जीवन रेखा का इस तरह विभाजन करना अन्य सभी प्रकार के विभाजन की तुलना में अधिक शुद्ध एवं सही पाया गया है। यद्यपि परिणामों की शुद्धता हस्तरेखा शास्त्री के सटीक अनुमान पर निर्भर करेगी तथापि पर्याप्त परिश्रम करने पर वास्तविक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा पर चिह्नित घटनाएं जीवन रेखा के चिह्नों द्वारा प्रासंगिक हैं या नहीं, यह जानने के लिए कालावधियों को पढ़ना उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इन रेखाओं से कालावधि का अनुमान लगाने के नियमों का पालन करना और जीवन रेखा पर लागू होने वाली टिप्पणियों एवं तर्कों को इन रेखाओं के लिए प्रासंगिक मानना आवश्यक है। जीवन रेखा गुरु की अंगुली के नीचे से आरंभ होती है और उसकी दिशा हाथ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक होती है। रेखाएं भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाती हैं।

इसलिए कालावधियों की गणना को सुविधाजनक बनाने के लिए एक काल्पनिक रेखा को आधारवत् लेना उपयोगी रहता है। इस रेखा को गुरु पर्वत के मध्य से प्रारंभ कर हाथ के पार तक जाने की कल्पना की जाती है। हृदय रेखा या मस्तिष्क रेखा का निरीक्षण करते समय इस काल्पनिक रेखा (देखिए चित्र क्रमांक 2 आयु गणना (काल्पनिक रेखा के आधार पर) पर पूर्ववत् 6 से 70 वर्षों की अवधियां अंकित की जाती हैं और इन अवधि खंडों को पढ़ने से निकलने वाली आयु बिल्कुल सही पायी जाती है। इससे अधिक पास की तिथियां देखने के लिए हृदय या मस्तिष्क रेखाओं को एक वर्ष दर्शाने वाली कालावधियों में विभाजित किया जाता है और ठीक वही प्रक्रिया अपनाई जाती है जिसका उल्लेख जीवन रेखा के संबंध में किया गया है। उपर्युक्त माप तालिकाओं का सही तरह से उपयोग करने से ये सटीक परिणाम देती हैं। शनि रेखा पर आयु को नीचे से ऊपर की ओर पढ़ा जाता है। (देखिए चित्र क्रमांक तीन शनि रेखा का आधार) मणिबंध से मस्तिष्क रेखा तक का स्थान 0 से 30 वर्ष, मस्तिष्क रेखा से हृदय रेखा तक 30 से 45 वर्ष और हृदय रेखा से शनि की अंगुली तक 70 वर्ष की आयु बताने वाली कालावधियों में विभाजित कर दिया जाता है। इन तीन सामान्य उप-विभाजनों को ध्यान में रखकर प्रमुख कालावधियां पढ़ने की कला शीघ्र आ जाती है। एक वर्ष के भीतर के किसी समय को जानने के लिए रेखा को चिह्नित करके ठीक जीवन रेखा की तरह ही पढ़ा जाता है। मस्तिष्क और हृदय रेखाएं हाथ के आर-पार जिन अलग-अलग दिशाओं से जाती हैं, उन्हें शनि रेखा सदा एक ही स्थान पर नहीं काटती। यदि वे अनुचित दिशाओं में चली जाएं तथा उसके फलस्वरूप कोई चैड़ा या संकीर्ण चतुष्कोण बन जाये तो उनके बीच का अंतराल 30 से 45 वर्ष की आयु दर्शाने वाला नहीं होगा और सही तिथियां जानने के लिए शनि की पूरी रेखा की माप लेनी होगी।

सूर्य रेखा को नीचे से ऊपर की ओर उसी तरह पढ़ा जाता है जैसे शनि रेखा को और वही नियम एवं माप इस पर भी लागू होते हैं जो शनि रेखा को पढ़ने के लिए लागू होते हैं और सटीक तिथियां निकालने का उपाय भी दोनों का एक ही है। (देखिए चित्र क्रमांक चार सूर्य रेखा का आधार)। बुध रेखा को नीचे से ऊपर की ओर पढ़ा जाता है (देखिए चित्र क्रमांक 5 बुध रेखा का आधार) वही माप और वे ही नियम इसके लिए प्रासंगिक हैं जो अन्य रेखाओं पर लागू होते हैं सिवाय इसके कि यह रेखा लंबाई में छोटी होने के कारण कालावधियों हेतु लगाए जाने वाले चिह्नों के बीच की दूरी बहुत ही कम होती है क्योंकि उनके चिह्न पास-पास होते हैं। आयु को इस रेखा पर पढ़ना प्रायः वांछनीय होता है क्योंकि जीवन रेखा के संबंध में यह रेखा बहुत ही महत्वपूर्ण है। आकस्मिक रेखाओं पर आयु को पढ़ना आवश्यक नहीं है।

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ये रेखाएं मुख्य रेखाओं को काटने वाली, उनसे आरंभ होने वाली या उनके इतने समीप होती हैं कि आकस्मिक रेखा पर दी हुई आयु को मुख्य रेखा द्वारा पढ़ा जा सकता है। जीवन के स्वाभाविक मानचित्र में होने वाले परिवर्तनों या संभावनाओं को प्रकट करने वाली ऐसी आकस्मिक रेखाएं कई दिशाओं की ओर जाती हैं और ऐसे अप्रत्याशित स्थानों से प्रारंभ होती हंै कि उन पर आयु को पढ़ने का कोई नियम नहीं बनाया जा सकता तथापि मुख्य रेखाओं की गणना के आधार पर इनसे भी सही तिथियां निकाली जा सकती हैं। हस्तरेखा शास्त्र के किसी भी भाग के लिए इतना अभ्यास आवश्यक नहीं जितना की तिथियों को जानने के लिए। पहले-पहले अनेक असफलताएं प्राप्त होंगी किंतु ऐसी असफलताएं नियमों के कारण नहीं बल्कि अभ्यास कार्य में लगे व्यक्ति की ग्रहण शक्ति कम रहने के कारण होगी। बीमारी के बारे में निरीक्षण करते समय न केवल जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा, हृदय रेखा व बुध रेखा तथा पर्वतों की जांच भी की जाती है अपितु उनकी तिथियों का भी इन रेखाओं से अंकित विधियों के साथ मिलान किया जाता है।

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