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Saturday, 2 October 2021

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र

 सिद्धकुंजिकास्तोत्रम्: 

नवरात्र में करें इसका पाठ, मिलेगा धन, विद्या, यश, सुख-शांति और सब कुछ


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  👉एक पाठ से संपूर्ण दुर्गा सप्तशती जैसा फल

एक पाठ से संपूर्ण दुर्गा सप्तशती जैसा फल


श्री दुर्गा सप्तशती में से हम आपको एक एसा पाठ बता रहे हैं, जिसके करने से आपकी सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी। इस पाठ को करने के बाद आपको किसी अन्य पाठ की आवश्यकता नहीं होगी। यह पाठ है..सिद्धकुंजिकास्तोत्रम्।  समस्त बाधाओं को शांत करने, शत्रु दमन, ऋण मुक्ति, करियर, विद्या, शारीरिक और मानसिक सुख प्राप्त करना चाहते हैं तो सिद्धकुंजिकास्तोत्र का पाठ अवश्य करें। श्री दुर्गा सप्तशती में यह अध्याय सम्मिलित है। यदि समय कम है तो आप इसका पाठ करके भी श्रीदुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ जैसा ही पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। नाम के अनुरूप यह सिद्ध कुंजिका है। जब किसी प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा हो, समस्या का समाधान नहीं हो रहा हो, तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करिए। भगवती आपकी रक्षा करेंगी।


सिद्ध कुंजिका स्तोत्र की महिमा


सिद्ध कुंजिका स्तोत्र की महिमा

भगवान शंकर कहते हैं कि सिद्धकुंजिका स्तोत्र का पाठ करने वाले को देवी कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास और यहां तक कि अर्चन भी आवश्यक नहीं है। केवल कुंजिका के पाठ मात्र से दुर्गा पाठ का फल प्राप्त हो जाता है।


क्यों है सिद्ध

इसके पाठ मात्र से मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि उद्देश्यों की एक साथ पूर्ति हो जाती है। इसमें स्वर व्यंजन की ध्वनि है। योग और प्राणायाम है।

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र को अत्यंत सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए

संक्षिप्त मंत्र

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥ ( सामान्य रूप से हम इस मंत्र का पाठ करते हैं लेकिन संपूर्ण मंत्र केवल सिद्ध कुंजिका स्तोत्र में है)

 

संपूर्ण मंत्र यह है

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ऊं ग्लौं हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।

 

कैसे करें

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र को अत्यंत सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। प्रतिदिन की पूजा में इसको शामिल कर सकते हैं। लेकिन यदि अनुष्ठान के रूप में या किसी इच्छाप्राप्ति के लिए कर रहे हैं तो आपको कुछ सावधानी रखनी होंगी।

1. संकल्प: सिद्ध कुंजिका पढ़ने से पहले हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लेकर संकल्प करें। मन ही मन देवी मां को अपनी इच्छा कहें।

2. जितने पाठ एक साथ ( 1, 2, 3, 5. 7. 11) कर सकें, उसका संकल्प करें। अनुष्ठान के दौरान माला समान रखें। कभी एक कभी दो कभी तीन न रखें।

3. सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के अनुष्ठान के दौरान जमीन पर शयन करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें।

4. प्रतिदिन अनार का भोग लगाएं। लाल पुष्प देवी भगवती को अर्पित करें।

5. सिद्ध कुंजिका स्तोत्र में दशों महाविद्या, नौ देवियों की आराधना है।

सिद्धकुंजिका स्तोत्र के पाठ का समय

1. रात्रि 9 बजे करें तो अत्युत्तम।

2. रात को 9 से 11.30 बजे तक का समय रखें।


आसन

लाल आसन पर बैठकर पाठ करें


दीपक

घी का दीपक दायें तरफ और सरसो के तेल का दीपक बाएं तरफ रखें। अर्थात दोनों दीपक जलाएं

 

किस इच्छा के लिए कितने पाठ करने हैं

1.विद्या प्राप्ति के लिए....पांच पाठ ( अक्षत लेकर अपने ऊपर से तीन बार घुमाकर किताबों में रख दें)

2. यश-कीर्ति के लिए.... पांच पाठ ( देवी को चढ़ाया हुआ लाल पुष्प लेकर सेफ आदि में रख लें)

3. धन प्राप्ति के लिए....9 पाठ ( सफेद तिल से अग्यारी करें)

4.मुकदमे से मुक्ति के लिए...सात पाठ ( पाठ के बाद एक नींबू काट दें। दो ही हिस्से हों ध्यान रखें। इनको बाहर अलग-अलग दिशा में फेंक दें)

5. ऋण मुक्ति के लिए....सात पाठ ( जौं की 21 आहुतियां देते हुए अग्यारी करें। जिसको पैसा देना हो या जिससे लेना हो, उसका बस ध्यान कर लें)

6. घर की सुख-शांति के लिए...तीन पाठ ( मीठा पान देवी को अर्पण करें)

7.स्वास्थ्यके लिए...तीन पाठ ( देवी को नींबू चढाएं और फिर उसका प्रयोग कर लें)

8.शत्रु से रक्षा के लिए..., 3, 7 या 11 पाठ ( लगातार पाठ करने से मुक्ति मिलेगी)

9. रोजगार के लिए...3,5, 7 और 11 ( एच्छिक) ( एक सुपारी देवी को चढाकर अपने पास रख लें)

10.सर्वबाधा शांति- तीन पाठ ( लोंग के तीन जोड़े अग्यारी पर चढ़ाएं या देवी जी के आगे तीन जोड़े लोंग के रखकर फिर उठा लें और खाने या चाय में प्रयोग कर लें।


( पाठ में अधिक समय नहीं लगेगा। पांच या सात मिनट में पाठ पूरा हो जाता है)

सिद्धकुंजिकास्तोत्रम्

सिद्धकुंजिकास्तोत्रम्

शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ।

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः भवेत् ॥१॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।

न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥२॥

कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।

अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥३॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति ।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।

पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥४॥

अथ मन्त्रः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः

ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा

इति मन्त्रः॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥१॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिन ॥२॥

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ।

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ॥३॥

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ॥४॥

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिण ॥५॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देविशां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥६॥

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।

भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥७॥

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं

धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ॥८॥

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे ॥

इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे ।

अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥

यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत् ।

न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥

इतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती

संवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम् ।।

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Friday, 1 October 2021

मां दुर्गा शक्ति पूजा विधि

ऐसे करें मां दुर्गा की पूजा



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किसी भी देवी देवता की पूजा में विधि विधान का ध्यान रखा जाता है। आइए जानते हैं मां दुर्गा की पूजा कैसे करें-

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दुर्गा पूजन सामग्री-

दुर्गा पूजन से पहले यह सामग्री जुटा लें-

पंचमेवा, रोली, सिंदूर, कलावा, पंच​मिठाई, रूई, एक नारियल, अक्षत, लाल वस्त्र, फूल, 5 सुपारी, लौंग, 5 पान के पत्ते, घी, चौकी, कलश, आम के पल्लव, समिधा, कमल गट्टे, कुशा, रक्त चंदन, श्रीखंड चंदन, जौ, ​तिल, प्र​तिमा, आभूषण व श्रृंगार का सामान, फूल माला।

पंचामृत बनाएं- दूध, दही, घी, शहद, शर्करा को एक में मिलाकर तैयार करें।



ऐसे करें पूजन

दुर्गा प्रतिमा के सामने आसनी पर बैठ जाएं। बिना आसन, चलते-फिरते और पैर फैलाकर पूजा नहीं करना चाहिए। इसके बाद अपने आपको तथा आसन को इस मंत्र से शुद्धि करें -

"ऊं अपवित्र : पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि :॥"

इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर 3-3 बार कुशा या पुष्पादि से छींटें लगाएं फिर आचमन करें –

ऊं केशवाय नम: ऊं नारायणाय नम:, ऊं माधवाय नम:, ऊं गो​विन्दाय नम:|


फिर हाथ धोएं, फिर आसन शुद्धि मंत्र बोलें -

ऊं पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता।

त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

 

इसके पश्चात अनामिका उंगली से अपने मत्थे पर चंदन लगाते हुए यह मंत्र बोलें-

 चन्दनस्य महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम्,

आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठतु सर्वदा।

 

संकल्प- हाथ में पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें –

ऊं विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ऊं अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते(वर्तमान संवत), तमेऽब्दे क्रोधी नाम संवत्सरे उत्तरायणे (वर्तमान) ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे (वर्तमान) मासे (वर्तमान) पक्षे (वर्तमान) तिथौ (वर्तमान) वासरे (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया- श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं श्री दुर्गा पूजनं च अहं क​रिष्ये। तत्पूर्वागंत्वेन ​निर्विघ्नतापूर्वक कार्य ​सिद्धयर्थं यथा​मिलितोपचारे गणप​ति पूजनं क​रिष्ये।


इस मंत्र के साथ करें पूजा

माता दुर्गा की आराधना के समय ‘‘ऊँ दुं दुर्गायैनमः'' मंत्र का जप करें।



नारियल का भोग लगाएं


माता दुर्गा की पूजा के दौरान नारियल का भोग जरूर लगाना चाहिए। मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने नारियल चढ़ाएं । कुछ देर बाद नारियल फोड़ दें। इसके बाद देवी को अर्पित कर भक्तों में बांट दें।

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Monday, 16 August 2021

विवाह रुकवाने के उपाय

 विवाह रुकवाने के सरल उपाय


शादी रुकवाने का मंत्रज्योतिष और वास्तु समाधान  🏠Vastu Guru_ Mk.✋

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शादी व्याह के मामलें में ये कहावत बहुत प्रचलित हैं कि “आटें में चुटकी बराबर नमक चलता हैं|” अर्थात शादी-व्याह कराने के लिए यदि थोड़े बहुत झूठ बोलना भी पड़े तो बोल देनी चाहिए,क्योकि किसी कि शादी करवाना एक पुण्य का काम माना जाता हैं| ऐसे में यदि हम किसी कि शादी को रुकवाना चाहते हैं,तो हम पाप के भागीदारी होंगे| परंतु कई बार परिस्थिति ऐसी बनती हैं कि हम चाहते हैं कि अमुक की शादी रुक जाए|


शादी रुकवाने का मंत्र

शादी रुकवाने का मंत्र

क्योकि जिससे हम प्रेम करते हैं,उसकी शादी अपने आँखों के सामने किसी और से होते हुए नहीं देख सकते हैं| परंतु कई बार हम जिससे प्रेम करते हैं,घर वाले उसकी शादी किसी और से तय कर देते हैं| ऐसे में हम ज्योतिषशास्त्र में वर्णित टोटकों/उपायों को आजमा कर अपने प्रेमी कि शादी रुकवा सकते हैं| आज हम इस लेख में लाल किताब में उल्लेखित शादी रुकवाने के उपायों के बारे में जानेंगे|


यदि लड़की की शादी उसके घर वाले उसकी मर्जी के खिलाफ तय कर रहे हों,तो ऐसी परिस्थिति में लड़कियों को गुरुवार के दिन सवा लीटर दूध व सवा लीटर चना दाल का दान करना चाहिए|

यह प्रत्येक गुरुवार को तब तक करनी चाहिए,जब तक उन्हे अपना मनवांछित फल न मिल जाए| इस टोटकें को आजमाने से लड़की की शादी उस लड़के सा ना हो कर वहा होती हैं,जिस लड़के को वो पसंद करती हैं|

यदि आप अपने प्रेमी कि शादी रुकवाना चाहते हैं,तो एक नींबू लेकर उसपर अपने प्रेमी का नाम और जन्म तारीख लिख दें| अब इस नींबू को किसी भी तरीके से अपने प्रेमी के सिरहाने में रख दें|

इस टोटकें के असर से आपके प्रेमी कि शादी में अडचने पैदा हो जाएँगी| यह सतप्रतिशत आजमाया हुआ टोटका हैं|

अपनी शादी रोकने का टोटका

अपनी शादी रोकने का टोटका, यदि आपकी शादी आपके मर्जी के खिलाफ घर वालों ने तय कर दी हों,तो आप अपनी शादी रुकवाने के लिए ज्योतिषशास्त्र में दिये हुए टोटकों को आजमा सकते हैं| अपनी शादी रुकवाने के लिए कुछ टोटकाओं के बारे में जानते हैं:-


मंगलवार अथवा शनिवार को पास के भैरव मंदिर में, आटे का एक चौमुख दीप बनाए और बतियोंको लाल कुमकुम से रंग लें| तत्पश्चात दीया को प्रतिमा के समक्ष जलाए|

अब जिस लड़का अथवा लड़की से आपकी शादी की बात चल रही हों,उसका नाम लेते हुए कुछ सरसों के दाने दीपक में डाल दें| इसके बाद नीम मंत्र का जाप करे:-

मंत्र:- ध्यायेन्नीलाद्रिकांतम शशिश्कलधरम, मुंडमालं महेशम| दिगवस्त्रम पिंगकेशंग डमरूमथ सृणिं खडगपाशाभयानि||नागं घण्टाकपालं करसरसिरुहै र्बिभ्रतं भीमद्रष्टम।दिव्यकल्पम त्रिनेत्रं मणिमयविलसद किकिणी नुपुराढ्यम।।


२१ बार उपयुक्त मंत्र का जाप करने के उपरांत अब उस लड़का अथवा लड़की का नाम लेते हुए काले उरद के दानों को दीया में डाल दें| इस अनुष्ठान के पूर्ण होने के २४ घंटो के अंतराल में आपको आपकी शादी टूटने की खबर मिल जाएगी|

लौंग की सहायता से टोटका करने पर भी कोई अपनी शादी रुकवा सकता हैं| इसके लिए पाँच लौंग की आवश्यक्ता होती हैं| इन पाँच लौंगों को लेकर नीचे दिये हुए मंत्र के जाप से अभिमंत्रित कर ले|

मंत्र:- ॐ ह्रीं भैरवाय वं वं वं ह्रां क्ष्रौं नम:


अब इस अभिमंत्रित लौंग को जमीन में अपनी शादी तुड़वाने के संकल्प के साथ आधा गाड़ दें| ध्यान रहे की फूल वाला हिस्सा ऊपर रहे| यह प्रक्रिया कम से काम पाँच दिन करे| आपको अवश्य ही अपना मनवांछित फल की प्राप्ति होगी|


प्रेमी की शादी रोकने का उपाय

हमारे भारतीय समाज में शादी-व्याह तय करने में हमारे माता-पिता अहम भूमिका निभाते हैं| ऐसे में कई बार ऐसा होता हैं कि जिससे हम प्यार करते उसकी शादी उसके माता-पिता कही और तय कर देते हैं| यदि हम अपने प्रेमी कि शादी को रुकवाना चाहते हैं,तो हमें ज्योतिषशास्त्र में बताये हुए निम्न उपायों को आजमाना चाहिए:-


प्रेमी की शादी तोड़ने के लिए कन्या मासिक धर्म के समय होने वाले रक्तस्त्राव और अपने प्रेमी की तस्वीर दोनों को साथ में लेकर उन्हे जला कर एक भस्म तैयार कर लें| अब इस भस्म से किसी भी तरह से अपने प्रेमी को तिलक लगा दें| तत्पश्चात निम्न मंत्र का २१ बार तीन माला जाप करें-

मंत्र- अरहंताणं यीङ्ग हीङ्ग ब्रूम ब्रूम फट स्व:_


इस मंत्र के प्रभाव से आपके प्रेमी की शादी अथवा सगाई रुक जाएगी|

अपने प्रेमी की शादी अथवा सगाई रुकवाने के लिए ज्योतिषशास्त्र में एक सिद्ध मंत्र का उल्लेख मिलता हैं,जिसके प्रतिदिन १०८ माला जाप से आपके प्रेमी की शादी/सगाई किसी न किसी कारण से रुक जाएगी|

मंत्र- ए सः वल्लरी क्ली कर क्ली कामपिशाचप, अमुकी काम ग्राह स्वपने मम रुपे निखे विदास्य: ||


उपयुक्त मंत्र का उपयोग यदि सही ढंग से किया जाए तो,यह मंत्र बहुत ही प्रभावकारी सिद्ध होगा|

एक कच्चे मिट्टी के बर्तन में १०० किलोग्राम चावल, १०० किलोग्राम काले तिल भर लें| अब एक सफ़ेद कपड़ा पर अपने प्रेमी का नाम व जन्म तिथि लाल सिंदूर से लिख दें| अब इस बर्तन को उसी सफ़ेद कपड़े से बांध दें| इसके बाद इस बर्तन को किसी सुनसान चौराहे पर रात्री के १२ बजे रख दें| इस बर्तन के सामने एक दीपक जला कर सात बार अपने प्रेमी का नाम पुकारे| ध्यान रहे कि वापस आते हुए पीछे मुड़ कर ना देखे| प्रेमी कि शादी तुड़वाने का यह रामबाण टोटका हैं|

प्रेमी की सगाई तोड़ने के उपाय

प्रेमी की सगाई तोड़ने के उपाय, यदि आप जिससे प्रेम करते हैं,उसकी सगाई किसी और से तय हो गयी हों,तो यह सगाई तुड़वाने के लिए जातक निम्नलिखित ज्योतिष उपायों को आजमा सकता हैं:-


पुष्य नक्षत्र काल में जातक एक उंगली की मानव हड्डी को लेकर इसे कील का रूप दे दे|

अब इस कील रूपी हड्डी को नीचे दिये हुए मंत्र के १००८ माला जाप के साथ सिद्ध करलें|

“मंत्र- ॐ ह्रीं (अमुक) फट स्व:”


मंत्र जाप के समय अमुक की जगह प्रेमी कि जिससे सगाई हुई हैं,उसका नाम ले|

अब इस सिद्ध किए हुए हड्डी को जिन दों व्यक्ति कि सगाई हुई हैं,उनमे से एक के घर या तो फेक दे या मिट्टी में दबा दें|

इस टोटके के प्रभाव के चलते केवल ११ दिनों में आपकी मनोकामना पूर्ण हों जाएगी और आपके प्रेमी कि सगाई टूट जाएगी|

प्रेमी कि सगाई तोड़ने के मंत्र में निम्न मंत्र भी काफी कारगर सिद्ध हुई हैं:-

मंत्र –” ॐश्री हिं चूँडामनियाये स: रिद्धि-सिद्धि पिशाचिनी रूपाये स्व:”


सबसे पहले उपयुक्त मंत्र का १०८ बार जाप करे| तत्पश्चात कपड़े की एक पुतली बनाकर इस मंत्र से इस पुतली को अभिमंत्रित करते हुए प्रेमी के नाम की फूँक मारे|

अब इस पुतली को प्रेमी के घर के पास जमीन में गाड़ दें|

इस टोटकें का असर से आपके प्रेमी की सगाई किसी ना किसी वजह से टूट जाएगी|

जैसे कि लेख के शुरुआत में हमने इस विषय पर चर्चा कि की किसी की शादी अथवा सगाई तुड़वाना गलत कार्य हैं,परंतु यदि हमारा उद्देश सही हो,और हम निस्वार्थ भाव से किसी की शादी रुकवाना चाहते हैं,तो हम उपयुक्त वर्णित सभी उपायों व टोटकों में से किसी को भी आजमा सकते हैं|

Note- कोई भी उपाय करने से पहले किसी अच्छे ज्योतिष से परामर्श लें। हानि भी हो सकती है। इसके जिम्मेदार आप खुद होंगे। 

अधीक जानकारी प्राप्त करने हेतु WhatsApp करें 9333112719 पर।

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Sunday, 15 August 2021

कैंसर रोग और कारक ग्रह

 किस ग्रह के कारण कैंसर रोग होते हैं

ग्रह और कैंसर रोग  
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निरोगी शरीर का अर्थ है शरीर का रोग से रहित होना ।रोग दो प्रकार के होते है एक- साध्य रोग जो कि उचित उपचार, आहार,व्यबहार ठीक हो जाते हैं दूसरे – असाध्य रोग जो कि उपचार के बाद भी व्यक्तिओं का पीछा नही छोडते है. इन्ही असाध्य रोगों मे अधिकाश रोग जिन्दगी भर साथ रहते है तथा उचित उपचार के साथ जिन्दगी के लिये घातक नही होते हैं परन्तु दो असाध्य रोग ऐसे है जिनका कोई उपचार नही है तथा वे दोनो रोगी की जान लेकर ही रहते हैं वे दो रोग हैं 01.–कैंसर02.–एड्स.
इस आलेख मे हम कैंसर रोग के ज्योतिषीय पहलू का विवेचन करने का प्रयास करते है।
 आइये पहले यह जाने कि कैंसर रोग क्या है ??
आयुर्वेद के अनुसार त्वचा की छठी परत जिसे आयुर्वेद मे रोहिणी कहते है जिसका संस्कृत मे अर्थ है कोशिकाओं की रचना. जब ये कोशिकाये क्षतिग्रस्त होती हैं तो शरीर के उस हिस्से मे एक ग्रन्थि बन जाती है इस ग्रन्थि को असमान्य शोथ भी कहती है.जिसे आयुर्वेद मे बिभिन्न स्थान और प्रकार के नामों से जाना जा ता है जैसे: अर्बुद, गुल्म, शालुका आदि. जब ये शोथ त्रिदोषों (वात,पित्त,कफ) के नियंत्रण से परे हो जाते हैं . तब यह ग्रन्थि कैंसर क रूप ले लेती हैं
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार ज्योतिष पूर्वजन्म के किये हुए कर्मो का आधार है अर्थात हम ज्योतिष द्वारा ज्ञात कर सकते हैं कि हमारे पूर्वजन्म के किये हुए कर्मो का परिणाम हमे इस जन्म मे किस प्रकार प्राप्त होगा ज्योतिर्विग्यान के अनुसार कोई भी रोग पूर्व जन्मकृत कर्मों का ही फल होता है. ग्रह उन फलों के संकेतक हैं, ज्योतिष विग्यान कैंसर सहित सभी रोगों की पहचान मे बहुत ही सहायक होता है. पहचान के साथ –साथ यह भी मालूम किया जा सकता है कि कैंसर रोग किस अवस्था मे होगा तथा उसके कारण मृत्यु आयेगी या नही, यह सभी ज्योतिष द्वारा सटीक जाना जा सकता है
वर्तमान समय में कैंसर सर्वाधिक भयप्रद बीमारी के रुप में चर्चित है । वैज्ञानिकों की लाख चेष्टा के बावजूद अभी तक इसका समुचित उपचार ढूढ़ा नहीं जा सका है । थोड़े-बहुत जो भी उपचार हैं, वो बहुत ही अर्थ साध्य हैं और पूरे तौर पर सुनिश्चित भी नहीं हैं । समुचित उपचार का अभाव ही रोग को अधिक भयावह बना दिया है । रोग का निश्चय हो जाना, मृत्यु घोषित हो जाने जैसा है । सबसे बड़ी बात ये होती है कि प्रायः घोषणा ही तब होती है जब रोग चौथे स्तर में पहुँच चुका होता है । फलतः उपचार के लिए समुचित समय भी नहीं मिल पाता ।
मानव शरीर में कैंसर की उत्पत्ति में कोशिकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कोशिकाओं में श्वेत एवं लाल रक्त कण होते हैं। ज्योतिष में श्वेत रक्त कण का सूचक कर्क राशि का स्वामी चंद्र तथा लाल रक्त कण का सूचक मंगल है। कर्क राशि का अंग्रेजी नाम कैंसर है तथा इसका चिह्न केकड़ा है। केकड़े की प्रकृति होती है कि वह जिस स्थान को अपने पंजों से जकड़ लेता है, उसे अपने साथ लेकर ही छोड़ता है। इसी प्रकार कोशिकाएं मानव शरीर के जिस अंग को अपना स्थान बना लेती है उसे शरीर से अलग करके ही कोशिकाओं को हटाया जाता है। इसलिए ज्योतिष में कैंसर जैसे भयानक रोग के लिए कर्क राशि के स्वामी चंद्र का विशेष महत्व है। इसी प्रकार रक्त में लाल कण की कमी होने पर प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ जाती है। 
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि वैदिक ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार कोई भी रोग पूर्व जन्मकृत कर्मों का ही फल होता है। ग्रह उन फलों के संकेतक हैं, ज्योतिष विज्ञान कैंसर सहित सभी रोगों की पहचान में सहायक होता है। पहचान के साथ-साथ यह भी मालूम किया जा सकता है कि कैंसर रोग किस अवस्था में होगा तथा उसके कारण मृत्यु आयेगी या नहीं, यह सभी ज्योतिष विधि द्वारा जाना जा सकता है |
इस रोग के होने में ग्रहों के साथ भाव भी पीड़ित होना चाहिए। फिर दशा/अन्तर्दशा का आंकलन किया जाना चाहिए, उसके बाद अंत में गोचर देखा जाना चाहिए |कैंसर एक लम्बी अवधि तक होने वाला रोग हैं. इसलिए छ्ठे भाव व अष्टम भाव का संबंध बनना आवश्यक है क्योकि छठा भाव रोग और आठवाँ भाव लम्बी अवधि तक होने वाले रोग हैं. शनि और राहु लम्बे समय तक चलने वाले रोगो की सूचना देते हैं. इसलिए इन दोनो ग्रहों की भूमिका भी कैंसर रोग के होने में मुख्य होती है।
कैंसर रोग का संबंध राहु, पीड़ित चंद्रमा, पीड़ित बृहस्पति या शनि से होता है और यह मेष, वृष, कर्क, तुला और, मकर राशियों से संबंधित होता है. किसी व्यक्ति की कुण्डली में चंद्रमा जब षष्ठेश या अष्टमेश होकर पीड़ित होता है और साथ ही दशा भी प्रतिकूल चल रही हो तब व्यक्ति को कैंसर रोग होने की संभावना बनती है.|शनि असाध्य एवं भयानक लंबे समय तक चलने वाले रोगों का परिचालक है। इसके संयोग से अधिक इसकी दृष्टि पीड़ादायक है।शरीर में किसी भी प्रकार की रसौली जल से होता है। अत: जल राशियों कर्क, वृश्चिक और मीन। ये जल राशियां हैं। इनके पाप ग्रस्त होने पर कैंसर की संभावना प्रबल होती है |
जन्म कुंडली में जब एक भाव पर ही अधिकतर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है, विशेषकर शनि, राहु व मंगल से तब उस संबंधित भाव वाले अंग में कैंसर होने की संभावना बनती है. जन्म कुंडली में यदि नेप्च्यून व यूरेनस आमने-सामने हो तब इसे अत्यधिक अशुभ माना जाता है और यह बहुत ही घातक परिणाम देने वाले सिद्ध हो सकते हैं। 
यदि जन्म कुंडली में दशानाथ पीड़ित होता है तब इस रोग के होने की संभावना अधिक होती है। कैंसर रोग जिस दशा में होता है, उसके बाद आने वाली दशाओं का आंकलन किया जाना चाहिए. यदि यह दशाएँ शुभ ग्रहों की है या अनुकूल ग्रह की है या योगकारक ग्रह की दशा आती है तब रोग का पता आरंभ में ही चल जाता है और उपचार भी हो जाता है.
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए भले ही कैंसर एक नयी बीमारी हो, किन्तु भारतीय विज्ञान- आयुर्वेद और ज्योतिषशास्त्र के लिए बिलकुल नया नहीं है । आयुर्वेद में कर्कटार्बुद नाम से विशद वर्णन है इस व्याधि का और समुचित चिकित्सा भी सुझायी गयी है । इसी भांति ज्योतिष में भी इसकी पर्याप्त चर्चा है । किन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि हमें अपने शास्त्रों पर भरोसा नहीं है । इसे पढ़ने, जानने, अनुसंधान करने में उतनी अभिरुचि नहीं है, जितनी पाश्चात्य पद्धतियों में । ये भी सोलह आने सच है कि हमारे शास्त्रीय विज्ञान को वर्बरता पूर्वक विदेशियों द्वारा नष्ट-भ्रष्ट किया गया है । खेद है कि आज भी वही काम , पहले से भी कहीं बढ़-चढ़कर स्वदेशियों द्वारा जारी है ।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राहु-केतु जिन भावों में होते हैं, उनसे संबंधित अंगों में कैंसर की आशंका होती है। इसके अतिरिक्त इनकी जिन ग्रहों से युति हो उनसे संबंधित अंगों में भी कैंसर होने की संभावना अधिक होती है। इनके अलावा भी जन्म कुंडली में कुछ दोष होने पर कैंसर हो सकता है। ये उपाय करें ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुंडली में स्थित जिन ग्रहों के कारण कैंसर होने की संभावना बन रही है, उन ग्रहों से संबंधित ज्योतिषिय उपाय करें व उन ग्रहों के जप पूर्ण विधि-विधान से करें। उपरोक्त उपाय करने से कैंसर होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं अथवा कैंसर होने पर भी इसका समुचित उपचार हो जाता है।

कैंसर के मुख्य कारक ग्रह मंगल, शनि, राहु, केतु एवं यूरेनस हैं। खासकर केतु एवं यूरेनस जब शनि, मंगल एवं राहु को अशुभ रूप से प्रभावित करते हैं तो कैंसर रोग होता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि राहु ग्रह का कुंडली के छठे भाव पर बुरे प्रभाव से रोग उत्पन्न होते हैं।


 
सर्वविदित है कि ज्योतिषशास्त्र पूर्वानुमान और सुनिश्चय का शास्त्र है । इसका सहारा लेकर यदि विचार करें तो समय से बहुत पहले ही स्थिति ज्ञात हो जा सकती है और तदनुरुप समुचित उपचार भी कर सकते हैं । आज इसी आलोक में अर्बुदकर्कट / कर्कटार्बुद पर विचार करते हैं ।
ज्योतिर्विग्यान के अनुसार कोई भी रोग पूर्व जन्मकृत कर्मों का ही फल होता है. ग्रह उन फलों के संकेतक हैं, ज्योतिष विज्ञान, सहित सभी रोगों की पहचान मे बहुत ही सहायक होता है. पहचान के साथ –साथ यह भी मालूम किया जा सकता है कि कैंसर रोग किस अवस्था मे होगा तथा उसके कारण मृत्यु आयेगी या नही, यह सभी ज्योतिष द्वारा सटीक जाना जा सकता है केंसर या कर्क रोग की पहचान निम्न ज्योतिषीय योग होने पर बडी आसानी से की जा सकती है—
रोग होने की स्थिति में जन्म कुंडली के साथ नवांश कुंडली, षष्टियाँश कुंडली और अष्टमांश कुंडली का भी भली-भाँति विश्लेषण करना चाहिए उसके बाद किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए। राहु को कैंसर का कारक माना गया है लेकिन शनि व मंगल भी यह रोग देते हैं. गुरु को वृद्धि का कारक ग्रह माना जाता है और कैंसर शरीर के किसी अंग में अवांछित वृद्धि से ही होता है और साथ ही यदि यह षष्ठेश या अष्टमेश होकर पीड़ित है तब कैंसर की संभावना बनती है। योगानुसार निम्न योग कैंसर कारक हो सकते हैं…
1. राहु को विष माना गया है यदि राहु का किसी भाव या भावेश से संबंध हो एवं इसका लग्न या रोग भाव से भी सम्बन्ध हो तो शरीर में विष की मात्रा बढ़ जाती है।
2. षष्टेश लग्न, अष्टम या दशम भाव मे स्थित होकर राहु से दृष्ट हो तो कैंसर होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
3. बारहवें भाव में शनि-मंगल या शनि-राहु, शनि-केतु की युति हो तो जातक को कैंसर रोग देती है।
4. राहु की त्रिक भाव या त्रिकेश पर दृष्टि हो भी कैंसर रोग की संभावना बढ़ाती है।
5. षष्टम भाव तथा षष्ठेश पीडि़त या क्रूर ग्रह के नक्षत्र में स्थित हो।
6. बुध ग्रह त्वचा का कारक है अत: बुध अगर क्रूर ग्रहों से पीडि़त हो तथा राहु से दृष्ट हो तो जातक को कैंसर रोग होता है।
7. बुध ग्रह की पीडि़त या हीनबली या क्रूर ग्रह के नक्षत्र में स्थिति भी कैंसर को जन्म देती है।
बृहत पाराशरहोरा शास्त् के अनुसार षष्ठ पर क्रूर ग्रह का प्रभाव स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद होता है यथा ”रोग स्थाने गते पापे , तदीशी पाप….. अत: जातक रोगी होगा और यदि षष्ठ भाव में राहु व शनि हो तो असाध्य रोग से पीडि़त हो सकता है।
8.सभी लग्नो में कर्क लग्न के जातकों को सबसे ज्यादा खतरा इस रोग का होता है|
9.कर्क लग्न में बृहस्पति कैसर का मुख्य कारक है, यदि बृहस्पति की युति मंगल और शनि के साथ छठे, आठवे, बारहवें या दूसरे भाव के स्वामियों के साथ हो जाये व्यक्ति की मृत्यु कैंसर के कारण होना लगभग तय है|
10.शनि या मंगल किसी भी कुंडली में यदि छठे या आठवे स्थान में राहू या केतु के साथ हों तो कैंसर होने की प्रबल सम्भावना होती है|
11.छठे भाव का स्वामी लग्न, आठवे या दसवे में भाव में बैठा हो और पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो भी कैंसर की प्रबल सम्भावना होती है|
12.किसी जातक की कुंडली में सूर्य यदि छठे, आठवे या बढ़ावे भाव में पाप ग्रहों के साथ हो तो जातक को पेट या आंतों में अल्सर और कैंसर होने की प्रबल सम्भावना होती है|
13.किसी जातक की कुंडली में यदि सूर्य कही भी पाप ग्रहों के साथ हो और लग्नेश या लग्न भी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो भी कैंसर की प्रबल सम्भावना रहती है|
14.कमज़ोर चंद्रमा पापग्रहों की राशी में छठे, आठवे या बारहवे हो और लग्न अथवा चंद्रमा, शनि और मंगल से दृष्ट हो तो अवश्य ही कैंसर होता है|
15. चंद्रमा व शनि छठे भाव में स्थिति है तब व्यक्ति को पचपन वर्ष की उम्र पार करने के बाद रक्त कैंसर हो सकता है.
16. आश्लेषा नक्षत्र, लग्न या छठे भाव से संबंधित होने पर और मंगल से पीड़ित होने पर कैंसर होने की संभावना बनती है.
17. शनि छठे भाव में राहु के नक्षत्र में स्थित हो और पीड़ित हो तब कैंसर रोग की संभावना बनती है.
18. शनि और मंगल की युति छठे भाव में आर्द्रा या स्वाति नक्षत्र में हो रही हो.तो कैंसर की संभावना बनती है |
19. मंगल और राहु छठे या आठवें भाव को पीड़ित कर रहे हों तब त्वचा का कैंसर हो सकता है.
20. छ्ठे भाव में मेष राशि हो या स्वाति या शतभिषा नक्षत्र पड़ रहा हो और शनि छठे भाव को पीड़ित कर रहा हो तब त्वचा कैंसर का रोग हो सकता है.
21. जन्म कुंडली में राहु या केतु लग्न में षष्ठेश के साथ हो तो पेट का कैंसर हो सकता है |
22. छठा भाव पीड़ित हो और राहु या केतु, आठवें या दसवें भाव में स्थित हो तो पेट का कैंसर हो सकता है |
23. यदि किसी जातिका की कुण्डली में लग्नेश अष्टम, षष्टम अथवा द्वाद्श में चला गया हो, लग्न स्थान पर क्रूर व पापी ग्रहों की स्थिति हो, चतुर्थ स्थान का अधिपति शत्रुगृही होकर पीड़ित हो, छठे भाव का अधिपति चतुर्थेश से संबंध बना रहा हो तो ऐसी स्थिति में जातिका को ब्रेस्ट कैंसर या स्तनों में बड़े विकार की संभावना प्रबल रूप से मौज़ूद होती है।
24. छठे भाव में कर्क अथवा मकर राशि का शनि स्तन कैंसर का संकेत देता है।
25. छठे भाव में कर्क या मकर का मंगल स्तन कैंसर का द्योतक है।
26. यदि छठे भाव का स्वामी पाप ग्रह हो और लग्नेश आठवें या दसवें घर में बैठा हो तो कैंसर रोग की आशंका रहती है।
27. छठे भाव में कर्क राशि में चंद्रमा हो, तब भी कैंसर का द्योतक है।
28. चंद्रमा से शनि का सप्तम होना कैंसर की संभावना को प्रबल बनाता है।
इनके अतिरिक्त ज्योतिष रत्न के पाठ 24 के अनुसार—
१. राहु को विष माना गया है यदि राहु का किसी भाव या भावेश से संबन्ध हो एवम इसका लग्न या रोग भाव से भी सम्बन्ध हो तो शरीर मे विष की मात्रा बढ जाती है
२. षष्टेश लग्न ,अष्टम या दशम भाव में स्थित होकर राहु से दृष्ट हो तो कैंसर होने की सम्भावना बढ जाती है
३. बारहवे भाव मे शनि-मंगल या शनि –राहु,शनि-केतु की युतिहो तो जातक को कैंसर रोग देती है.
४. राहु की त्रिक भाव या त्रिकेश पर दृष्टि हो भी कैंसर रोग की संभावना बढाती है.
इनके अलावा निम्न बिन्दु भी कैसर रोग की पह्चान के लिये मेरे अनुभव सिद्ध है
१ षष्टम भाव तथा षष्ठेश पीडित या क्रूर ग्रह के नक्षत्र मे स्थित हो
२ बुध ग्रह त्वचा का कारक है अतः बुध अगर क्रूर ग्रहो से पीडित हो तथा राहु से दृष्ट हो तो जातक को कैसर रोग होता है
३ बुध ग्रह की पीडित या हीनबली या क्रूर ग्रह के नक्षत्र मे स्थिति भी कैंसर को जन्म देती है
बृहत पाराशरहोरा शास्त् के अनुसार षष्ठ पर क्रूर ग्रह का प्रभाव स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद होता है यथा ” रोग स्थाने गते पापे , तदीशी पाप..
अतः जातक रोगी होगा और यदि षष्ठ भाव में राहु व शनि हो तो असाध्य रोग से पीडित हो सकता है
कैंसर नाम की एक राशि होती है, जिसे भारतीय ज्योतिष में कर्कराशि कहते हैं । मेषादि राशिक्रम में इसका स्थान चौथा है । इसके स्वामी चन्द्रमा हैं । स्वभाव से यह चर राशि है । कालपुरुष के हृदय का प्रतिनिधित्व करती है ये राशि, फलतः जातक के हृदय से इसका विशेष सम्बन्ध माना जाता है । लग्नादि क्रम से चतुर्थ भाव को कर्क का प्रतिनिधित्व मिला है । अतः भले ही किसी जातक का जन्मलग्न कोई भी हो, उसके चतुर्थ भाव का विचार कर्करोग (कैंसर) विचार के सम्बन्ध में अवश्य करना चाहिए । साथ ही ये भी देखना चाहिए कि कर्कराशि जातक की कुण्डली में किस भाव में पड़ी हुयी, यानी कि जातक का जन्मलग्न क्या है ।  
जन्मांकचक्र के चतुर्थ भाव में राहु की अवस्थिति हो, अथवा कर्कराशि पर आरुढ़ होकर राहु किसी भी भाव में विराज रहा हो तो कर्करोग होने की सर्वाधिक आशंका जतायी जा सकती है । साथ ही ये भी देखना चाहिए कि चतुर्थ भाव और इसका भावेश किसी न किसी तरह यदि राहु से प्रभावित – दृष्ट, पीड़ित हो तो कर्करोग की आशंका जतायी जा सकती है । राहु की पूर्ण दृष्टिभोग के सम्बन्ध में अन्यान्य ग्रहों से किंचित भिन्न मत पर ध्यान देना चाहिए ।
यथा—सुत मदन नवान्ते पूर्ण दृष्टिं तमस्य , युगल दशम गेहे चार्द्ध दृष्टिं वदन्ति । सहज रिपु पश्यन् पाददृष्टिं मुनीन्द्राः , निज भुवन मुपेतो लोचनांधः प्रदिष्टः ।।  
(पंचम,सप्तम,नवम- पूर्ण दृष्टि, द्वितीय और दशम- अर्द्ध दृष्टि, तृतीय और षष्ठम पाद दृष्टि तथा स्वगृह(कन्या राशि पर)राहु लोचनांध होते हैं । )
 चतुर्थ भावपति का नीचस्थ वा शत्रुक्षेत्रस्थ होने पर भी कर्करोग की स्थिति हो सकती है । इन स्थितियों के अतिरिक्त चन्द्रमा, शनि, मंगल, सूर्य आदि का भी गम्भीरता से विचार अवश्य कर लेना चाहिए । क्यों कि उक्त ग्रहों की स्थिति, युति, दृष्टि आदि का सीधा प्रभाव पड़ता है रोग की स्थिति, मात्रा और अंग वा प्रकार पर । जैसे मंगल की विकृति से ब्लडकैंसर का खतरा हो सकता है । बुध की विकृति से ग्रन्थियों का बाहुल्य रहेगा इत्यादि 
मुख्यतः लोग षष्ठम भाव से रोग का विचार करते हैं, किन्तु इसके अतिरिक्त प्रथम, अष्टम व द्वादश भाव का भी गहन विचार करना चाहिए । साथ ही द्वितीय एवं सप्तम भाव को मारकेशत्व प्रधान होने के कारण इनपर भी विचार अवश्य करना चाहिए । रोग की साध्यासाध्यता की जानकारी हेतु सूर्य के बलाबल का ध्यान देना आवश्यक है । प्रभावी (जिम्मेवार) ग्रह (रोगकारक) की महादशा, अन्तर्दशादि के समय रोग की उग्रता समझनी चाहिए । मारकेशत्वों के बलाबल से साध्यासाध्यता की पहचान की जा सकती है ।
समझें केंसर के उपचार और उपाय को–
जन्म कुंडली में भावों के अनुसार शरीर से संबंधित ग्रहों के रत्नों का धारण करने से रोग-मुक्ति संभव होती है। लेकिन कभी-कभी जिसके द्वारा रोग उत्पन्न हुआ है, उसके शत्रु ग्र्रह का रत्न धारण करना भी लाभप्रद होता है। इसका आकलन किसी नीम हकीम ज्योतिषी से करवाना घातक हो सकता है |जिसे बहुत गंभीर समझ हो उसकी ही सलाह इस रोग में लेनी चाहिए और ज्योतिषीय उपाय करने चाहिए।
एक बात बहुत स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि मात्र ज्योतिषीय मंत्र-तंत्र-यंत्र से ही किसी रोग का निवारण नहीं किया जा सकता है।क्योकि ग्रह स्थितियों को सुधारकर भी आप शरीर में आये भौतिक परिवर्तन को नहीं बदल सकते |दूध जब तक दूध है तभी तक उसे बचा सकते हैं ,दही बनने पर वह दूध नहीं हो सकता वापस |इसलिए मात्र ज्योतिषीय उपायों के बल पर बैठना घातक होगा |
तंत्र मंत्र की सीमा वहां तक है की रोगी में सकारात्मक ऊर्जा ,धनात्मक ऊर्जा बढ़ा देंगे जिससे लड़ने की क्षमता बढ़ जाए |भाग्य अगर किन्ही नकारात्मक ऊर्जा के कारण बाधित है अथवा नकारात्मक ऊर्जा रोग बढ़ा रही है तो उसे तंत्र मंत्र हटा देंगे |जीवनी शक्ति बढ़ा देंगे ,पर रोग हो गया तो उसे केवल इनसे ख़त्म करना मुश्किल है। 
ज्योतिषीय उपाय ,तंत्र मंत्र के साथ अवचेतन को बल देना बेहतर होता है क्योकि अंततः सारा खेल अवचेतन को ही करना होता है अगर यह निराश हताश हुआ तो फिर न दवा काम करेगी न कोई उपाय | इन सभी के साथ-साथ औषधि सेवन, चिकित्सकों के द्वारा दी गई सलाह आदि का पालन किया जाना उतना ही आवश्यक है। तभी इसका पूर्ण लाभ उठाया जा सकता हैै। अगर समय से पूर्व किसी भी घटना या दुर्घटना के बारे में जानकारी हो जाये तो उससे बचने का हर संभव प्रयास किया जा सकता है पर दुर्घटना होने के बाद मुश्किल हो जाती है।
स्तन कैंसर के ज्योतिषीय कारण –आखिर ब्रेस्ट कैंसर होता क्यों है ??
इसका जवाब जब आप ज्योतिष से जानने की कोशिश करेंगे तो आपको आसानी होगी।
क्या स्तन कैंसर का कोई ज्योतिषीय कारण भी हो सकता है? विज्ञान इसे खारिज कर सकता है परंतु सदियों पुराने ज्योतिष शास्त्र में इस व्याधि की ओर भी संकेत किया गया है।
जातक की कुंडली के कई योग बताते हैं कि अगर वे प्रभावशाली हो जाएं तो स्तन कैंसर जैसा रोग उत्पन्न हो सकता है। जानिए कारण और निवारण के बारे में।
यदि लग्नेश स्वस्थान से आठवें, छठे या बारहवें भाव में चला गया हो एवं लग्न के स्थान पर क्रूर ग्रह बैठे हों तो, चौथे स्थान का स्वामी शत्रु के घर में विराजमान हो और छठे का मालिक चौथे से संबंध बनाए तो संभव है कि उस महिला को स्तन संबंधी कोई बड़ा रोग हो जाए। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि यदि किसी महिला की कुंडली का लग्न कमजोर हो, उस पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि हो अथवा वहां ऐसे ग्रह विराजमान हों जो शुभ फल देने में सक्षम न हों तो रोगी होने की आशंका प्रबल होती है। 
अगर उसके साथ ही छठा भाव भी श्रेष्ठ परिणाम न देने वाला हो, चंद्र की स्थिति प्रभावी न हो तो महिला को स्तन कैंसर हो सकता है।
अगर महिला की कुंडली में छठे या आठवें भाव में कोई क्रूर ग्रह स्थित हो तो उसे असाध्य रोग होने की आशंका होती है। 
वहीं चतुर्थ भाव में क्रर ग्रहों का योग सीने में दर्द एवं बड़े रोगों की ओर इशारा करता है। अगर समय रहते उनका इलाज नहीं कराया तो स्थिति बेकाबू हो सकती है।
ऐसे में रोगी महिला को अपने खानपान पर पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। स्वस्थ जीवनशैली की आदत डालते हुए योग, ध्यान, प्राणायाम आदि करने चाहिए। इससे वह इस स्तन कैंसर के संकट को टाल सकती है।
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Saturday, 7 August 2021

हर मुसीबत से छुटकारा दिलाने के टोटके

 हर मुसीबत से छुटकारा दिलाने वाले टोटके


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार व्यक्ति की रक्षा के लिए अनंत काल से रक्षा सूत्र, रक्षा कवच, रक्षा रेखा, रक्षा यंत्र आदि का उपयोग होता आया है। यह सदैव दुर्भिक्षों, अनहोनी घटनाओं, कुदृष्टि, मारण, उच्चाटन, विद्वेषण आदि तांत्रिक प्रयोगों से गुप्त रूप से सुरक्षा का काम करते रहे हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस रक्षा-सुरक्षा क्रम-उपक्रम में ही कीलन का उपयोग देखने को मिलता है।


तांत्रिक विद्या के अनुसार भांति-भांति की कीलों से तंत्र क्रियाओं द्वारा किसी स्थान को कीलने से अर्थात है वहां पर सुरक्षा कवच को स्थापित करना। बताया जाता है कीलन सुरक्षा की दृष्टि से तो किया ही जाता है परंतु इसके विपरीत ईर्ष्या-द्वेष, अनहित की भावना, शत्रुवत व्यवहार आदि के चलते भी स्थान का कीलन कर दिया जाता है।


कहने का मतलब है कि कीलन से अर्थ है सुरक्षा कवच। बांधने की क्रिया अर्थात किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान को सुरक्षा कवच में बाधने को कीलन या स्तम्भन कहते हैं। तो वहीं बंधे हुए को मुक्त करवाने की क्रिया को उत्कीलन कहा जाता है।


तंत्र विद्या की मानें तो कीलन सकारात्मक और नकारात्मक दो प्रकार से प्रयोग में लिए जाते हैं, उदाहरण:- किसी के काम से अन्य लोगों को हानि हो रही हो तो कीलन की विशेष प्रक्रिया द्वारा उसके काम को रोक दिया जाता है या दूसरे शब्दों में कहे तो कील दिया जाता है या स्तम्भित कर दिया जाता है।


साधना विधि-

इस मंत्र की साधना आप कभी भी शुरू कर सकते है। कीलन मंत्र साधना के लिए मंगलवार या शनिवार अच्छा रहता है। इस मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला से करने से इसका प्रभाव ओर बढ़ जाट है। आपको रोजाना दिन में एक बार इसका जाप करना होता है। पूर्व की तरफ मुख करके रुद्राक्ष की माला से किसी भी आसन का उपयोग कर इसका जप करें। कीलन मंत्र जपने के वक्त दो अगरबत्ती,कुछ पुष्प और कोई सी भी मिठाई पास रखनी चाहिए। इस तरह करने से कीलन मंत्र सिद्ध हो जाता है। ध्यान रहे जब भी किसी साधना को शुरू करना हो तो कीलन मंत्र का केवल 11 बार मंत्र जप करें। ऐसा करने से आपके सभी विघ्न, बाधाओं से रक्षा मिलेगी।


कीलन मंत्र-👉👉👉

*सिल्ली सिद्धिर वजुर के ताला, सात सौ देवी लूरे अकेला, धर दे वीर,पटक दे वीर,पछाड़ दे वीर, अरे-अरे विभीषण बल देखो तेरा, शरीर बाँध दे मेरा, मेरी भक्ति,गुरु की शक्ति, फुरो मंत्र ,इश्वरो वाचा!


*आस कीलूं पास कीलूं, कीलूं अपनी काया जागदा मसान कीलूं बैठी कीलूं छाया इसर का कोट बर्मा की थाली मेरे घाट पिंड का हनुमान वीर रखवाला!


*हनुमन् सर्वधर्मज्ञ, सर्वकार्य विधायक। अकस्मादागतोत्पातं नाशयाशु नमोऽस्तुते।।🕉️


कहा जाता है जो व्यक्ति पर भूत-प्रेत या जादू टोने या अभिचार कर्म से ग्रसित हो उसक हित के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है। इसके अलावा इस मंत्र का प्रयोग किसी मकान अथवा व्यापारिक प्रतिष्ठान पर जिसको किसी शत्रु ने बांध दिया हो, उसके बंधन को तोड़ने के लिए इस मंत्र अति प्रभावशाली सिद्ध होता है। ज्यादा प्रभावशाली बनाने के लिए लगातार 11 दिन तक प्रतिदिन इस मंत्र का 3000 बार जप करें।

👉👉👉

*सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याऽखिलेश्वरी। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ।।🕉️

 श्री दुर्गा सप्तशती का यह मंत्र अत्यन्त प्रभावशाली है।

ट्रांसफर करने/रुकबाने के उपाय

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संसार में लगभग सभी एक अच्छी नौकरी की चाह रखते हैं, और साथ ही यह भी चाहते हैं कि नौकरी में स्थायित्व हो। बार – बार तबादले तथा असुविधाजनक यात्राओं का झंझट ना रहे। हर कोई चाहता है कि वह एक ऐसी जगह अपना रोजगार पाए, जो उसके अनुकूल हो। मगर अधिकतर यह संभव नहीं हो पाता। सरकार की कार्यशैली, बड़े अधिकारियों की मनमर्जी या अन्य कारणों से तबादलों की प्रक्रिया सभी को झेलनी पड़ती है। कभी – कभी तो अधिकारी व्यक्तिगत चिढ़ के कारण अपने अधीनस्थ को ऐसी जगह ट्रांसफर करा देते हैं जहां जीवन बहुत मुश्किल हो। इस कारण व्यक्ति की जीवन शैली में काफी व्यवधान पड़ता है, ना ही दिनचर्या संतुलित रह पाती है और ना ही परिवार ठीक से चल पाता है। सबसे ज्यादा दिक्कत तो बच्चों की पढ़ाई के कारण आती है, तबादलों के फेर में उनकी पढ़ाई काफी अव्यवस्थित हो जाती है।


तबादला/ट्रांसफर करवाने रुकवाने के टोटके

तबादला/ट्रांसफर करवाने रुकवाने के टोटके

लेकिन सभी के मन में यही प्रश्न उठता है कि इस असुविधा से छुटकारा कैसे पाया जाए? इसलिए हम आज आपको कुछ ऐसे तरीके बताएंगे जो ना सिर्फ आपको इन तबादलों की तकलीफों से मुक्त कराएंगे, बल्कि आपके जीवन को व्यवस्थित करने में आपकी सहायता भी करेंगे।


तबादला/ट्रांसफर रोकने का टोटका


यदि आपके शीर्ष अधिकारियों द्वारा आपका तबादला किसी ऐसी जगह करवाया जा रहा है, जो आपके अनुकूल नहीं है अथवा आपकी इच्छा के विपरीत है । तो फिर आप निम्नलिखित उपाय कीजिये । इन उपायों के माध्यम से आपका तबादला रुक जाएगा और आपको कहीं और जाने के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा:


1- इसके लिए आप रविवार का व्रत रख सकते हैं या रविवार के दिन सिर्फ मीठा भोजन करें और सूर्यदेव को ताम्बे के लोटे में जल अर्पित करें । जितना हो सके नमक का सेवन रविवार को ना करें शीघ्र ही अच्छी खबर प्राप्त होगी ।


2- साथ ही प्रतिदिन नहाने के बाद “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र की एक माला का जाप करें।


3- एक इस प्रकार का सिक्का लें जिसमें किसी चेहरे की आकृति बनी हुई हो, और उसे लेकर ऐसी गली में जाएं जो पूरी तरह सुनसान हो। यह सोचते हुए जाएं यह सोचें कि वह चेहरा उस आदमी या उस अधिकारी का है, जो आपका ट्रांसफर करा रहा है; और उस सिक्के को टॉस की तरह उछालें तथा उछालते वक्त मन में बोलें कि “जो ऊपर जा रहा है वह नीचे भी आएगा”। इस विधि को करते समय ध्यान रखें कि कोई आपको देख ना पाए।


4- ढाक जिसे पलाश भी कहते हैं, के पत्तों को लेकर एक कटोरी नुमा दोना बनाएं, इस दोने में सुर्ख गुलाब की पंखुड़ियों को भर दें तथा शाम के समय अपनी कामना मन में रख कर किसी नदी में प्रवाहित कर दें ।


मनचाहे स्थानांतरण के उपाय


यदि आप अपने वर्तमान नियुक्ति स्थल से प्रसन्न नहीं हैं अथवा आपकी पोस्टिंग किसी ऐसी जगह है , जहाँ आप सहज महसूस नहीं करते हैं; और किसी ऐसी विशेष जगह तबादला चाहते हैं जो आपकी पसंदीदा हो । तो अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए आप यह उपाय आजमा सकते हैं-


1- जब भी आप अपनी नौकरी पर जाने के लिए घर से निकलें, तो एक कटोरी दही को गुड़ के साथ खाएं । ऐसा निरंतर करने से आपके तबादले की मनोकामना पूर्ण हो जाती है।


2- लगातार 21 दिन तक सूर्य देव को जल अर्पण करें, तथा अपने अधिकारी को कोई लाल रंग की वस्तु गिफ्ट करें । यदि अधिकारी को नहीं देना चाहें तो लाल रंग की कोई भी वस्तु किसी अन्य को दान करें।


3- रविवार के दिन लाल चंदन, ताम्बे का लोटा, गुड़, बिना छिलके की मसूर की दाल या गेहूं दान करें । इससे आपकी इच्छित जगह पर आपके तबादले के योग बनते हैं ।


4- अगर आप अपनी मनचाही जगह पर हैं और कहीं और तबादला होने से रोकना चाहते हैं तो 10 बड़े नींबू लेकर किसी बहती हुई नदी की धारा में अर्पित कर दें, मोकामना पूरी होगी।


मनोवांछित तबादला होने का उपाय/मंत्र:


यहाँ हम आपको कुछ मंत्र बता रहे हैं जिनकी साधना से आप अपने मनवांछित स्थल पर ट्रॉन्सफर करवा सकते हैं तथा अपनी पसंदीदा जगह पर स्थिर हो सकते हैं:


प्रतिदिन नहा धो कर पीले वस्त्र पहनें तथा एक आसन पर बैठ कर ध्यान लगाएं तथा

👉ॐ परमब्रह्म परमात्मने नमः उत्पत्ति-स्थिति-प्रलयं-कराय ब्रह्म हरिहराय,

त्रिगुणात्मने सर्व कौतुकानि दर्शय, दत्तात्रेयाय नमः (आपका नाम) सिद्धिं कुरू-कुरू स्वाहा।🌹


इस मंत्र का 21 बार जाप करें। पूजा समाप्त करने के उपरान्त भोजन कर लें, भोजन में यदि सम्भव हो तो गुड़ भी खाएं। यदि मीठे से परहेज है तो मसूर की दाल खाएं। इस विधि द्वारा मनवांछित स्थल पर नौकरी की मनोकामना की सिद्धि हो सकती है।🕉️


👉लगातार 21 दिन तक हर रोज नहाने के बाद एक तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें 108 लाल मिर्च के बीज डाल दें। और इस जल का अर्घ भगवान सूर्यदेव को दें, तथा अर्घ देते समय इस मंत्र का जाप करें

⭐ॐ घृणि सूर्याय आदित्याय नमः⭐


इस मंत्र के लगातार 21 दिनों तक जाप से मनोकामना पूरी होती है और मनचाही जगह नौकरी प्राप्त होती है।🌹


👉किसी भी शुक्रवार को प्रातः ब्रह्ममुहूर्त से पूर्व जागकर स्नान कर लें तथा इसके बाद दही या सफ़ेद मिठाई लेकर सात बार अपने ऊपर से ऊसार लें। ऐसा करते समय मन ही मन में साथ बार चंद्र देवता से प्रार्थना करें कि “हे चंद्र देव! मेरा स्थानांतरण (मनवांछित स्थान का नाम) पर करवा दीजिये। इसके बाद उस दही या मिठाई को सूर्योदय से पहले ही अपने घर के पास किसी चौराहे पर रख दें, जहाँ चन्द्रमा साफ़ नज़र आ रहा हो । अगर आपकी इच्छा पूरी हो जाए, तो उसी स्थान पर चन्द्रमा को खीर अर्पित करें।🕉️

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Monday, 5 July 2021

हस्थरेखा और अपनी जन्म तारीख समय ज्ञात करें

 

जन्म समय आपके हाथ पर लिखा है ®

हाथ पर लिखा

By: Astha Jyotish 👉 https://asthajyotish.business.site

हथेली पर जन्म तारीख

कभी कभी किसी कारणवश जन्म तारीख और दिन माह वार आदि का पता नही होता है,कितनी ही कोशिशि की जावे लेकिन जन्म तारीख का पता नही चल पाता है,जातक को सिवाय भटकने के और कुछ नही प्राप्त होता है,किसी ज्योतिषी से अगर अपनी जन्म तारीख निकलवायी भी जावे तो वह क्या कहेगा,इसका भी पता नही होता है,इस कारण के निवारण के लिये आपको कहीं और जाने की जरूरत नही है,किसी भी दिन उजाले में बैठकर एक सूक्षम दर्शी सीसा लेकर बैठ जावें,और अपने दोनो हाथों बताये गये नियमों के अनुसार देखना चालू कर दें,साथ में एक पेन या पैंसिल और कागज भी रख लें,तो देखें कि किस प्रकार से अपना हाथ जन्म तारीख को बताता है।

अपनी वर्तमान की आयु का निर्धारण करें

हथेली मे चार उंगली और एक अगूंठा होता है,अंगूठे के नीचे शुक्र पर्वत,फ़िर पहली उंगली तर्जनी उंगली की तरफ़ जाने पर अंगूठे और तर्जनी के बीच की जगह को मंगल पर्वत,तर्जनी के नीचे को गुरु पर्वत और बीच वाली उंगली के नीचे जिसे मध्यमा कहते है,शनि पर्वत,और बीच वाली उंगले के बाद वाली रिंग फ़िंगर या अनामिका के नीचे सूर्य पर्वत,अनामिका के बाद सबसे छोटी उंगली को कनिष्ठा कहते हैं,इसके नीचे बुध पर्वत का स्थान दिया गया है,इन्ही पांच पर्वतों का आयु निर्धारण के लिये मुख्य स्थान माना जाता है,उंगलियों की जड से जो रेखायें ऊपर की ओर जाती है,जो रेखायें खडी होती है,उनके द्वारा ही आयु निर्धारण किया जाता है,गुरु पर्वत से तर्जनी उंगली की जड से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें जो कटी नही हों,बीचवाली उंगली के नीचे से जो शनि पर्वत कहलाता है,से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें,की गिनती करनी है,ध्यान रहे कि कोई रेखा कटी नही होनी चाहिये,शनि पर्वत के नीचे वाली रेखाओं को ढाई से और बृहस्पति पर्वत के नीचे से निकलने वाली रेखाओं को डेढ से,गुणा करें,फ़िर मंगल पर्वत के नीचे से ऊपर की ओर जाने वाली रेखाओं को जोड लें,इनका योगफ़ल ही वर्तमान उम्र होगी।

अपने जन्म का महिना और राशि को पता करने का नियम

अपने दोनो हाथों की तर्जनी उंगलियों के तीसरे पोर और दूसरे पोर में लम्बवत रेखाओं को २३ से गुणा करने पर जो संख्या आये,उसमें १२ का भाग देने पर जो संख्या शेष बचती है,वही जातक का जन्म का महिना और उसकी राशि होती है,महिना और राशि का पता करने के लिये इस प्रकार का वैदिक नियम अपनाया जा सकता है:-

१-बैशाख-मेष राशि

२.ज्येष्ठ-वृष राशि

३.आषाढ-मिथुन राशि

४.श्रावण-कर्क राशि

५.भाद्रपद-सिंह राशि

६.अश्विन-कन्या राशि

७.कार्तिक-तुला राशि

८.अगहन-वृश्चिक राशि

९.पौष-धनु राशि

१०.माघ-मकर राशि

११.फ़ाल्गुन-कुम्भ राशि

१२.चैत्र-मीन राशि

इस प्रकार से अगर भाग देने के बाद शेष १ बचता है तो बैसाख मास और मेष राशि मानी जाती है,और २ शेष बचने पर ज्येष्ठ मास और वृष राशि मानी जाती है।

हाथ में राशि का स्पष्ट निशान भी पाया जाता है

प्रकृति ने अपने द्वारा संसार के सभी प्राणियों की पहिचान के लिये अलग अलग नियम प्रतिपादित किये है,जिस प्रकार से जानवरों में अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार उम्र की पहिचान की जाती है,उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में दाहिने या बायें हाथ की अनामिका उंगली के नीचे के पोर में सूर्य पर्वत पर राशि का स्पष्ट निशान पाया जाता है। उस राशि के चिन्ह के अनुसार महिने का उपरोक्त तरीके से पता किया जा सकता है।

पक्ष और दिन का तथा रात के बारे में ज्ञान करना

वैदिक रीति के अनुसार एक माह के दो पक्ष होते है,किसी भी हिन्दू माह के शुरुआत में कृष्ण पक्ष शुरु होता है,और बीच से शुक्ल पक्ष शुरु होता है,व्यक्ति के जन्म के पक्ष को जानने के लिये दोनों हाथों के अंगूठों के बीच के अंगूठे के विभाजित करने वाली रेखा को देखिये,दाहिने हाथ के अंगूठे के बीच की रेखा को देखने पर अगर वह दो रेखायें एक जौ का निशान बनाती है,तो जन्म शुक्ल पक्ष का जानना चाहिये,और जन्म दिन का माना जाता है,इसी प्रकार अगर दाहिने हाथ में केवल एक ही रेखा हो,और बायें हाथ में अगर जौ का निशान हो तो जन्म शुक्ल पक्ष का और रात का जन्म होता है,अगर दाहिने और बायें दोनो हाथों के अंगूठों में ही जौ का निशान हो तो जन्म कृष्ण पक्ष रात का मानना चाहिये,साधारणत: दाहिने हाथ में जौ का निशान शुक्ल पक्ष और बायें हाथ में जौ का निशान कृष्ण पक्ष का जन्म बताता है।

जन्म तारीख की गणना

मध्यमा उंगली के दूसरे पोर में तथा तीसरे पोर में जितनी भी लम्बी रेखायें हों,उन सबको मिलाकर जोड लें,और उस जोड में ३२ और मिला लें,फ़िर ५ का गुणा कर लें,और गुणनफ़ल में १५ का भाग देने जो संख्या शेष बचे वही जन्म तारीख होती है। दूसरा नियम है कि अंगूठे के नीचे शुक्र क्षेत्र कहा जाता है,इस क्षेत्र में खडी रेखाओं को गुना जाता है,जो रेखायें आडी रेखाओं के द्वारा काटी गयीं हो,उनको नही गिनना चाहिये,इन्हे ६ से गुणा करने पर और १५ से भाग देने पर शेष मिली संख्या ही तिथि का ज्ञान करवाती है,यदि शून्य बचता है तो वह पूर्णमासी का भान करवाती है,१५ की संख्या के बाद की संख्या को कृष्ण पक्ष की तिथि मानी जाती है।

जन्म वार का पता करना

अनामिका के दूसरे तथा तीसरे पोर में जितनी लम्बी रेखायें हों,उनको ५१७ से जोडकर ५ से गुणा करने के बाद ७ का भाग दिया जाता है,और जो संख्या शेष बचती है वही वार की संख्या होती है। १ से रविवार २ से सोमवार तीन से मंगलवार और ४ से बुधवार इसी प्रकार शनिवार तक गिनते जाते है।

जन्म समय और लगन की गणना

सूर्य पर्वत पर तथा अनामिका के पहले पोर पर,गुरु पर्वत पर तथा मध्यमा के प्रथम पोर पर जितनी खडी रेखायें होती है,उन्हे गिनकर उस संख्या में ८११ जोडकर १२४ से गुणा करने के बाद ६० से भाग दिया जाता है,भागफ़ल जन्म समय घंटे और मिनट का होता है,योगफ़ल अगर २४ से अधिक का है,तो २४ से फ़िर भाग दिया जाता है।

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हस्तरेखा से अनुमानित आयु की गणना  


हस्त परीक्षण के समय तक मनुष्य के जीवन में कितनी घटनाएं घटित हो चुकी हैं और कितनी आने वाले समय में घटित होंगी, इसका सटीक कथन करने के लिए उसकी वर्तमान आयु की गणना कार्य में प्रवीण् ाता प्राप्त कर लेना उचित होगा। इस कार्य में निपुण होने तक उसकी आयु और उसके उत्तर को अनुमान का आधार बनाना ही उचित रहता है। सभी मनुष्य अपनी ठीक आयु नहीं बता पाते हैं परंतु सही आयु के आस-पास की जानकारी अवश्य दे देते हैं। इस कच्चे अनुमान को हाथ की त्वचा, रेखा और रंगत एवं संगति इत्यादि के साथ देखकर सही आयु की गणना सरलता से की जा सकती है। हस्त परीक्षण करते समय आयु गणना करने का एक सुलभ सूत्र यह है कि मनुष्य की जीवन रेखा को ऊपर से नीचे की ओर बारंबार दबाया जाये तो रक्त प्रवाह की लालिमा में क्षण मात्र के लिए एक सफेद बिंदु सा उभरता है। यह बिंदु हाथ की सटीक आयु दर्शाने वाले स्थान पर होता है। किंतु यह प्रयोग कमरे का तापमान अनुकूल होने पर ही विशुद्ध परिणाम देता है। परिस्थितिवश भिन्नताओं के होने पर परिणामों में परिवर्तन भी आ सकता है।

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अतः इस साधन को हमेशा आयु का सही अनुमान लगाने वाला नहीं माना जा सकता। इस संभावना का कसौटी पर खरा उतरना हस्तरेखा के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा। हस्तरेखाओं को जीवन की वास्तविक दिशादर्शक मानने पर रेखाओं के भिन्न-भिन्न अंशों से यह संकेत प्राप्त हो जाता है कि उसका संबंध जीवन के निम्न भागों से है। प्रयोगों से स्पष्ट हो चुका है कि रेखा जहां से शुरू होती है, वह स्थान आरंभिक वर्षों का हिसाब रखता है तथा आगे का वर्षवार लेखा-जोखा उसमें जुड़ता जाता है। अतः रेखाओं के प्रांरभिक स्थान की जानकारी होना आवश्यक है। किस आयु में क्या-क्या घटनाएं घटी हैं या घटने वाली हंै इस बात को ठीक-ठीक बता पाने की कुशलता पूरी तरह हस्तरेखाविद् की तीक्ष्ण दृष्टि एवं सही परख पर निर्भर करती है। कुछ हस्तरेखाविद् एक वर्ष के भीतर घटित या घटने वाली घटना को बता सकते हैं किंतु ऐसे बहुत ही कम लोग हैं, जिन्होंने ऐसी कुशलता प्राप्त कर ली है। हस्तरेखा शास्त्र के नियमों की पूर्ण रूप से जानकारी रखने वाला व्यक्ति अधिक से अधिक इतना ही बता सकता है कि किस वर्ष में कौन सी घटना घटित होगी।

घटना घटित होने के महीने या दिन को बता पाना असंभव है। केवल हाथ को देखकर किसी व्यक्ति का नाम या उसके नाम का आद्यक्षर बताना भी संभव नहीं है। गौण घटनाओं या दैनिक जीवन के चिह्न व्यक्ति के हाथों में नहीं उभरते। हाथ में बना जीवन का मानचित्र केवल महत्वपूर्ण घटनाओं, गंभीर बीमारी, दशा परिवर्तन, गंभीर संकट, बड़ी खुशियों या खतरों या गहन प्रभाव डालने वाली घटनाओं या मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ने वाले अथवा जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन करने वाले व्यक्तियों को ही दर्शाता है। रेखाओं से आयु की गणना करते समय सर्वप्रथम मनुष्य की औसत आयु पर विचार करना चाहिए। व्यक्ति की 100 वर्ष या उससे अधिक मापने वाले मापदंड निश्चित करना त्रुटिपूर्ण है; क्योंकि यह देखा गया है कि लोग बहुधा इतनी आयु तक नहीं पहुंच पाते। जीवन रेखा का विभाजन गुरु अंगुली के नीचे, रेखा के प्रारंभ होने के स्थान से शुरू होता है तथा मणिबंध पर समाप्त होता है (देखिये चित्र क्रमांक 1 आयु गणना हेतु जीवन रेखा का विभाजन), मध्यवर्ती खंडों में जीवन के विभिन्न वर्षों का रिकार्ड रहता है। रेखा के परीक्षण में सुविधा एवं शीघ्रता की दृष्टि से रेखा को मध्य बिन्दु से विभाजित करके केंद्र बिंदु पर छत्तीस वर्ष की आयु निर्धारित की गई है जो सत्तर की लगभग आधी है। इस केंद्र बिंदु के ऊपर के स्थानों में दिए गये रेखा चित्र में चार, छः, बारह, अठारह, चैबीस तीस वर्षों में और केतु बिंदु के बाद के भाग को तैतालीस, इक्यावन, साठ और सत्तर वर्षों की आयु बताने वाले खंडों में बांटा गया है। इस तारीख तक पहुंचने के लिए चार से लेकर सत्तर वर्षों की आयु के बीच एक-एक वर्ष की कालावधि में समय का विभाजन करना आवश्यक है।

कींचित अभ्यास के पश्चात रेखा पर 4, 6, 12, 18, 24, 30, 36, 43, 51, 60 और 70 वर्ष की आयु का पता लगाना आसान हो सकता है। ऐसे अभ्यास से इन कालावधियों की शीघ्र और ठीक-ठीक पढ़ने की जानकारी प्राप्त हो जायेगी। भविष्यकथन करने के स्थान पर हाथ में आयु का कोई चिह्न न दिखाई देने की स्थिति में उस रेखा को ही वर्षों में विभाजित करके इस विधि के अनुसार सही तिथि निकाली जा सकती है। रेखा को पेंसिल से चिह्नित किए बिना खाली हाथ का निरीक्षण करते समय हाथ की लंबाई या छोटे होने की स्थिति को ध्यान में रखकर लंबाई के अनुपात में केंद्रबिंदु पर छत्तीस वर्ष की आयु मानकर कई स्थानों को मन में निश्चित करना आवश्यक है। याद रहे कि लंबे हाथ में प्रत्येक छः वर्ष की अवधि के मध्य अधिक और छोटे हाथ में कम अंतराल होता है। जीवन रेखा का इस तरह विभाजन करना अन्य सभी प्रकार के विभाजन की तुलना में अधिक शुद्ध एवं सही पाया गया है। यद्यपि परिणामों की शुद्धता हस्तरेखा शास्त्री के सटीक अनुमान पर निर्भर करेगी तथापि पर्याप्त परिश्रम करने पर वास्तविक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा पर चिह्नित घटनाएं जीवन रेखा के चिह्नों द्वारा प्रासंगिक हैं या नहीं, यह जानने के लिए कालावधियों को पढ़ना उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इन रेखाओं से कालावधि का अनुमान लगाने के नियमों का पालन करना और जीवन रेखा पर लागू होने वाली टिप्पणियों एवं तर्कों को इन रेखाओं के लिए प्रासंगिक मानना आवश्यक है। जीवन रेखा गुरु की अंगुली के नीचे से आरंभ होती है और उसकी दिशा हाथ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक होती है। रेखाएं भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाती हैं।

इसलिए कालावधियों की गणना को सुविधाजनक बनाने के लिए एक काल्पनिक रेखा को आधारवत् लेना उपयोगी रहता है। इस रेखा को गुरु पर्वत के मध्य से प्रारंभ कर हाथ के पार तक जाने की कल्पना की जाती है। हृदय रेखा या मस्तिष्क रेखा का निरीक्षण करते समय इस काल्पनिक रेखा (देखिए चित्र क्रमांक 2 आयु गणना (काल्पनिक रेखा के आधार पर) पर पूर्ववत् 6 से 70 वर्षों की अवधियां अंकित की जाती हैं और इन अवधि खंडों को पढ़ने से निकलने वाली आयु बिल्कुल सही पायी जाती है। इससे अधिक पास की तिथियां देखने के लिए हृदय या मस्तिष्क रेखाओं को एक वर्ष दर्शाने वाली कालावधियों में विभाजित किया जाता है और ठीक वही प्रक्रिया अपनाई जाती है जिसका उल्लेख जीवन रेखा के संबंध में किया गया है। उपर्युक्त माप तालिकाओं का सही तरह से उपयोग करने से ये सटीक परिणाम देती हैं। शनि रेखा पर आयु को नीचे से ऊपर की ओर पढ़ा जाता है। (देखिए चित्र क्रमांक तीन शनि रेखा का आधार) मणिबंध से मस्तिष्क रेखा तक का स्थान 0 से 30 वर्ष, मस्तिष्क रेखा से हृदय रेखा तक 30 से 45 वर्ष और हृदय रेखा से शनि की अंगुली तक 70 वर्ष की आयु बताने वाली कालावधियों में विभाजित कर दिया जाता है। इन तीन सामान्य उप-विभाजनों को ध्यान में रखकर प्रमुख कालावधियां पढ़ने की कला शीघ्र आ जाती है। एक वर्ष के भीतर के किसी समय को जानने के लिए रेखा को चिह्नित करके ठीक जीवन रेखा की तरह ही पढ़ा जाता है। मस्तिष्क और हृदय रेखाएं हाथ के आर-पार जिन अलग-अलग दिशाओं से जाती हैं, उन्हें शनि रेखा सदा एक ही स्थान पर नहीं काटती। यदि वे अनुचित दिशाओं में चली जाएं तथा उसके फलस्वरूप कोई चैड़ा या संकीर्ण चतुष्कोण बन जाये तो उनके बीच का अंतराल 30 से 45 वर्ष की आयु दर्शाने वाला नहीं होगा और सही तिथियां जानने के लिए शनि की पूरी रेखा की माप लेनी होगी।

सूर्य रेखा को नीचे से ऊपर की ओर उसी तरह पढ़ा जाता है जैसे शनि रेखा को और वही नियम एवं माप इस पर भी लागू होते हैं जो शनि रेखा को पढ़ने के लिए लागू होते हैं और सटीक तिथियां निकालने का उपाय भी दोनों का एक ही है। (देखिए चित्र क्रमांक चार सूर्य रेखा का आधार)। बुध रेखा को नीचे से ऊपर की ओर पढ़ा जाता है (देखिए चित्र क्रमांक 5 बुध रेखा का आधार) वही माप और वे ही नियम इसके लिए प्रासंगिक हैं जो अन्य रेखाओं पर लागू होते हैं सिवाय इसके कि यह रेखा लंबाई में छोटी होने के कारण कालावधियों हेतु लगाए जाने वाले चिह्नों के बीच की दूरी बहुत ही कम होती है क्योंकि उनके चिह्न पास-पास होते हैं। आयु को इस रेखा पर पढ़ना प्रायः वांछनीय होता है क्योंकि जीवन रेखा के संबंध में यह रेखा बहुत ही महत्वपूर्ण है। आकस्मिक रेखाओं पर आयु को पढ़ना आवश्यक नहीं है।

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ये रेखाएं मुख्य रेखाओं को काटने वाली, उनसे आरंभ होने वाली या उनके इतने समीप होती हैं कि आकस्मिक रेखा पर दी हुई आयु को मुख्य रेखा द्वारा पढ़ा जा सकता है। जीवन के स्वाभाविक मानचित्र में होने वाले परिवर्तनों या संभावनाओं को प्रकट करने वाली ऐसी आकस्मिक रेखाएं कई दिशाओं की ओर जाती हैं और ऐसे अप्रत्याशित स्थानों से प्रारंभ होती हंै कि उन पर आयु को पढ़ने का कोई नियम नहीं बनाया जा सकता तथापि मुख्य रेखाओं की गणना के आधार पर इनसे भी सही तिथियां निकाली जा सकती हैं। हस्तरेखा शास्त्र के किसी भी भाग के लिए इतना अभ्यास आवश्यक नहीं जितना की तिथियों को जानने के लिए। पहले-पहले अनेक असफलताएं प्राप्त होंगी किंतु ऐसी असफलताएं नियमों के कारण नहीं बल्कि अभ्यास कार्य में लगे व्यक्ति की ग्रहण शक्ति कम रहने के कारण होगी। बीमारी के बारे में निरीक्षण करते समय न केवल जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा, हृदय रेखा व बुध रेखा तथा पर्वतों की जांच भी की जाती है अपितु उनकी तिथियों का भी इन रेखाओं से अंकित विधियों के साथ मिलान किया जाता है।

Monday, 9 November 2020

विवाह कहां होगी शंका समाधान

 *ज्योतिष चर्चा*

*कन्या विवाह संबंधित शंका समाधान*

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*विवाह कहां होगा* 


ज्योतिष और वास्तु समाधान //नाम नहीं कर्म में विश्वास करें//

Astha Jyotish ✋ Vastu Guru Mkpoddar 🙏

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माता-पिता अपनी कन्या का विवाह करने के लिए वर की कुंडली का गुण मिलान करते हैं। कन्या के भविष्य के प्रति चिंतित माता-पिता का यह कदम उचित है। किंतु, इसके पूर्व उन्हें यह देखना चाहिए कि लड़की का विवाह किस उम्र में, किस दिशा में तथा कैसे घर में होगा? उसका पति किस वर्ण का, किस सामाजिक स्तर का तथा कितने भाई-बहनों वाला होगा? लड़की की जन्म लग्न कुंडली से उसके होने वाले पति एवं ससुराल के विषय में सब कुछ स्पष्टतः पता चल सकता है। ज्योतिष विज्ञान में फलित शास्त्र के अनुसार लड़की की जन्म लग्न कुंडली में लग्न से सप्तम भाव उसके जीवन, पति, दाम्पत्य जीवन तथा वैवाहिक संबंधों का भाव है। इस भाव से उसके होने वाले पति का कद, रंग, रूप, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय या कार्यक्षेत्र, परिवार से संबंध कि आदि की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यहां सप्तम भाव के आधार पर कन्या के विवाह से संबंधित विभिन्न तथ्यों का विश्लेषण प्रस्तुत है।


ससुराल की दूरी:

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सप्तम भाव में अगर वृष, सिंह, वृश्चिक या कुंभ राशि स्थित हो, तो लड़की की शादी उसके जन्म स्थान से 90 किलोमीटर के अंदर ही होगी। यदि सप्तम भाव में चंद्र, शुक्र तथा गुरु हों, तो लड़की की शादी जन्म स्थान के समीप होगी। यदि सप्तम भाव में चर राशि मेष, कर्क, तुला या मकर हो, तो विवाह उसके जन्म स्थान से 200 किलोमीटर के अंदर होगा। अगर सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि स्थित हो, तो विवाह जन्म स्थान से 80 से 100 किलोमीटर की दूरी पर होगा। यदि सप्तमेश सप्तम भाव से द्वादश भाव के मध्य हो, तो विवाह विदेश में होगा या लड़का शादी करके लड़की को अपने साथ लेकर विदेश चला जाएगा।


शादी की आयु:

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यदि जातक या जातका की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में सप्तमेश बुध हो और वह पाप ग्रह से प्रभावित न हो, तो शादी 13 से 18 वर्ष की आयु सीमा में होता है। सप्तम भाव में सप्तमेश मंगल पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो शादी 18 वर्ष के अंदर होगी। शुक्र ग्रह युवा अवस्था का द्योतक है। सप्तमेश शुक्र पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो 25 वर्ष की आयु में विवाह होगा। चंद्रमा सप्तमेश होकर पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो विवाह 22 वर्ष की आयु में होगा। बृहस्पति सप्तम भाव में सप्तमेश होकर पापी ग्रहों से प्रभावित न हो, तो शादी 27-28 वें वर्ष में होगी। सप्तम भाव को सभी ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तथा सप्तम भाव में शुभ ग्रह से युक्त हो कर चर राशि हो, तो जातिका का विवाह दी गई आयु में संपन्न हो जाता है। यदि किसी लड़की या लड़के की जन्मकुंडली में बुध स्वराशि मिथुन या कन्या का होकर सप्तम भाव में बैठा हो, तो विवाह बाल्यावस्था में होगा।


विवाह वर्ष ज्ञात करने की ज्योतिषीय विधि:

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आयु के जिस वर्ष में गोचरस्थ गुरु लग्न, तृतीय, पंचम, नवम या एकादश भाव में आता है, उस वर्ष शादी होना निश्चित समझना चाहिए। परंतु शनि की दृष्टि सप्तम भाव या लग्न पर नहीं होनी चाहिए। अनुभव में देखा गया है कि लग्न या सप्तम में बृहस्पति की स्थिति होने पर उस वर्ष शादी हुई है।


विवाह कब होगा यह जानने की दो विधियां यहां प्रस्तुत हैं। जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में स्थित राशि अंक में 10 जोड़ दें। योगफल विवाह का वर्ष होगा। सप्तम भाव पर जितने पापी ग्रहों की दृष्टि हो, उनमें प्रत्येक की दृष्टि के लिए 4-4 वर्ष जोड़ योगफल विवाह का वर्ष होगा।


जहां तक विवाह की दिशा का प्रश्न है, ज्योतिष के अनुसार गणित करके इसकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। जन्मांग में सप्तम भाव में स्थित राशि के आधार पर शादी की दिशा ज्ञात की जाती है। उक्त भाव में मेष, सिंह या धनु राशि एवं सूर्य और शुक्र ग्रह होने पर पूर्व दिशा, वृष, कन्या या मकर राशि और चंद्र, शनि ग्रह होने पर दक्षिण दिशा, मिथुन, तुला या कुंभ राशि और मंगल, राहु, केतु ग्रह होने पर पश्चिम दिशा, कर्क, वृश्चिक, मीन या राशि और बुध और गुरु ग्रह होने पर उत्तर दिशा की तरफ शादी होगी। अगर जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो और उस भाव पर अन्य ग्रह की दृष्टि न हो, तो बलवान ग्रह की स्थिति राशि में शादी की दिशा समझनी चाहिए। एक अन्य नियम के अनुसार शुक्र जन्म लग्न कुंडली में जहां कहीं भी हो, वहां से सप्तम भाव तक गिनें। उस सप्तम भाव की राशि स्वामी की दिशा में शादी होनी चाहिए। जैसे अगर किसी कुंडली में शुक्र नवम भाव में स्थित है, तो उस नवम भाव से सप्तम भाव तक गिनें तो वहां से सप्तम भाव वृश्चिक राशि हुई। इस राशि का स्वामी मंगल हुआ। मंगल ग्रह की दिशा दक्षिण है। अतः शादी दक्षिण दिशा में करनी चाहिए।


पति कैसा मिलेगा:

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ज्योतिष विज्ञान में सप्तमेश अगर शुभ ग्रह (चंद्रमा, बुध, गुरु या शुक्र) हो या सप्तम भाव में स्थित हो या सप्तम भाव को देख रहा हो, तो लड़की का पति सम आयु या दो-चार वर्ष के अंतर का, गौरांग और सुंदर होना चाहिए। अगर सप्तम भाव पर या सप्तम भाव में पापी ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु या केतु का प्रभाव हो, तो बड़ी आयु वाला अर्थात लड़की की उम्र से 5 वर्ष बड़ी आयु का होगा। सूर्य का प्रभाव हो, तो गौरांग, आकर्षक चेहरे वाला, मंगल का प्रभाव हो, तो लाल चेहरे वाला होगा। शनि अगर अपनी राशि का उच्च न हो, तो वर काला या कुरूप तथा लड़की की उम्र से काफी बड़ी आयु वाला होगा। अगर शनि उच्च राशि का हो, तो, पतले शरीर वाला गोरा तथा उम्र में लड़की से 12 वर्ष बड़ा होगा।


सप्तमेश अगर सूर्य हो, तो पति गोल मुख तथा तेज ललाट वाला, आकर्षक, गोरा सुंदर, यशस्वी एवं राजकर्मचारी होगा। चंद्रमा अगर सप्तमेश हो, तो पति शांत चित्त वाला गौर वर्ण का, मध्यम कद तथा, सुडौल शरीर वाला होगा। मंगल सप्तमेश हो, तो पति का शरीर बलवान होगा। वह क्रोधी स्वभाव वाला, नियम का पालन करने वाला, सत्यवादी, छोटे कद वाला, शूरवीर, विद्वान तथा भ्रातृ-प्रेमी होगा तथा सेना, पुलिस या सरकारी सेवा में कार्यरत होगा।


पति कितने भाई-बहनों वाला होगा:

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लड़की की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव से तृतीय भाव अर्थात नवम भाव उसके पति के भाई-बहन का स्थान होता है। उक्त भाव में स्थित ग्रह तथा उस पर दृष्टि डालने वाले ग्रह की संख्या से 2 बहन, मंगल से 1 भाई व 2 बहन, बुध से 2 भाई 2 बहन वाला कहना चाहिए। लड़की की जन्मकुंडली में पंचम भाव उसके पति के बड़े भाई-बहन का स्थान है। पंचम भाव में स्थित ग्रह तथा दृष्टि डालने वाले ग्रहों की कुल संख्या उसके पति के बड़े भाई-बहन की संख्या होगी। पुरुष ग्रह से भाई तथा स्त्री ग्रह से बहन समझना चाहिए।


पति का मकान कहां एवं कैसा होगा:

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लड़की की जन्म लग्न कुंडली में उसके लग्न भाव से तृतीय भाव पति का भाग्य स्थान होता है। इसके स्वामी के स्वक्षेत्री या मित्रक्षेत्री होने से पंचम और राशि वृद्धि से या तृतीयेश से पंचम जो राशि हो, उसी राशि का श्वसुर का गांव या नगर होगा। प्रत्येक राशि में 9 अक्षर होते हैं। राशि स्वामी यदि शत्रुक्षेत्री हो, तो प्रथम, द्वितीय अक्षर, सम राशि का हो, तो तृतीय, चतुर्थ अक्षर मित्रक्षेत्री हो, तो पंचम, षष्ठम अक्षर, अपनी ही राशि का हो तो सप्तम, अष्टम अक्षर, उच्च क्षेत्री हो, तो नवम अक्षर प्रसिद्ध नाम होगा। तृतीयेश के शत्रुक्षेत्री होने से जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि ससुराल या भवन की होगी। यदि तृतीय से शत्रु राशि में हो और तृतीय भाव में शत्रु राशि में पड़ रहा हो ,तो दसवी राशि ससुर के गांव की होगी। लड़की की कुंडली में दसवां भाव उसके पति का भाव होता है। दशम भाव अगर शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, या दशमेश से युक्त या दृष्ट हो, तो पति का अपना मकान होता है। राहु, केतु, शनि, से भवन बहुत पुराना होगा। मंगल ग्रह में मकान टूटा होगा। सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु एवं शुक्र से भवन सुंदर, सीमेंट का दो मंजिला होगा। अगर दशम स्थान में शनि बलवान हो, तो मकान बहुत विशाल होगा।


पति की नौकरी:

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लड़की की जन्म लग्न कुंडली में चतुर्थ भाव पति का राज्य भाव होता है। अगर चतुर्थ भाव बलयुक्त हो और चतुर्थेश की स्थिति या दृष्टि से युक्त सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र की स्थिति या चंद्रमा की स्थिति उत्तम हो, तो नौकरी का योग बनता है।


पति की आयु:

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लड़की के जन्म लग्न में द्वितीय भाव उसके पति की आयु भाव है। अगर द्वितीयेश शुभ स्थिति में हो या अपने स्थान से द्वितीय स्थान को देख रहा हो, तो पति दीर्घायु होता है। अगर द्वितीय भाव में शनि स्थित हो या गुरु सप्तम भाव, द्वितीय भाव को देख रहा हो, तो भी पति की आयु 75 वर्ष की होती है।

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