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Tuesday, 17 February 2026
रत्न धारण कैसे करें?
Jyotishgurumk
बृहद संहिता पुराणों पर आधारित आचार्य वाराहमिहिर द्वारा स्वरचित सुन्दर ग्रन्थ है। वाराहमिहिर के इस ग्रन्थ में रत्नों की उत्पत्ति व गुण दोषों का सुन्दर वर्णन मिलता है। इसके अलावा रत्न के विषय में अनेक ग्रंथों में वर्णन है ।
👉 रत्न धारण करने से ना शुभता आती है ना अशुभता आती है । रत्नों के माध्यम से ग्रहों से संबंधित रश्मि या ऊर्जा की मात्रा में वृद्धि किया जाता है ।
👉 जन्म कुंडली विश्लेषण के अनुसार यदि कोई ग्रह हमें लाभ देने वाले हैं या हमारे जीवन में उनका बहुत ज्यादा महत्व है यदि वह कमजोर हैं , तब उनके बल में वृद्धि करने के लिए रत्न धारण किया जाता है । जिससे हमें पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके ।
👉 मुख्यतः ग्रह अंश बल , स्थान बल , पक्ष बल ( और भी कई प्रकार से ग्रहों का बल देखा जाता है ) में कमजोर होते हैं या 6 , 8 , 12 भाव में चले जाते हैं तब कमजोर होते हैं या नीच राशि में विराजमान होते हैं तब कमजोर होते हैं ।
अब ऐसी स्थिति में उन ग्रहों से संबंधित लाभ लेने के लिए रत्न धारण किया जाता है ।
👉 परंतु रत्न धारण करते समय यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जो ग्रह कमजोर है उसकी दृष्टि किस राशि एवं किस ग्रह पर पड़ रही है । यदि वहां दृष्टि डालकर वह परेशानी का योग बना रहे हैं या जहां विराजमान है वहां के अनुसार भी परेशानी का योग बना रहे हैं तब रत्न धारण नहीं करेंगे बल्कि उसका मंत्र जाप इत्यादि करेंगे ।
👉 यदि कोई ग्रह बल में कमजोर नहीं है तो उसका रत्न धारण नहीं करना चाहिए उससे आपको कोई लाभ नहीं होगा ।
👉 कुछ लोग जिन्होंने कभी कोई रत्न धारण नहीं किया है ना करवाया है । रत्न ज्योतिष का कोई ज्ञान नहीं है ना ही उसका कोई एक्सपीरियंस है ऐसे लोग लोगों को भड़काते रहते हैं कि 6 , 8 , 12 में चला गया तो उसका रत्न मत धारण करो । नीच राशि में विराजमान ग्रह का रत्न धरण मत करो जबकि मैंने सैकड़ो लोगों को 6 , 8 , 12 भाव में गए ग्रह का धारण करवाया है । मैं स्वयं 12 भाव में विराजमान ग्रह का रत्न धारण किया हूं । और श्रेष्ठ लाभ प्राप्त हुआ है ।
👉 परंतु बिना संपूर्ण विश्लेषण के किसी भी ग्रह का रत्न धारण नहीं किया जा सकता है । क्योंकि रत्न धारण करने से पहले ग्रहों के फलादेश को समझना आवश्यक है ।
♦️ यहां दो वृष लग्न की कुंडली पोस्ट किया गया है । पहली कुंडली में शनि द्वादश भाव में नीच राशि में विराजमान है । वह किसी ग्रह पर दृष्टि डालकर पीड़ित नहीं कर रहा है । इसलिए इसका रत्न धारण किया जा सकता है ।
दूसरी कुंडली में शनि द्वितीय भाव में सूर्य एवं मंगल पर दृष्टि डाल रहे हैं । जिसके कारण धन , कुटुंब , माता , भूमि , भवन एवं वैवाहिक जीवन में परेशानी का योग बनेगा । अतः यहां पर शनि का रत्न नहीं धारण कर सकते हैं । यहां हम उसका मंत्र जाप कर सकते हैं या लोहे का छल्ला धारण कर सकते हैं ।
👉 अब यदि दोनों व्यक्ति नीलम धारण करेंगे तो अपना-अपना अनुभव बताएंगे । एक बोलेगा मुझे तो लाभ हुआ दूसरा बोलेगा मुझे हानि हुई । अब दूसरा सब लोगों को भड़काएगा की 12 भाव में विराजमान ग्रह का रत्न नहीं धारण करना चाहिए हानि पहुंचती है । जबकि वह अपनी कुंडली का विश्लेषण नहीं चेक कर रहा है कि क्यों परेशानी हो रही है ।
🔹🔹🔹🔹🔹
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आपका Personal Year क्या है? 30 सेकंड में कैल्कुलेट करें।
Jyotishgurumk
2026 की सटीक भविष्यवाणी: अंक ज्योतिष से जानें कैसा रहेगा आपका भविष्य फल।
नमस्कार दोस्तों, मैं हूँ Astro Manoj।
क्या 2026 आपके लिए वह 'लकी' साल साबित होने वाला है जिसका आप लंबे समय से इंतजार कर रहे थे? हर नया साल ब्रह्मांड की एक नई ऊर्जा और नई उम्मीदें लेकर आता है। लेकिन वैदिक अंक ज्योतिष (Vedic Numerology) के अनुसार, 2026 आपके व्यक्तिगत जीवन के लिए क्या संकेत दे रहा है, यह आपके "पर्सनल ईयर" (Personal Year) और "अंतरदशा" की गणना पर निर्भर करता है।
अक्सर लोग केवल सामान्य भविष्यफल देखते हैं, लेकिन यह पद्धति आपके जन्म की तारीख और उस विशेष दिन (वार) के आधार पर काम करती है, जिससे परिणाम कहीं अधिक सटीक हो जाते हैं। आइए जानते हैं कि आप खुद घर बैठे अपनी गणना कैसे कर सकते हैं।
वह अनोखा सूत्र: अपनी 'अंतरदशा' और 'पर्सनल ईयर' कैसे निकालें?
अंक ज्योतिष का यह विशेष सूत्र "जन्म वार" (Birth Weekday) को जोड़ने के कारण बहुत प्रभावशाली माना जाता है। अपनी गणना करने के लिए आपको नीचे दिए गए अंकों को जोड़ना होगा:
गणना की विधि:
1. जन्म का दिन: अपनी जन्म तिथि के अंकों का योग।
2. जन्म का महीना: अपने जन्म के महीने का अंक।
3. लक्ष्य वर्ष (2026): यहाँ हम केवल वर्ष के अंतिम दो अंकों (26) का उपयोग करेंगे, यानी 2+6 = 8।
4. जन्म वार का अंक: जिस दिन आपका जन्म हुआ, उसका निर्धारित अंक नीचे दी गई तालिका से लें:
* रविवार (Sunday) = 1 और 4
* सोमवार (Monday) = 2 और 7
* मंगलवार (Tuesday) = 9
* बुधवार (Wednesday) = 5
* गुरुवार (Thursday) = 3
* शुक्रवार (Friday) = 6
* शनिवार (Saturday) = 8
एक उदाहरण से समझें: मान लीजिए किसी व्यक्ति की जन्म तिथि 12/02/1999 है और उनका जन्म शुक्रवार (Friday) को हुआ था। वे 2026 के लिए अपनी दशा जानना चाहते हैं।
* (जन्म दिन): 1 + 2 = 3
* (जन्म महीना): 0 + 2 = 2
* (साल 2026 के अंक): 2 + 6 = 8
* (जन्म वार - शुक्रवार): 6
कुल योग: (3) + (2) + (8) + (6) = 19 इसे एकल अंक (Single Digit) में बदलें: 1 + 9 = 10 -> 1 + 0 = 1
इस प्रकार, इस व्यक्ति का पर्सनल ईयर 1 बना।
सूर्य का प्रभाव: पर्सनल ईयर 1 का भविष्य फल
यदि आपकी गणना का कुल योग '1' आता है, तो यह "सूर्य का वर्ष" है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य को ग्रहों का राजा और आत्मा का कारक माना गया है। पर्सनल ईयर 1 का मतलब है कि आप एक नए 9-साल के चक्र में प्रवेश कर रहे हैं। यह समय अपनी 'ऊर्जा' (Energy) को केंद्रित करने और पुराने डर को छोड़कर नेतृत्व संभालने का है।
"सूर्य महादशा में सूर्य अंतरदशा चल रही है — और यह साल जातक के लिए शुभ संकेत देता है।"
यदि आपका पर्सनल ईयर 1 है, तो 2026 में आप मानसिक रूप से अधिक सशक्त महसूस करेंगे। यह साल आपके भीतर के 'संकल्प' को जगाने और सफलता की नई इबारत लिखने के लिए श्रेष्ठ है।
1 से 9 तक के अंकों का भविष्यफल नीचे देखें।
2026 में आपका पर्सनल ईयर अंक आपकी मानसिकता और परिस्थितियों को किस तरह प्रभावित करेगा, आइए विस्तार से जानते हैं:
* पर्सनल ईयर 1: नई शुरुआत – यह साल नेतृत्व और आत्मविश्वास का है। मानसिक रूप से आप नए जोखिम लेने और अपनी पहचान बनाने के लिए पूरी तरह तैयार रहेंगे।
* पर्सनल ईयर 2: सहयोग और संबंध – आपकी मानसिकता दूसरों के प्रति संवेदनशील रहेगी। यह साल अकेले चलने का नहीं, बल्कि साझेदारी और रिश्तों में तालमेल बिठाने का है।
* पर्सनल ईयर 3: क्रिएटिविटी – आपकी रचनात्मक ऊर्जा चरम पर होगी। आप खुद को अभिव्यक्त करने के नए तरीके खोजेंगे और सामाजिक दायरे में आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी।
* पर्सनल ईयर 4: मेहनत – यह अनुशासन का साल है। आपकी सहनशक्ति की परीक्षा होगी; ध्यान रखें कि इस साल कोई भी शॉर्टकट काम नहीं आएगा, केवल ठोस योजना ही सफल होगी।
* पर्सनल ईयर 5: बदलाव – जीवन में अनपेक्षित मोड़ आ सकते हैं। आप मानसिक रूप से स्वतंत्रता और रोमांच की तलाश में रहेंगे, जिससे यात्रा या करियर में बड़े बदलाव संभव हैं।
* पर्सनल ईयर 6: परिवार और जिम्मेदारी – आपका ध्यान घर और अपनों पर केंद्रित रहेगा। यह अपनी जिम्मेदारियों को निभाने और पारिवारिक सुख-शांति को प्राथमिकता देने का समय है।
* पर्सनल ईयर 7: आध्यात्म – आप भीड़भाड़ से दूर एकांत की तलाश करेंगे। आत्म-चिंतन और गहन अध्ययन के लिए यह साल बेहतरीन है, जहाँ आप जीवन के गहरे रहस्यों को समझेंगे।
* पर्सनल ईयर 8: धन और करियर – यह कर्मों के फल का साल है। आर्थिक उन्नति और करियर में सत्ता हासिल करने की तीव्र इच्छा आप पर हावी रहेगी; आपकी मेहनत का परिणाम धन के रूप में दिखेगा।
* पर्सनल ईयर 9: समापन – यह सफाई का साल है। जो चीजें अब आपके काम की नहीं हैं (चाहे वे विचार हों या रिश्ते), उन्हें छोड़कर नए चक्र के लिए जगह बनाने की मानसिकता बनी रहेगी।
अंक ज्योतिष हमें केवल भविष्य नहीं बताता, बल्कि हमें आने वाली चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है। जब आप अपनी 'अंतरदशा' को जान लेते हैं, तो आप अपनी ऊर्जा को सही दिशा में प्रवाहित कर सकते हैं। 2026 का साल हर किसी के लिए एक अलग सबक लेकर आ रहा है—चाहे वह अंक 1 की नई शुरुआत हो या अंक 8 की भौतिक सफलता।
आपका पर्सनल ईयर कौन सा आया? क्या आप 2026 के इन बदलावों के लिए तैयार हैं?
अपनी गणना नीचे कमेंट बॉक्स में साझा करें और हमें बताएं कि आप इस साल क्या नया शुरू करने वाले हैं। ऐसी ही सटीक ज्योतिषीय जानकारियों के लिए चैनल सबस्क्राइब करें और लाईक शेयर करें और हमारे साथ जुड़े रहें ।
धन्यवाद! 🙏
Tuesday, 18 February 2025
राशि अनुसार विवाह के उपाय, तुरंत बनेंगे विवाह के योग।
आप में से कई लोग ऐसे होंगे, जो विवाह तो करना चाह रहे हैं लेकिन विवाह होने में कोई ना कोई परेशानी बनी रहती है।
Jyotish Guru Mk, Astrology or Vastu Resolve, whatsapp. 9333112719 .
कुछ लोग ऐसे होते हैं,जीवनसाथी तो मिल गया है लेकिन विवाह में समस्या आ रही है। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके विवाह में ऐन मौके पर कोई ना कोई अड़चन आ रही है,इस वजह से विवाह में देरी हो रही है। शास्त्र के अनुसार, किसी भी जातक की कुंडली में विवाह का कारक भाव *सप्तम भाव* को माना गया है। सप्तम भाव के कारक ग्रह शुक्र और गुरु ग्रह हैं। जब व्यक्ति की कुंडली में शुक्र और गुरु की अवस्था सही नहीं होती है तो विवाह में दिक्कतें आती हैं। इसके अलावा अगर सप्तम भाव राहु, केतु और शनि जैसे पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो भी व्यक्ति के विवाह में कोई ना कोई परेशानी रहती है। ऐसे में राशि अनुसार उपाय करेंगे तो आपकी समस्या का जल्द समाधान मिलेगा। जानते हैं शीघ्र विवाह के लिए राशि अनुसार कौन से उपाय करें....
मेष राशि:-
मेष राशि के स्वामी मंगल ग्रह हैं इसलिए मेष राशि के व्यक्ति शिवालय में जाकर *माता गौरी* को गुड़ अर्पित करें और गुड़ के प्रसाद के तौर पर ग्रहण भी कर लें। ऐसे में विवाह के शुभ योग बनने लग जाते हैं।
वृष राशि:-
वृष राशि के स्वामी शुक्र ग्रह हैं इसलिए वृष राशि वाले *माता गौरी *को पीपल का पत्ता अर्पित करें। ऐसा करने से विवाह संबंधी समस्याएं दूर हो जाएंगी और शीघ्र विवाह के योग बनने लग जाएंगे।
मिथुन राशि:-
मिथुन राशि के स्वामी बुध ग्रह हैं इसलिए मिथुन राशि वाले *माता गौरी को हरे रंग* का धागा अर्पित करें और फिर उसको अपने पास रखें। ऐसा करने से योग्य जीवनसाथी मिलेगी और विवाह में आ रही परेशानियां दूर होंगी।
कर्क राशि:-
कर्क राशि के स्वामी चंद्र ग्रह हैं इसलिए कर्क राशि वाले माता गौरी को *पीपल के पत्ते पर सिंदूर* लगाकर अर्पित करें। ऐसा करने से विवाह संबंधी परेशानियां खत्म होंगी और माता गौरी की कृपा से विवाह के शुभ योग भी बनने लग जाएंगे।
सिंह राशि:-
सिंह राशि के स्वामी सूर्यदेव हैं इसलिए सिंह राशि *माता मंगला गौरी को लाल धागा* अर्पित करें और फिर उस धागे को अपने पास रखें। ऐसा करने से विवाह संबंधी समस्या दूर होगी और योग्य जीवनसाथी मिलेगा।
कन्या राशि:-
कन्या राशि के स्वामी बुध ग्रह हैं इसलिए कन्या राशि वाले जातक को *ॐ गौरी शंकराय नमः* मंत्र का सुबह शाम 108 बार जप करें। ऐसा करने से विवाह और वैवाहिक जीवन में जो भी परेशानियां चल रही हैं, वे सभी दूर हो जाएंगी।
तुला राशि:-
तुला राशि के स्वामी शुक्र ग्रह हैं इसलिए तुला राशि के जातक *माता मंगला गौरी को मसूर दाल* अर्पित करें और इसके बाद मसूर दाल के कुछ दाने अपने पास रख लें। ऐसा करने से जिनकी शादी नहीं हो रही है, उनकी शादी जल्द हो जाएगी और दांपत्य जीवन में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे।
वृश्चिक राशि:-
वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल ग्रह हैं इसलिए वृश्चिक राशि वाले हर रोज शाम के समय *चमेली के तेल* का दीपक जलाएं। ऐसा करने से विवाह के शीघ्र योग बनने लग जाते हैं।
धनु राशि:-
धनु राशि के स्वामी बृहस्पति ग्रह हैं इसलिए धनु राशि वाले हर रोज *मंगला गौरी स्तोत्र* का पाठ करें। ऐसा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होगी और शादी विवाह में आ रही परेशानियों से मुक्ति मिलेगी।
मकर राशि:-
मकर राशि के स्वामी शनि ग्रह हैं इसलिए मकर राशि वाले किसी शिवालय में जाकर *देवी मंगला गौरी* को *लाल चुनरी* अर्पित करें। ऐसा करने से जीवन में शुभता आएगी और शीघ्र विवाह के योग बनने लग जाते हैं।
कुंभ राशि:-
कुंभ राशि के स्वामी शनि ग्रह हैं इसलिए कुंभ राशि वाले *पान के पत्ते में सिंदूर* लगाकर माता *मंगला गौरी *को अर्पित करें। ऐसा करने से माता की आप पर विशेष कृपा होगी और शादी में आ रही बाधा दूर होंगी।
मीन राशि:-
मीन राशि के स्वामी गुरु ग्रह हैं इसलिए मीन राशि वाले देवी माता के मंदिर में *माता के चरणों में सिंदूर* अर्पित करें। ऐसा करने से समस्याओं से छुटकारा मिलेगा।
किसी भी समस्या के समाधान के लिए सम्पर्क करें व्हाट्सऐप नंबर 9333112719 पर। हमारे प्रसिद्ध ज्योतिष गुरु के द्वारा सटीक मार्गदर्शन देंगे। धन्यवाद 🙏
Saturday, 26 August 2023
Merucary,पारा, वास्तु, शास्त्र में पारद शिवलिंग के महत्व
USES OF MERCURY (PARAD) BEAD IN REMOVING VAASTU DOSHAS
Jyotishguru mk Poddar
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INTRODUCTION:
Parad (Mercury) as per ancient text is considered sperm of Lord Shiva. At a room temperature the mercury is liquid, but if treated as per Parad Samhita it can solidify and becomes a boon to the mankind. Very few people in the whole world knows the correct way to to do full 8 treatments which makes the pars a "paras Mani". We are specialised into this. Ancient Vedas has considered Parad as the most pure and auspicious metal which not only has religious importance but medical importance too. Parad is also very useful in controlling various diseases like High Blood Pressure, Asthma and increase the Sex Power. Parad has special significance in Ayurveda too. Parad benefits have been proved beneficial from Astrological as well as Scientific point of view also. Parad Gutika if placed correctly in the house gives the inmates extreme protection from evil souls, black magic, occult and negative forces. It has a tremendous medicinal value and and keeps the Chakras fine tuned.
USES OF MERCURY/PARAD BEAD: (SIDDH GUTIKA)
Following the the few great uses of purified Parad beads.
1. AWAKENING OF KUNDALNI SHAKTI
By keeping solid mercury upon the top of the head, the Kundalini-Shakti will gradually awaken in course of time and the siddhi will be obtained.
2. INCREASE IN PURE WILL POWER
By using solid Mercury, will-power can be increased to a great extent.
3. CURE OF ALL DISEASES
• 3a. It can cure all kinds of diseases. It makes the physical body powerful, agile and lustrous. Solid Mercury ball should be dipped 4 times only (not more) in 200 ml of raw milk and then it should be taken before the night sleep. In order to get rid of all diseases, the aforesaid milk should be continuously taken for a minimum of 41 days and maximum 3 months without any break.
• 3b. Drinking water of Siddh Gutika helps in overcoming depression, tension and worries. For this keep siddh gutika for 5 minutes in water and than drink it.
• 3c. If worn on right hand of man and left hand of women or worn on chest , it keeps evils away, controls high blood pressure and protects from untimely death.
4. SUCCESS IN COURT CASES
Keeping the Siddh gutika with you during hearing of court cases gives favourable decisions.
5. INCREASES MEMORY POWER
Siddh gutika when worn by students increases their memory and grasping power.
6. NIGHT DREAMS & FISTULA
The Mercury ball should be tied on the waist in such a way that it is in close contact with the skin . This will cure such diseases. Siddh Gutika can be kept near pillow while sleeping to prevent from nightmares and evil eyes.
7. CURE FROM EVIL SPIRITS
The solid Mercury ball should be threaded and kept like a locket in the neck of the affected person until recovery. It will prevent the attack of evil spirits upon the body.
8. HEART - DISEASES
The Mercury ball should be kept like a locket in the neck so that it touches the heart centre.
9. BODY - PAIN
In case of any kind of pain on the surface of the body, the mercury ball should be fixed on that portion during night sleep or day time with an adhesive plaster so that the affected body skin touches the ball. The ball should be kept on the body-skin until the pain is completely cured. The mercury ball should be kept in pure Ghee or oil for 24 hours and it should be massaged on any part of the body for the cure of pain. The Ghee or oil must be cool. For digestive problems, constipation , gas in stomach , headache etc the the Mercury ball should be kept at the naval point for 15/20 minutes daily until recovery.
10. EYE - DISEASES
The Mercury ball should be kept on closed eye-lids with the help of cloth bandage for 15 minutes daily at the time of night sleep. The ball should be kept in cold water for 24 hours and then the water should be sprinkled into eye-balls daily in the morning.
11. LONG FOOT WALK
During long foot journey to pilgrimages etc. The ball should be tied on the waist in close contact with skin . This would prevent tiredness and fatigue.
12. MINERAL DISCOVERY
In order to know the type of mineral (like gold, silver, copper, iron , etc) mixed in any kind of fruit, flower, plant, leaves, stone or water the solid Mercury ball should be kept in water or squeezed juice or powdered form of that commodity for one hour and the concerned mineral will slowly change the colour of ball. The ball should be taken out of juice or water or powder after one hour and be dried up in air. You will see that Mercury ball has taken the colour of mineral mixed in that commodity.
13. MATTER TECHNOLOGY
In general the body of each person is constituted of one specific matter like sky, air, fire, water, earth according to their planetary birth-time. The other four types of matter remain as complementary elements in the same body. In order to know this particular element, the Mercury ball should be hung in the neck. When the ball becomes dirty with the perspiration of physical body, it changes its colour like blue, violet, red, white, or green according to the above mentioned five principal matters. This colour will indicate his particular Tattva or matter in the body. This experience can be gained only when body is perspiring during summer season.
PARAD BEAD (SIDDHA GUTIKA)
Eight stage of Purifications done as per Parad Sanmhita and removal of Saptakanchuki(100 % medicated and hygienic); the Siddha Parad (Mercury mouth closed with Aghor Vidhya) is formed to make Murthi-Badhha/Agnibadha(sustain the heat) Parad gutika. This Gutika gives 24 Ras and 5 Tatva which removes all diseases in the body
Size: 13mm;
Weight: 13 gms;
The parad bead is capped in silver.
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Wednesday, 19 July 2023
ब्रेकअप के बाद प्रेमी को वापस पाने के कुंडली योग
Jyotishgurumk
ब्रेकअप के बाद अपने प्रेमी के वापस आने के योग -:
जब किसी प्रेम प्रेमिकाओं के बीच में ब्रेकअप हो जाता है तो उस स्थिति में हमें प्रेम प्रेमिका में से किसी एक की भी जन्म कुंडली को देख क पता कर सकते हैं कि उनके प्रेमी उनके जीवन में वापस आने के योग बनते हैं कि नहीं,
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ज्योतिष गुरु Mkpoddar
इसके लिए हमें सबसे पहले जन्म कुंडली के पंचम भाव को देखना होता है। क्योंकि जन्म कुंडली का पंचम भाव हमारे प्रेम को रिप्रजेंट करता है। पता है जब हमारा पंचम भाव में किसी पाप ग्रह का आगमन हो और पंचम भाव का स्वामी किसी बुरे भाव में पाप ग्रहों से संबंध बनाकर पीड़ित हो जाता है। उस स्थिति में हमारे बीच में किसी न किसी बात को लेकर विवाद बढ जाता है और हमारा ब्रेकअप हो जाता है। इस स्थिति में हमें देखना होता है की पंचम भाव का स्वामी व द्वादश भाव के स्वामी के बीच में किसी भी प्रकार का युति संबंध दृष्टि संबंध दशा अंतर्दशा अथवा गोचर में सम्बन्ध बन रहा है तो उस कंडीशन में उस जातक जातिका को 101% उसका खोया हुआ प्रेम वापस मिलता है। अर्थात जिस समय पंचम भाव व द्वादश भाव का आपस में पॉजिटिव संबंध बन जाता है। उसी समय उनका बिछड़ा हुआ प्रेम उनको 100 प्रतिशत वापस मिल पाता है।
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उपाय -:
इस प्रकार अपने पिछड़े प्रेम को प्राप्त करने के लिए अपनी जन्म कुंडली के अकॉर्डिंग द्वादश भाव के स्वामी को पॉजिटिव करने के उपाय करने चाहिए। जैसे वृषभ लग्न पत्रिका के चार्ट में द्वादश भाव में मिथुन राशि आती है उसके स्वामी बुध देव होते हैं अतः उसी स्थिति में हमें बुद्धदेव को प्रसन्न करने के लिए बुधदेव के बीज मंत्र का जाप कर सकते हैं बुधवार का व्रत कर सकते हैं तो निश्चित रूप से हमें हमारे प्रेमी को वापस लाने में सफलता प्राप्त होती है।
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कुंडली में प्रेम संबंध विच्छेद योग
कुंडली में प्रेम संबंध विच्छेद योग
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जन्म कुंडली में प्रेम का शत्रु भाव -:
जन्म कुंडली में पंचम भाव हमारी भावनाओं हमारे रोमांस अर्थात हमारे प्रेम रिलेशनशिप को रिप्रेजेंट करता है या यूं कहें कि हमारे जीवन में प्रेम का उद्गम पंचम भाव से देखा जाता है। जबकि हमें हमारे रिलेशन शिप के बारे में जानना होता है तो हमें पंचम भाव का अध्ययन करना होता है। पंचम भाव से गणना करने पर जन्मकुंडली का टेंन्थ हाउस षष्टम भाव बनता है। तथा षष्टम भाव हमारी शत्रुता का हमारे नेगेटिव एनर्जी का होता है। अतः जब गोचर दशा में दशम भाव का संबंध पंचम भाव से या पंचम भाव के स्वामी के साथ होता है। तो वह समय हमारे प्रेम संबंधों में अलगाववादी स्थिति उत्पन्न करता है। यदि पंचम भाव व दशम भाव के स्वामियो के बीच मित्रता का संबंध होता है तो वह समय थोड़ा बहत डिस्टेंस होकर या मन मुटाव हो कर शांत हो जाता है। किंतु पंचम भाव व दशम भाव के स्वामी आपस में एक दूसरे के शत्रु होते हैं तो उस स्थिति में जब इनका संबंध गोचर में बनता है तो वो रिलेशनशिप में बहुत अधिक दूरियां और नफरत पैदा कर देता है। अतः जब यह गोचर बन रहा हो तो उस समय हमें दशम भाव के स्वामी को डीएक्टिव व पंचम भाव के स्वामी को एक्टिव करने की आवश्यकता होती है। जिससे हम हमारे रिलेशनशिप को बैटर बनाकर रख सकते हैं।
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Monday, 23 January 2023
संतान सुख की प्राप्ति किस ग्रह के कारण होते हैं?
संतान सुख में कौन से ग्रह बाधक बनते हैं?
नीचे पढ़ें समाधान @
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एक कुशल ज्योतिषी व्यक्ति के जन्मांग से ज्योतिष के द्वारा उसके भूत, भविष्य, प्रकृति और चरित्र को जान लेता है। जन्मांग व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का दर्पण होता है। कुंडली के बाहर भाव जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से संबंधित रहते हैं लेकिन मैं यहां केवल पंचम भाव से संबंधित संतान क्षेत्र को ही पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं।
बुद्धि प्रबंधात्मजमंत्र विद्या विनेयगर्भ स्थितिनीति संस्था:।
सुताभिधाने भवने नराणां होरागमज्ञै: परिचिन्तनीयम्।।
जातकाभरणम्
बुद्धि, प्रबंध, संतान, मंत्र (गुप्त विचार), गर्भ की स्थिति, नीति आदि शुभाशुभ विचार पंचम भाव से करना चाहिए। पंचम भाव की राशि एवं पंचमेश, पंचमेश किस राशि एवं स्थान में बैठा है तथा उसके साथ कौन-कौन से ग्रह स्थित हैं। पंचम भाव पर किन-किन ग्रहों की दृष्टि है, पुत्र कारक गुरु, नवम भाव तथा नवमेश की स्थिति, नवम भाव पंचम से पंचम होता है।
अत: यह पोते का स्थान भी कहलाता है। पंचम भाव के स्वामी पर किन-किन भावेशों की दृष्टि है, पंचमेश कारक है या अकारक, सौम्य ग्रह है या दृष्ट ग्रह तथा पंचम भाव से संबंधित दशा, अंतर्दशा और प्रत्यंतदशा आदि।
संतानधिपते: पञ्चषष्ठरि: फस्थिवेखले।
पुत्रोभावो भवेत्तस्य यदि जातो न जीवति।।
पंचमेश से 5/6/10 में यदि केवल पापग्रह हो तो उसको संतान नहीं होती, हो भी तो जीवित नहीं रहती हैं।
मंदस्य वर्गे सुतभाव संस्थे निशाकरस्थेऽपि च वीक्षितेऽमिन्।
दिवाकरेणोशनसा नरस्क पुनर्भवासंभव सूनुलब्धे:।।
पंचम भाव में शनि के वर्ग हों तथा उसमें चंद्रमा बैठा हो और रवि अथवा शुक्र से दृष्ट हो तो उसको पौनर्भ व (विधवा स्त्री से विवाह करके उत्पन्न) पुत्र होता है।
नवांशका: पंचम भाव संस्था यावन्मितै : पापखगै:द्रदृष्टा:।
नश्यंति गर्भ: खलु तत्प्रमाणाश्चे दीक्षितं नो शुभखेचरेंद्रे :।।
पंचम भाव नवमांश पर जितने पापग्रह की दृष्टि हो उतने गर्भ नष्ट होते हैं किन्तु यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो।
भूनंदनों नंदनभावयातो जातं च जातं तनयं निहन्ति।
दृष्टे यदा चित्र शिखण्डिजेन भृगो: सुतेन प्रथमोपन्नम्।।
पंचम भाव में केवल मंगल का योग हो तो संतान बार-बार होकर मर जाती है। यदि गुरु या शुक्र की दृष्टि हो तो केवल एक संतति नष्ट होती है और अन्य संतति जीवित रहती है। बंध्या योग, काक बंध्या योग, विषय कन्या योग, मृतवत्सा योग, संतित बाधा योग एवं गर्भपात योग स्त्रियों की कुंडली में होकर उन्हें संतान सुख से वंचित कर देते हैं। इस प्रकार के कुछ योग निम्रलिखित हैं :
लगन और चंद्र लगन से पंचम एवं नवम स्थान से पापग्रहों के बैठने से तथा उस पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। लगन, पंचम, नवम तथा पुत्रकारक गुरु पर पाप प्रभाव हो लगन से पंचम स्थान में तीन पाप ग्रहों और उन पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। आठवें स्थान में शनि या सूर्य स्वक्षेत्री हो। तीसरे स्थान पर स्वामी तीसरे ही स्थान में पांचवें या बारहवें में हो और पंचम भाव का स्वामी छठे स्थान में चला गया हो।
जिस महिला जातक की कुंडली में लगन में मंगल एवं शनि इकट्ठे बैठे हों। लगन में मकर या कुम्भ राशि हो। मेष या वृश्चिक हो और उसमें चंद्रमा स्थित हो तथा उस पर पापग्रहों की दृष्टि हो।
पांचवें या सातवें स्थान में सूर्य एवं राहू एक साथ हों। पांचवें भाव का स्वामी बारहवें स्थान में व बारहवें स्थान का स्वामी पांचवें भाव में बैठा हो और इनमें से कोई भी पाप ग्रह की पूर्ण दृष्टि में हो।
आठवें स्थान में शुभ ग्रह स्थित हो साथ ही पांचवें तथा ग्यारहवें घर में पापग्रह हों। सप्तम स्थान में मंगल-शनि का योग हो और पांचवें स्थान का स्वामी त्रिक स्थान में बैठा हो।
पंचम स्थान में मेष या वृश्चिक राशि हो और उसमें राहू की उपस्थिति हो या राहू पर मंगल की दृष्टि हो। शनि यदि पंचम भाव में स्थित हो और चंद्रमा की पूर्ण दृष्टि में हो और पंचम भाव का स्वामी राहू के साथ स्थित हो।
मंगल दूसरे भाव में, शनि तीसरे भाव में तथा गुरु नवम या पंचम भाव में हो तो पुत्र संतान का अभाव होता है। यदि गुरु-राहू की युति हो। पंचम भाव का स्वामी कमजोर हो एवं लग्न का स्वामी मंगल के साथ स्थित हो अथवा लगन में राहू हो, गुरु साथ में हो और पांचवें भाव का स्वामी त्रिक स्थान में चला गया हो।
पंचम भाव में मिथुन या कन्या राशि हो और बंधु मंगल के नवमांश में मंगल के साथ ही बैठ गया हो और राहू तथा गुलिक लगन में स्थित हो। आदि-आदि कई योगों का वर्णन ज्योतिष ग्रंथों में मिलता है जो संतति सुख हानि करता है तथा कुंडली मिलान करते समय सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए इन्हें विचार में लाना अति आवश्यक होता है।
पति या पत्नी में से किसी एक की कुंडली में संतानहीनता योग होता है तो दाम्पत्य जीवन नीरस हो जाता है। अनुभव में यह भी नहीं पाया गया है कि संतानहीनता योग वाली महिला की शादी संतति योग वाले पुरुष के साथ की जाए अथवा संतानहीन योग वाले पुरुष की शादी संतित योगा वाली महिला के साथ की जाए और इस प्रकार का कुयोग दूर हो जाए लेकिन यह कुयोग नहीं कटता और जीवन भर संतान का अभाव बना रहता है। ऐसी स्थिति में ईश कृपा, देव कृपा या संत कृपा ही इस कुयोग को काट सकती है। निम्र उपाय भी संतान सुख देने में सहायक होते हैं।
षष्ठी देवी का जप पूजन एवं स्त्रोत पाठ आदि का अनुष्ठान पुत्रहीन व्यक्ति को सुयोग पुत्र संतान देने में सहायक होता है।
संतान गोपाल मंत्र- ॐ क्लीं ॐ क्लीं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि ने तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ का जप एवं संतान गोपाल स्रोत का नियमित पाठ भी संतति सुख प्रदान करने वाला होता है।
इसके अतिरिक्त भगवान शिव की आराधना एवं जप, पूजा, अनुष्ठान, कन्या दान, गौदान एवं अन्य यंत्र-तंत्र तथा औषधियां अपनाने से भी संतति सुख प्राप्त किया जा सकता है।
गुरु, माता-पिता, ब्राह्मण, गाय आदि की सेवा, पुण्य, दान, यज्ञ आदि संतानहीनता को मिटाने वाले होते हैं।
नवरात्रि में सर्ववाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:। मनुष्यों मत्प्रसादेन भवि यति न संशय:।।
इस मंत्र से दुर्गा सप्तशती का नवचंडी या शतचंडी पाठ का अनुष्ठान भी संतान सुख देता है।
Tuesday, 13 September 2022
केंद्र भाव, पनफर भाव, एपोकलिक भाव के कुंडली में गुण और अवगुण
भाव और उनका महत्व
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◾ आत्मा बर्बर हो या सभ्य, कमजोर हो या ताकतवर, बुद्धिमान हो या मूर्ख, वह शरीर के ही माध्यम से काम करती है।
◾ राशियो मे ग्रह की स्थति बाह्य जगत की घटना और संयोग की अपेक्षा, आतंरिक शक्ति व गुण के लिए अधिक मत्वपूर्ण है।
◾ राशि और भावो की विशिष्टता आत्मा की उम्र अनुसार परवर्तित होती रहती है।
◾ ग्रह Planets राशि और भाव के अलावा अस्थायी व्यक्तित्व और भौतिक शरीर की अपेक्षा व्यक्तिगत आध्यात्मिक व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते है।
आत्म विकास के तीन स्तर है।
1. तरुण और अनुभव हीन आत्मा = यह बारह भावो मे थोपा गया कार्य करती है। यह स्वयम मे अल्प कार्य कर सकती है।
2. बलवान और अनुभव युक्त आत्मा = यह अपने गुण और संकाय रखती है। जो मुख्य रूप से राशियो की स्थिति से व्यक्त होती है।
3. राशियो के अलावा ग्रह मानव के सर्वोत्तम विकास का प्रतिनिधित्व करते है।
➤ राशि अनुरूप भाव भी त्रियुग्म और चतुयुग्म होते है।
त्रियुग्म राशि स्वभाव के नाम और भाव त्रियुग्म के नाम अलग अलग है।
चर (मेष, कर्क, तुला, मकर) केंद्र 1, 4, 7, 10 Angular
स्थिर (वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ) फणफर 2, 5, 8, 11 Succedent
द्विस्भाव (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) आपोक्लिम 3, 6, 9, 12 Cadent
चतुयुग्म मे राशि और भाव के नाम समान है।
अग्नि
1, 5, 9
पृथ्वी 2, 6, 10
वायु 3 7, 11
जल 4, 8, 12
➤ वृत्त के लम्बवत दो भाग दिन और रात है। लग्न यानि पूर्वी क्षितिज से सप्तम भाव अर्थात पश्चिमी क्षितिज तक अर्थात 1,2,3,4,5,6 तक दिन और सातवे भाव से बाहरवे भाव तक अर्थात 7, 8, 9, 10, 11, 12 तक रात्रि है।
➤ दिन वाला अर्धवृत्त अभिव्यक्ति या प्रस्फुटन, अनावरण या प्रकाश मे लाना, सृजन, सार्वजनिकता, शक्ति मन्वन्तर का द्योतक है। रात्रि वाला अर्द्धवृत्त संवृत्ति या आश्रय, विलम्बता, वापसी, विघटन, प्रलय का द्योतक है।
➤ इसी प्रकार क्षितिजवत उदय और अस्त दो भाग है। कोई भी पिंड चतुर्थ से दशम तक 5 6 7 8 9 10 भाव में हो, तो उदित कहलाता है और कोई भी पिण्ड 10 11 12 1 2 3 भाव मे हो, तो अस्त या अनुदित कहलाता है।
➧ भावो अनुसार उदयास्त और ग्रहो की गति अनुसार उदयास्त, मे भ्रमित नही होना चाहिये क्योकि दोनो अलग अलग घटनाए है।
➤ पूर्वी अर्द्धवृत्त या उदित वाला भाग स्वयम, अहंकारवाद, निश्चयीकरण, दूसरो से अलग, संकायो या शक्तियो के लाभ का द्योत्तक है। पश्चिमी अर्द्धवृत्त या अस्त या अनुदित वाला भाग स्वयं की कमी, पेचीदगी या अविकसितता शेष जगत से मित्रता या शत्रुता, संघ या एकता, परोपकारिता का द्योतक है।
➤ लम्बवत और क्षितिजवत दोनो चार वृत्त खण्ड बनाते है। इनमे लग्न की नोक (दन्ताग्र) सूर्योदय बिन्दु है, दशम भाव का नोक दोपहर है, सप्तम भाव का नोक सूर्यास्त बिन्दु है, चतुर्थ भाव की नोक (कस्प) मध्यरात्रि है।
➤ ये चार बिन्दु सूर्य से सम्बंधित है लेकिन अन्य ग्रहो पर भी यही सिद्धान्त लागू होता है। जब ग्रह उदित हो या उदय हो रहा हो, तब वह आविर्भाव (अभिव्यक्ति) मे अलग स्वयम बाहर आता है। जब ग्रह पराकाष्ठा की स्थिति मे हो अर्थात दशम मे हो, तब वह अभिव्यक्ति का मध्य अवस्था मे होता है। जब वह अस्त हो रहा हो, तब उसका अलगाव कम होता है और वह संयोजन के शुरुआत मे होता है। जब ग्रह निम्न मध्यान्ह (मध्यरात्रि) अर्थात चतुर्थ पर होता है, तब अभिव्यक्ति से पूरा बाहर होता है।
➤ वृत्त का चौगुना विभाजन अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल के चार त्रियुग्म देता है। जब समभुज त्रिकोण वृत्त के अंदर चिन्हित किया जाय तब चर या राजसिक, स्थिर या तामसिक, द्विस्वभाव या राजसिक राशियो का चतुयुग्म परिणाम होता है।
भावो के प्रभाव
केन्द्र या कोण = 1, 4, 7, 10 जन्मांग मे सबसे पहले महत्व पूर्ण है। केन्द्र भावो का प्रभाव चर राशियो के सामान राजसिक गुणो वाले है। प्रकट और ठोस करने से सम्बंधित है और खुले मे बाहर लाते है। अव्यक्त व्यक्तित्व की सभी वस्तुओ या बातो का अनावरण और अभिव्यक्त करते है। इन भावो से सम्बंधित ग्रह और राशि द्वारा व्यक्त सभी तथ्यो का अनावरण और प्रकटीकरण करते है।
प्रथम भाव : इसे लग्न भी कहते है। अपने भाव मे केवल व्यक्तिगत है और इसकी शक्ति की अभिव्यक्ति आध्यात्म शक्ति पर निर्भर करती है। यहा आत्मा या तो प्रतिबंधित या अभिवर्धित अर्थ मे प्रबल है।
दशम भाव : दशम भाव के प्रभाव प्रथम भाव जैसे ही होते है। लेकिन आत्म या स्वयं की प्रतिभा के लिये व्यापक क्षेत्र प्रदान किया जाता है।
सप्तम भाव : दूसरे अर्थ मे लिया गया गैर आत्म के अनुभव से सम्बंधित है। मित्र, सहभागी, भागीदार आदि या तो प्रेम या नफरत, या सहायता या होड़ सभी जिनके हित जातक से मिश्रित हो, सातवे भाव से सम्बन्धित है।
चतुर्थ भाव : चौथा भाव न तो व्यक्तिगत और न ही निजी अर्थ मे है। यहा अलगाव या तो नष्ट या निष्प्रदीप हो जाता है।
फणफर = 2, 5, 8, 11 भाव फणफर कहलाते है। ये इच्छा, भावना, भावुकता और तामसिक गुणो से सम्बंधित है। ये उतने खुले और कार्रवाही से भरे नही है जितने केन्द्र भाव है। फणफर भावो का प्रभाव स्थिर राशियों के सामान है। द्वितीय और पंचम भाव अधिक अनुदार और इनके प्रभाव आठवे और ग्यारहवे की अपेक्षा कम खुले है। आठवा और ग्यारहवा भाव कार्रवाही मे इच्छा को अधिक बाहरी व्यक्त करते है।
आपोक्लिम = 3, 6, 9, 12 भाव आपोक्लिम कहलाते है। ये मानसिक है और विचार द्वारा कार्रवाही और इच्छा के पथ प्रदर्शन व निर्देशन को व्यक्त करते है। आपोक्लिम भावो का प्रभाव द्विस्वभाव राशियो के समान है।
तृतीय और नवम भाव पूर्णतया बौद्धिक और धनात्मक होता है। ये कई और लाभ देते है। यदाकदा एक ही समय पर दो या दो से अधिक गतिविधिया होती है।
छठा और बारहवा भाव श्रमिको और व्यवसायियो से सम्बंधित है। ये भाव अधिक शांत आरक्षित, धीमी गति, अल्प महत्वाकांक्षी और स्वतंत्र है। इनमे उत्पन्न घटना या तो व्यक्तिगत या निजी या अधितर रहस्यमय और गोपनीयता से घिरी होती है।
ग्रहो और राशियो का भावो से सम्बन्ध
भाव, भौतिक शरीर के जीवन की सघन अभिव्यक्ति करते है। समान ग्रह और राशि इनके महत्व मे या तो वृद्धि या न्यूनता कर सकते है। कोई भी राशि भावो के नोक पर हो सकती है। यहा केवल चतुयुग्म राशियों की विविधता का वर्णन है।
केन्द्र 1,4,7,10
पनफर 2,5,8,11
आपोक्लिम 3,6,9,12
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◾ चर रशिया केन्द्र मे हो, तो बाहरी दुनिया मे होने वाली घटनाऐ स्वयम से प्रेरित या आमंत्रित होते है।
◾स्थिर रशिया फणफर स्थान मे इच्छा और कार्रवाही की गति से सम्बंधित होती है।
◾द्विस्वभाव राशियो का आपोक्लिम मे कार्रवाही की अपेक्षा विचारो पर अधिक असर है।
◾जन्म के समय जो ग्रह और रशिया आपोक्लिम भाव मे होती है वे प्रारम्भिक जीवन मे कम या ज्यादा सुप्तावस्था मे रहती है और कुण्डली की दिशात्मक गति से केन्द्र / कोण की ओर प्रगति मे कार्रवाही मे परिवर्तित हो जाते है।
Wednesday, 7 September 2022
रुद्राभिषेक क्यों करें इससे क्या लाभ मिलेगा
रुद्राभिषेक क्यों करें
क्यों किया जाता है रुद्राभिषेक?
रुद्राभिषेक मुख्य रूप से मनुष्य अपने सभी दुखों से मुक्ति पाने के लिए करते हैं। रूद्र अवतार शिव का विधि पूर्वक अभिषेक करने से मनुष्यों को उसके सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। शास्त्रों में लिखा है “रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र:” यानि कि शिव सभी दुखों को हरकर उनका नाश कर देते हैं। ऐसी मान्यता है कि कुंडली में मौजूद महापातक या अशुभ दोष भी शिव जी का रुद्राभिषेक करने से दूर हो जाते हैं। रुद्राभिषेक कर शिव जी के द्वारा शुभ आशीर्वाद तथा मनवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। इसके द्वारा व्यक्ति कम समय में ही अपने सभी मनोकामनाओं की पूर्ती कर सकता है।
“सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:।
रुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दन:।
यो रुद्र: स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशन:।
ब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत्।।”
इसका अर्थ है कि सभी देवताओं में रूद्र समाहित हैं और सभी देवता रूद्र का ही अवतार है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश सभी रूद्र के ही अंश हैं। इसलिए रुद्राभिषेक के द्वारा ऐसा भी माना जाता है की सभी देवताओं की पूजा अर्चना एक साथ हो जाती है। हिन्दू धार्मिक मान्यतों के अनुसार मात्र रूद्र अवतार शिव का अभिषेक करके व्यक्ति सभी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है। केवल रुद्राभिषेक के द्वारा शिव जी के साथ-साथ अन्य देवगणों की पूजा भी सिद्ध हो जाती है। रुद्राभिषेक के दौरान मनुष्य अपनी विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए भिन्न प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग करते हैं।
रुद्राभिषेक के लाभ
शिव जी का रुद्राभिषेक यदि जल से किया जाए तो इससे धन प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है।
घर या प्रॉपर्टी से जुड़े लाभ प्राप्त करने के लिए शिव जी का दही से रुद्राभिषेक करना फलदायी साबित हो सकता है।
आर्थिक लाभ प्राप्त करने या बैंक बैलेंस बढ़ाने के लिए शहद और घी से रुद्राभिषेक करना फलदायी साबित हो सकता है।
यदि व्यक्ति किसी तीर्थस्थल से प्राप्त पवित्र जल से शिव जी का रुद्राभिषेक करे तो इससे मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यदि आप किसी रोग से निजात पाना चाहते हैं तो इसके लिए शिव जी का कुशोदक से अभिषेक करना आपके लिए लाभकारी रहेगा।
गाय के दूध से शिव जी का अभिषेक कर पुत्र की प्राप्ति की जा सकती है।
अपने वंश का विस्तार करने के लिए घी से शिव जी का रुद्राभिषेक किया जाना बेहद लाभकारी साबित हो सकता है।
शिव जी का अभिषेक यदि सरसों के तेल से किया जाए तो इससे शत्रुओं से मुक्ति मिलती है।
टाइफाइड या तपेदिक के रोग से पीड़ित होने पर शिव जी का शहद से अभिषेक करना आपके लिए फलदायी साबित हो सकता है।
छात्र यदि दूध में शक्कर मिलाकर शिव जी का अभिषेक करें तो इससे उनकी बुद्धि में वृद्धि होती है और परीक्षा में अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।
धन प्राप्ति या कर्जे से मुक्ति पाने के लिए गन्ने के रस से शिवजी का अभिषेक करने से विशेष लाभ की प्राप्ति होती है।
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रुद्राभिषेक से जुड़े नियम
रुद्राभिषेक के लिए सबसे उत्तम यही होता है कि आप किसी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का अभिषेक करें।
शिव जी का वो मंदिर जो किसी नदी के तट पर स्थित हो या फिर किसी पर्वत के किनारे हो, वहां स्थित शिवलिंग का रुद्राभिषेक करना ख़ासा फलदायी साबित हो सकता है।
किसी मंदिर के गर्भघर में स्थित शिवलिंग का अभिषेक करना भी फलदायी साबित हो सकता है।
यदि आपके घर में ही शिवलिंग स्थापित है तो शिव जी का रुद्राभिषेक आप घर पर भी कर सकते हैं।
रुद्राभिषेक की सम्पूर्ण विधि
जब कोई व्यक्ति किसी विशेष परिस्थिति या समस्या से ग्रसित होता है तो ऐसी स्थिति में शिव जी का रुद्राभिषेक कर उन समस्याओं से निजात पाया जा सकता है। हिन्दू धर्म में शिव की अाराधना की इस विधि को बेहद कारगर और फलदायी माना गया है। ऐसी मान्यता है की रुद्राभिषेक के द्वारा व्यक्ति अपने पिछले जन्म के पापों से भी मुक्ति पा सकता है। व्यक्ति जिस मनोकामना के लिए रुद्राभिषेक करते हैं उससे संबंधित द्रव्यों से ही शिव जी का अभिषेक किया जाना चाहिए।
रुद्राभिषेक की सही पूजा विधि
रुद्राभिषेक की विधि शुरू करने से पहले गणेश जी कि श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना की जानी चाहिए। इस दौरान रुद्राभिषेक करने की संकल्प ली जाती है और फिर आगे की विधि शुरू की जाती है। इसके साथ ही भगवान् शिव, पार्वती सहित सभी देवता और नौ ग्रहों का मनन कर रुद्राभिषेक का उद्देश्य बताया जाता है। ये पूजा विधि संपन्न होने के बाद ही रुद्राभिषेक की प्रक्रिया शुरू की जाती है। अब शिवलिंग को उत्तर दिशा में स्थापित किया जाता है, यदि शिवलिंग पहले ही उत्तर दिशा में स्थापित है तो अच्छी बात है। घर पर यदि इस क्रिया को संपन्न कर रहे हैं तो इसके लिए आप मिट्टी से शिवलिंग बनाकर उसका अभिषेक कर सकते हैं। रुद्राभिषेक करने के लिए स्वयं पूर्व दिशा की तरफ मुख करके बैठे और गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करते हुए इस विधि की शुरुआत करें। सबसे पहले शिवलिंग को गंगाजल से स्नान करवाने के बाद रुद्राभिषेक में इस्तेमाल की जाने वाली सभी चीजों को अर्पित करें। अंत में शिवजी को प्रसाद चढ़ाएं और उनकी आरती करें। इस क्रिया के दौरान अर्पित किया जाने वाला जल या अन्य द्रव्यों को इस क्रिया के दौरान उपस्थित सभी जनों पर छिड़के और उन्हें प्रसाद स्वरूप पीने दें। इस क्रिया के दौरान विशेष रूप से “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप जरूर करें। रुद्राभिषेक खासतौर से किसी विद्वान् पंडित से करवाना अत्यंत सिद्ध माना जाता है। हालाँकि यदि आप स्वयं भी रुद्राष्टाध्यायी का पाठ कर इस विधि को पूर्ण कर सकते हैं।
रुद्राभिषेक में प्रयोग की जाने वाली सामग्री
इस विधि को प्रारंभ करने से पहले उपयुक्त सभी सामग्रियों को एकत्रित कर लेनी चाहिए। इसके लिए मुख्य तौर पर दीया, घी, तेल, बाती, फूल, सिन्दूर, चंदन का लेप, धूप, कपूर, अगरबत्ती, सफ़ेद फूल, बेल पत्र, दूध, गंगा जल और जिस मनोकामना के लिए रुद्राभिषेक करने जा रहे हैं उससे संबंधित द्रव्य, गुलाब जल आदि एकत्रित कर लें।
इसके अलावा यदि शिवलिंग ना मिले तो आप अपने हाथ के अंगूठे को भी शिवलिंग मानकर उसका रुद्राभिषेक कर सकते हैं।
रुद्राभिषेक यदि जल से कर रहे हैं तो उसके लिए तांबे के बर्तन का ही प्रयोग करें।
रुद्राभिषेक के दौरान रुद्राष्टाध्यायी के मंत्रों का जाप करना फलदायी साबित होता है।
रुद्राभिषेक के दौरान इस मंत्र करें जाप
शिव जी का रुद्राभिषेक करते समय मुख्य रूप से “रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र:“ मंत्र का जाप करना विशेष फलदायी माना जाता है। इस मंत्र का अर्थ है कि रूद्र अवतार शिव हमारे दुखों को जल्द हर कर उसे समाप्त कर देते हैं। इस पवित्र क्रिया के दौरान निम्नलिखित श्लोकों का जाप करना उत्तम माना जाता है।
ॐ नम: शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च ॥
ईशानः सर्वविद्यानामीश्व रः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपति ब्रह्मा शिवो
मे अस्तु सदाशिवोय् ॥
तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
अघोरेभ्योथघोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्व सर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररुपेभ्यः
॥
वामदेवाय नमो ज्येष्ठारय नमः श्रेष्ठारय नमो
रुद्राय नमः कालाय नम: कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमः
बलाय नमो बलप्रमथनाथाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥
सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः ।
भवे भवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥
नम: सायं नम: प्रातर्नमो रात्र्या नमो दिवा ।
भवाय च शर्वाय चाभाभ्यामकरं नम: ॥
यस्य नि:श्र्वसितं वेदा यो वेदेभ्यो खिलं जगत् ।
निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थ महेश्वरम् ॥
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिबर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मा
मृतात् ॥
सर्वो वै रुद्रास्तस्मै रुद्राय नमो अस्तु । पुरुषो वै रुद्र: सन्महो नमो नम: ॥
विश्वा भूतं भुवनं चित्रं बहुधा जातं जायामानं च यत् । सर्वो ह्येष रुद्रस्तस्मै रुद्राय
नमो अस्तु ॥
इस प्रकार से आप भी भगवान् शिव का रुद्राभिषेक कर अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकते हैं। केवल आपको इस बात का ध्यान रखना है कि जिस मनोकामना के लिए आप रुद्राभिषेक करने जा रहे हैं उसी के अनुसार अभिषेक के लिए द्रव्य का चुनाव करें।
हम आशा करते हैं की रुद्राभिषेक पर आधारित हमारा ये लेख आपके लिए उपयोगी साबित होगा। हम आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं !
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Tuesday, 9 August 2022
रक्षाबंधन 2022 शुभ मुहूर्त कब से है
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आप सभी धर्म प्रेमियों को सादर प्रणाम। रक्षाबंधन के पर्व को लेकर किसी प्रकार का संशय ना रखें हम पूर्व लेख में भी आपको अवगत करा चुके हैं रक्षाबंधन पर्व 11 अगस्त 2022 दिन गुरुवार को ही मनाया जाएगा। क्योंकि रक्षाबंधन पर्व श्रवण नक्षत्र एवं पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। कुछ लोग आप सभी जातकों को भ्रमित करने का पूर्ण प्रयास कर रहे हैं कि रक्षाबंधन पर्व 12 अगस्त को मनाया जाएगा तो मैं आपको पुनः एक बार अवगत कराती हूं 12 अगस्त को पूर्णिमा क्षय है क्योंकि किसी भी पर्व को मनाने के लिए उदया तिथि पर तीन मुहूर्त का होना अति आवश्यक है कई विद्वान आपको यह बोल कर भ्रमित करेंगे कि सूर्योदय से पहले के दो मुहूर्त भी जोड़कर गिना जाएगा परंतु आप स्वयं विचार करें उदया का अर्थ उदय होने से है। यहां यह स्पष्ट होता है सूर्य उदय होने के बाद तीन मुहूर्त होना आवश्यक है परंतु 12 अगस्त को 1:30 मुहूर्त भी पूर्ण नहीं हो रहा है एवं प्रतिपदा तिथि को रक्षाबंधन, उपाकर्म नहीं मनाया जाता। इसके अतिरिक्त श्रवण नक्षत्र भी 12 अगस्त को प्रातः 4:08 पर ही समाप्त हो जाएगा। यहां पर विद्वान जनों को 12 अगस्त रक्षाबंधन एवं उपाकर्म मनाए जाने का तथ्य भी मिथ्या है। तथ्यों को ना जान कर कई विद्वानों द्वारा आपको भद्रा का भय दिखाकर 12 अगस्त को रक्षाबंधन मनाने हेतु बाध्य किया जाएगा। आप सभी को श्लोको के माध्यम से आपको भद्रा की स्थिति को स्पष्ट कराने का प्रयास करूंगा।
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*पीयूष धारा के अनुसार*
*स्वर्गे भद्रा शुभं कुर्यात पाताले च धनागम।*
*मृत्युलोक स्थिता भद्रा सर्व कार्य विनाशनी ।।*
अर्थात भद्रा स्वर्ग लोक में शुभ फल देती हैं पाताल लोक में धन लाभ होता है एवं पृथ्वी लोक पर विनाशकारी कहीं गई है।
*मुहूर्त मार्तण्ड में भी कहा गया है* *“ भद्रा* *सदात्याज्या स्वर्गपातालगा शुभा*”।
अतः यह स्पष्ट है कि मेष, वृष,मिथुन, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु या मकर राशि के चन्द्रमा में भद्रा पड़ रही है तो वह शुभ फल प्रदान करने वाली होती है।।
आप कुछ इस प्रकार भी समझ सकते व्यवहारतः जब कोई वस्तु हमारे पैरों के नीचे हो तो उसका प्रभाव या ऊर्जा निष्क्रिय हो जाता है इसी प्रकार भद्रा भी (हमारे पैरों के नीचे) पाताल लोक में होने से इसका दुष्प्रभाव पृथ्वी लोक पर नहीं पड़ेगा।
*इसके अतिरिक्त रक्षाबंधन पर्व पर गुरुवार पड़ रहा है गुरुवार को सबसे श्रेष्ठ वारों में माना गया है क्योंकि गुरु की दिशा ईशान और ईशान में देवताओं का वास होता है। तथा गुरुवार की भद्रा को पुण्यवती कहा गया है*।
अतः भद्रा से भयभीत ना होकर राहुकाल एवं भद्रा के मुख का समय छोड़कर पूर्णिमा तिथि एवं श्रवण नक्षत्र में रक्षाबंधन एवं उपाकर्म किया जा सकता है।
*राखी का शुभ मुहूर्त*-
11 अगस्त 2022 श्रवण नक्षत्र प्रारंभ प्रातः 6: 53 मिनट से 12 अगस्त 2022 प्रातः 4:08 तक। पूर्णिमा तिथि प्रारंभ 11 अगस्त 2022 प्रातः 10:39 से 12 अगस्त प्रातः 7:06 तक।
रक्षाबंधन हेतु सर्वश्रेष्ठ समय रहेगा *अभिजीत मुहूर्त*
अभिजीत मुहूर्त को समझाने का प्रयास करती हूं।
अभिजीत का सामान्य अर्थ होता है विजय एवं मुहूर्त का अर्थ समय से है। असंख्य दोषों को नष्ट करने का श्रेष्ठ समय। जिसकी स्वामी स्वयं भगवान विष्णु है।
*अभिजीत मुहूर्त रहेगा*
प्रातः 11:59 से दोपहर 12:52 तक।
*राहुकाल*
राहु काल में रक्षाबंधन, उपाकर्म संस्कार ना करें। राहुकाल का समय रहेगा दोपहर 2:05 मिनट से 3 मिनट से 3:45 तक।
भद्रा का मुख काल प्रारंभ होगा सायं 5:51 से मुख काल में रक्षाबंधन उपाकर्म निषेध।
इसके अतिरिक्त जिन जातकों को भद्रा का भय हो वह रात्रि 8:53 से रात्रि 11:00 बजे तक रक्षाबंधन मना सकते हैं। रात्रि 8:52 पर भद्रा समाप्त हो जाएंगे।
*यहां पर एक प्रश्न और आएगा कि रात्रि में राखी नहीं बांधी जाती तो इसका उत्तर में पूर्व में ही देते चलूं निशीथ काल को छोड़कर रक्षाबंधन किया जा सकता है*।
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*रक्षा मंत्र व दिशा*।
रक्षा धागा बांधते समय ध्यान रखें भाई को पूर्व दिशा की ओर बिठाएं। बहन का मुंख पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए। इसके बाद भाई के माथे पर तिलक लगाकर दाहिने हाथ पर रक्षा सूत्र बांधे व इस मंत्र का पाठ करें -:
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल।।
आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं🙏
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Wednesday, 27 July 2022
जन्मकुंडली का कौनसा भाव मजबूत होना जरूरी है
जन्म कुंडली का कौनसा घर(भाव) सबसे मजबूत होना चाहिए, यदि वह कमजोर है तो मजबूत कैसे किया जा सकता हैं।?
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प्रश्न के दो भाग हैं
:१-जन्म पत्रिका में कौन सा भाव सबसे मजबूत होना चाहिए ?
२-यदि वह कमजोर है तो ऐसे भाव को कैसे मजबूत किया जा सकता है?
पहले प्रश्न पर मेरा सुझाव यह है कि सबसे अधिक बली होने की धारणा तर्क संगत नहीं इसके स्थान पर पर्याप्त बली कहना अधिक व्यावहारिक होगा।
★जन्म पत्रिका में लग्न चन्द्रमा और सूर्य ये तीन शरीर,मन और जीवात्मा के प्रतिनिधि होते हैं।
◆क्रम की दृष्टि से लग्न भाव शरीर का प्रतिनिधि होता है ।इसलिए सबसे पहले लग्न भाव ही सबसे अधिक नहीं तो पर्याप्त बली होना चाहिए। क्योंकि यह नींव है जिसके आधार पर जीवन टिका होता है। लग्न से ही ग्रहों की शुभाशुभ प्रकृति तय होती है।
◆दूसरे क्रम में मन का कारक चन्द्रमा है।कहा गया है,मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।। यदि लग्न कमजोर है तो चन्द्रमा पर्याप्त बली होना चाहिए।ऐसी स्थिति में शरीर दुर्बल होने पर भी मन की दृढ़ता के बल पर व्यक्ति जीवन में बहुत कुछ उपलब्ध कर लेता है।
★तीसरे क्रम में आत्मा का कारक सूर्य है।सच तो यह है कि आत्म बल के आगे शरीर और मन की कमजोरी भी उन्नति में आड़े नहीं आ सकती है।
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इस प्रकार तीनो का अपना अपना महत्व है।इसलिए मेरा विचार और अनुभव यही है कि तीनों को पर्याप्त बली होना चाहिए। फिर भी यदि जन्म लग्न, चन्द्र और सूर्य- इन तीनों में से एक भी बली है तो जातक उन्नति कर सकता है।
◆पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार पुरुष की पत्रिका में सूर्य का बली होना आवश्यक जब कि स्त्री की पत्रिका में चन्द्र का बली होना आवश्यक माना गया है।
★प्रश्न का दूसरा भाग यह है कि यदि अपेक्षित भाव कमजोर है तो कैसे मजबूत किया जा सकता है?
★जिस प्रकार दीपक पहले से रखी वस्तु को केवल दिखाता है वैसे ही ग्रह भी पहले के कर्मों के फल को केवल दिखाते हैं।इसलिए ज्योतिष का आधार पुनर्जन्म और कर्मफ़ल का गीता व शास्त्रों में वर्णित कर्मफल सिद्धांत है।
इसलिए यदि—
★1 शरीर भाव को मजबूत करना है तो शरीर की प्रकृति जानना होगी जो लग्न भाव पर वात पित्त कफ त्रिदोष में से किसका प्रभाव अधिक है- इसे देख कर ज्ञात की जा सकती है।
प्रकृति ज्ञात हो जाने पर उसी प्रकृति अनुसार आहार विहार दिनचर्या ,ऋतुचर्या को नियमित करना होगा।
★ व्यक्ति के शरीर की प्रकृति जानने के लिए ज्योतिष बहुत उपयोगी सिद्ध होता है, कैसे ? आइए आप भी जानिए यह सरल है। ज्योतिर्विज्ञान में —
(क) 12 राशियों का अग्नि पृथ्वी वायु जल इन चार तत्व के अनुसार वर्गीकरण है।
(ख) फिर नौ ग्रहों का वात पित्त कफ अनुसार वर्गीकरण है।
(ग) फिर काल पुरुष के अनुसार लग्न में आने वाली राशि के अनुसार शरीर के उस अंग विशेष में व्याधि के प्रति संवेदनाशीलता भी विचारणीय होती है।
•उदाहरण के लिए जैसे कि कर्क लग्न है जो जल तत्त्व प्रधान है तो व्यक्ति को कफ विकार अधिक शीघ्रता से होंगे।
••शनि शीतल वात प्रधान हैऔर लग्न पर इसका भी प्रभाव है तो वातज कफज रोग अधिक संभावित रहेंगे।
जन्मलग्न में जो राशि आ रही है (मेष से सिर, कर्क से छाती,मीन से पैर -इस क्रम से ) वह राशि काल पुरुष के जिस अंग का प्रतिनिधि है, तो व्यक्ति के शरीर का वह अंग अधिक प्रभावित होता है।
◆यह चन्द्रकला नाड़ी का सूत्र है जो मेरे अनुभव के अनुसार शत प्रतिशत सही है।
•जैसे लग्न में धनु राशि है तो धनु कालपुरुष की कमर का प्रतिनिधि होने से व्यक्ति की कमर सम्बन्धी व्याधि के प्रति संवेदनशीलता अधिक होगी । यदि लग्न में कन्या है तो उदर आंतों की व्याधि की संभावना रहेगी पर जैसा ग्रह प्रभाव लग्न पर होगा उसी अनुसार ।
•लग्न यदि अग्नि तत्व के कारक मंगल से प्रभावित तो पित्तज रोग, शस्त्र कष्ट संभावित रहेंगे। इत्यादि।
◆सारांश यह कि लग्न को अर्थात शरीर को बली करना तो उपरोक्त बचाव समझ कर सबसे पहले आयुर्वेदिक प्राकृतिक उपचार करने चाहिए। आहरविहार दिनचर्या इसी व्याधि से बचने के लिए नियमित करना चाहिए
★2 चन्द्र को बली करना है तो उत्साह जनक वातावरण में रहना चाहिए और मन को सदैव प्रसन्न रखने का प्रयास-अभ्यास करना चाहिए।मन को इसतरह से मजबूत बनाने के लिए सबसे सरल , साइडइफेक्ट रहित तरीका यह है कि नित्य 10 से 20 मिनिट प्राणायाम व योगाभ्यास करना चाहिए। इससे मन मजबूत होगा। क्योंकि श्वास से मन का सीधा सम्बन्ध है। ( आपने गौर किया होगा कि क्रोध होने पर साँस बहुत तेज चलती है;मन भारी होने पर व्यक्ति दीर्घ श्वास छोडता है -हाय! हाँ s s ! अरे ! कहते हुए ; शांत चित्त होने पर श्वास बहुत धीमी चलती है। ) इसलिए मन मजबूत होगा तो चन्द्र मजबूत होगा।
★ विशेष ध्यान देने योग्य बात है: मनुष्य केवल शरीर नहीं; मनुष्य केवल मन नहीं। मनुष्य दोनों का जोड़ है- यह 'मनः शरीरी' है psycho somatic है। एक के मजबूत होने से दूसरा भी मजबूत होता है ।
★3 सूर्य को बली करना है तो सूर्योदय समय की लालिमा में खड़े हों। इसके साथ अपने इष्ट देवी-देवता का या गायत्री का या निराकार ब्रह्म का, अपनी अपनी रुचि सामर्थ्य और परम्परा के अनुसार ध्यान करने से आत्म तत्व मजबूत होगा- आत्म तत्व मजबूत हुआ तो जन्मत्रिका का सूर्य मजबूत हुआ समझिए।
इस प्रकार व्यक्ति अपने शरीर ,मन और आत्मतत्व—इन तीनों को मजबूत कर सकता है।
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हो सकता है कि मेरा उत्तर अधिकांश पाठकों को मन माफिक न लगे पर ज्योतिर्विज्ञान से सही मायनों में लाभ लेना है तो यही श्रेष्ठ विधि है अर्थात जिस मार्ग को पूर्वजों ने अपनाया है वही मार्ग श्रेष्ठ है।
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Wednesday, 13 July 2022
संतान योग ग्रह शुभ या अशुभ पंचम भाव से जाने
कौन से ग्रह बाधक बनते है संतान सुख में?
जानें उचित समाधान
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वेदों के अनुसार आत्मा को अजर-अमर कहा गया है। गीता में भी कहा गया है कि, जिस प्रकार मनुष्य फटे हुए जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण कर लेता है। ठीक उसी प्रकार यह जीवात्मा पुराने जीर्ण शरीर को त्यागकर नई देह को धारण कर लेती है। हमारे यहां पुनर्जन्म का सिद्धांत है। हर जीवात्मा अपने पूर्व कर्मों के अनुसार निश्चित मां-बाप के यहां जन्म लेती है और जन्म लेते समय आकाश में ग्रहों और नक्षत्रों की जो स्थिति होती है उस आकाशीय नक्शे के अनुसार व्यक्ति का जीवन निर्धारण होता है। जिसे ज्योतिष शास्त्र जन्मांग या कुंडली का नाम देता है।
एक कुशल ज्योतिषी व्यक्ति के जन्मांग से ज्योतिष के द्वारा उसके भूत, भविष्य, प्रकृति और चरित्र को जान लेता है। जन्मांग व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का दर्पण होता है। कुंडली के बाहर भाव जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से संबंधित रहते हैं लेकिन मैं यहां केवल पंचम भाव से संबंधित संतान क्षेत्र को ही पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं।
बुद्धि, प्रबंध, संतान, मंत्र (गुप्त विचार), गर्भ की स्थिति, नीति आदि शुभाशुभ विचार पंचम भाव से करना चाहिए। पंचम भाव की राशि एवं पंचमेश, पंचमेश किस राशि एवं स्थान में बैठा है तथा उसके साथ कौन-कौन से ग्रह स्थित हैं। पंचम भाव पर किन-किन ग्रहों की दृष्टि है, पुत्र कारक गुरु, नवम भाव तथा नवमेश की स्थिति, नवम भाव पंचम से पंचम होता है।
अत: यह पोते का स्थान भी कहलाता है। पंचम भाव के स्वामी पर किन-किन भावेशों की दृष्टि है, पंचमेश कारक है या अकारक, सौम्य ग्रह है या दृष्ट ग्रह तथा पंचम भाव से संबंधित दशा, अंतर्दशा और प्रत्यंतदशा आदि।
पंचमेश से 5/6/10 में यदि केवल पापग्रह हो तो उसको संतान नहीं होती, हो भी तो जीवित नहीं रहती हैं।
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पंचम भाव में शनि के वर्ग हों तथा उसमें चंद्रमा बैठा हो और रवि अथवा शुक्र से दृष्ट हो तो उसको पौनर्भ व (विधवा स्त्री से विवाह करके उत्पन्न) पुत्र होता है।
पंचम भाव नवमांश पर जितने पापग्रह की दृष्टि हो उतने गर्भ नष्ट होते हैं किन्तु यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो।
पंचम भाव में केवल मंगल का योग हो तो संतान बार-बार होकर मर जाती है। यदि गुरु या शुक्र की दृष्टि हो तो केवल एक संतति नष्ट होती है और अन्य संतति जीवित रहती है। बंध्या योग, काक बंध्या योग, विषय कन्या योग, मृतवत्सा योग, संतित बाधा योग एवं गर्भपात योग स्त्रियों की कुंडली में होकर उन्हें संतान सुख से वंचित कर देते हैं। इस प्रकार के कुछ योग निम्रलिखित हैं :
लगन और चंद्र लगन से पंचम एवं नवम स्थान से पापग्रहों के बैठने से तथा उस पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। लगन, पंचम, नवम तथा पुत्रकारक गुरु पर पाप प्रभाव हो लगन से पंचम स्थान में तीन पाप ग्रहों और उन पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। आठवें स्थान में शनि या सूर्य स्वक्षेत्री हो। तीसरे स्थान पर स्वामी तीसरे ही स्थान में पांचवें या बारहवें में हो और पंचम भाव का स्वामी छठे स्थान में चला गया हो।
जिस महिला जातक की कुंडली में लगन में मंगल एवं शनि इकट्ठे बैठे हों। लगन में मकर या कुम्भ राशि हो। मेष या वृश्चिक हो और उसमें चंद्रमा स्थित हो तथा उस पर पापग्रहों की दृष्टि हो।
पांचवें या सातवें स्थान में सूर्य एवं राहू एक साथ हों। पांचवें भाव का स्वामी बारहवें स्थान में व बारहवें स्थान का स्वामी पांचवें भाव में बैठा हो और इनमें से कोई भी पाप ग्रह की पूर्ण दृष्टि में हो।
आठवें स्थान में शुभ ग्रह स्थित हो साथ ही पांचवें तथा ग्यारहवें घर में पापग्रह हों। सप्तम स्थान में मंगल-शनि का योग हो और पांचवें स्थान का स्वामी त्रिक स्थान में बैठा हो।
पंचम स्थान में मेष या वृश्चिक राशि हो और उसमें राहू की उपस्थिति हो या राहू पर मंगल की दृष्टि हो। शनि यदि पंचम भाव में स्थित हो और चंद्रमा की पूर्ण दृष्टि में हो और पंचम भाव का स्वामी राहू के साथ स्थित हो।
मंगल दूसरे भाव में, शनि तीसरे भाव में तथा गुरु नवम या पंचम भाव में हो तो पुत्र संतान का अभाव होता है। यदि गुरु-राहू की युति हो। पंचम भाव का स्वामी कमजोर हो एवं लग्न का स्वामी मंगल के साथ स्थित हो अथवा लगन में राहू हो, गुरु साथ में हो और पांचवें भाव का स्वामी त्रिक स्थान में चला गया हो।
पंचम भाव में मिथुन या कन्या राशि हो और बंधु मंगल के नवमांश में मंगल के साथ ही बैठ गया हो और राहू तथा गुलिक लगन में स्थित हो। आदि-आदि कई योगों का वर्णन ज्योतिष ग्रंथों में मिलता है जो संतति सुख हानि करता है तथा कुंडली मिलान करते समय सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए इन्हें विचार में लाना अति आवश्यक होता है।
पति या पत्नी में से किसी एक की कुंडली में संतानहीनता योग होता है तो दाम्पत्य जीवन नीरस हो जाता है। अनुभव में यह भी नहीं पाया गया है कि संतानहीनता योग वाली महिला की शादी संतति योग वाले पुरुष के साथ की जाए अथवा संतानहीन योग वाले पुरुष की शादी संतित योगा वाली महिला के साथ की जाए और इस प्रकार का कुयोग दूर हो जाए लेकिन यह कुयोग नहीं कटता और जीवन भर संतान का अभाव बना रहता है। ऐसी स्थिति में ईश कृपा, देव कृपा या संत कृपा ही इस कुयोग को काट सकती है। निम्र उपाय भी संतान सुख देने में सहायक होते हैं।
षष्ठी देवी का जप पूजन एवं स्त्रोत पाठ आदि का अनुष्ठान पुत्रहीन व्यक्ति को सुयोग पुत्र संतान देने में सहायक होता है।
संतान गोपाल मंत्र- ॐ क्लीं ॐ क्लीं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि ने तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ का जप एवं संतान गोपाल स्रोत का नियमित पाठ भी संतति सुख प्रदान करने वाला होता है।
इसके अतिरिक्त भगवान शिव की आराधना एवं जप, पूजा, अनुष्ठान, कन्या दान, गौदान एवं अन्य यंत्र-तंत्र तथा औषधियां अपनाने से भी संतति सुख प्राप्त किया जा सकता है।
गुरु, माता-पिता, ब्राह्मण, गाय आदि की सेवा, पुण्य, दान, यज्ञ आदि संतानहीनता को मिटाने वाले होते हैं।
नवरात्रि में सर्ववाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:। मनुष्यों मत्प्रसादेन भवि यति न संशय:।।
इस मंत्र से दुर्गा सप्तशती का नवचंडी या शतचंडी पाठ का अनुष्ठान भी संतान सुख देता है।
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Wednesday, 15 June 2022
हस्त रेखा के द्वारा जन्म कुण्डली बनाएं आसान टिप्स
हाथ की रेखा देख कर जन्म कुंडली बनाने की विधि
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जानें कैसे....
कभी कभी किसी कारणवश जन्म तारीख और दिन माह वार आदि का पता नही होता है, कितनी ही कोशिशि की जावे लेकिन जन्म तारीख का पता नही चल पाता है, जातक को सिवाय भटकने के और कुछ नही प्राप्त होता है, किसी ज्योतिषी से अगर अपनी जन्म तारीख निकलवायी भी जावे तो वह क्या कहेगा, इसका भी पता नही होता है, इस कारण के निवारण के लिये आपको कहीं और जाने की जरूरत नही है, किसी भी दिन उजाले में बैठकर एक सूक्षम दर्शी सीसा लेकर बैठ जावें, और अपने दोनो हाथों बताये गये नियमों के अनुसार देखना चालू कर दें, साथ में एक पेन या पैंसिल और कागज भी रख लें, तो देखें कि किस प्रकार से अपना हाथ जन्म तारीख को बताता है।
अपनी वर्तमान की आयु का निर्धारण करें
हथेली मे चार उंगली और एक अगूंठा होता है, अंगूठे के नीचे शुक्र पर्वत, फ़िर पहली उंगली तर्जनी उंगली की तरफ़ जाने पर अंगूठे और तर्जनी के बीच की जगह को मंगल पर्वत, तर्जनी के नीचे को गुरु पर्वत और बीच वाली उंगली के नीचे जिसे मध्यमा कहते है, शनि पर्वत, और बीच वाली उंगले के बाद वाली रिंग फ़िंगर या अनामिका के नीचे सूर्य पर्वत, अनामिका के बाद सबसे छोटी उंगली को कनिष्ठा कहते हैं, इसके नीचे बुध पर्वत का स्थान दिया गया है, इन्ही पांच पर्वतों का आयु निर्धारण के लिये मुख्य स्थान माना जाता है, उंगलियों की जड से जो रेखायें ऊपर की ओर जाती है, जो रेखायें खडी होती है, उनके द्वारा ही आयु निर्धारण किया जाता है, गुरु पर्वत से तर्जनी उंगली की जड से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें जो कटी नही हों, बीचवाली उंगली के नीचे से जो शनि पर्वत कहलाता है, से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें, की गिनती करनी है,ध्यान रहे कि कोई रेखा कटी नही होनी चाहिये,शनि पर्वत के नीचे वाली रेखाओं को ढाई से और बृहस्पति पर्वत के नीचे से निकलने वाली रेखाओं को डेढ से, गुणा करें,फ़िर मंगल पर्वत के नीचे से ऊपर की ओर जाने वाली रेखाओं को जोड लें, इनका योगफ़ल ही वर्तमान उम्र होगी।
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अपने जन्म का महिना और सूर्य राशि को पता करने का नियम।
अपने दोनो हाथों की तर्जनी उंगलियों के तीसरे पोर और दूसरे पोर में लम्बवत रेखाओं को २३ से गुणा करने पर जो संख्या आये, उसमें १२ का भाग देने पर जो संख्या शेष बचती है,वही जातक का जन्म का महिना और उसकी राशि होती है, महिना और राशि का पता करने के लिये इस प्रकार का वैदिक नियम अपनाया जा सकता है:-
१-बैशाख-मेष राशि
२.ज्येष्ठ-वृष राशि
३.आषाढ-मिथुन राशि
४.श्रावण-कर्क राशि
५.भाद्रपद-सिंह राशि
६.अश्विन-कन्या राशि
७.कार्तिक-तुला राशि
८.अगहन-वृश्चिक राशि
९.पौष-धनु राशि
१०.माघ-मकर राशि
११.फ़ाल्गुन-कुम्भ राशि
१२.चैत्र-मीन राशि
इस प्रकार से अगर भाग देने के बाद शेष १ बचता है तो बैसाख मास और मेष राशि मानी जाती है,और २ शेष बचने पर ज्येष्ठ मास और वृष राशि मानी जाती है।
हाथ में राशि का स्पष्ट निशान भी पाया जाता है। प्रकृति ने अपने द्वारा संसार के सभी प्राणियों की पहिचान के लिये अलग अलग नियम प्रतिपादित किये है,जिस प्रकार से जानवरों में अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार उम्र की पहिचान की जाती है,उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में दाहिने या बायें हाथ की अनामिका उंगली के नीचे के पोर में सूर्य पर्वत पर राशि का स्पष्ट निशान पाया जाता है। उस राशि के चिन्ह के अनुसार महिने का उपरोक्त तरीके से पता किया जा सकता है।
पक्ष और दिन का तथा रात के बारे में ज्ञान करना।।
वैदिक रीति के अनुसार एक माह के दो पक्ष होते है,किसी भी हिन्दू माह के शुरुआत में कृष्ण पक्ष शुरु होता है,और बीच से शुक्ल पक्ष शुरु होता है,व्यक्ति के जन्म के पक्ष को जानने के लिये दोनों हाथों के अंगूठों के बीच के अंगूठे के विभाजित करने वाली रेखा को देखिये,दाहिने हाथ के अंगूठे के बीच की रेखा को देखने पर अगर वह दो रेखायें एक जौ का निशान बनाती है, तो जन्म शुक्ल पक्ष का जानना चाहिये। और जन्म दिन का माना जाता है, इसी प्रकार अगर दाहिने हाथ में केवल एक ही रेखा हो, और बायें हाथ में अगर जौ का निशान हो तो जन्म शुक्ल पक्ष का और रात का जन्म होता है,अगर दाहिने और बायें दोनो हाथों के अंगूठों में ही जौ का निशान हो तो जन्म कृष्ण पक्ष रात का मानना चाहिये,।
साधारणत: दाहिने हाथ में जौ का निशान शुक्ल पक्ष और बायें हाथ में जौ का निशान कृष्ण पक्ष का जन्म बताता है।
जन्म तारीख की गणना।
मध्यमा उंगली के दूसरे पोर में तथा तीसरे पोर में जितनी भी लम्बी रेखायें हों,उन सबको मिलाकर जोड लें,और उस जोड में ३२ और मिला लें,फ़िर ५ का गुणा कर लें,और गुणनफ़ल में १५ का भाग देने जो संख्या शेष बचे वही जन्म तारीख होती है। दूसरा नियम है कि अंगूठे के नीचे शुक्र क्षेत्र कहा जाता है,इस क्षेत्र में खडी रेखाओं को गुना जाता है,जो रेखायें आडी रेखाओं के द्वारा काटी गयीं हो,उनको नही गिनना चाहिये,इन्हे ६ से गुणा करने पर और १५ से भाग देने पर शेष मिली संख्या ही तिथि का ज्ञान करवाती है,यदि शून्य बचता है तो वह पूर्णमासी का भान करवाती है,१५ की संख्या के बाद की संख्या को कृष्ण पक्ष की तिथि मानी जाती है।
जन्म वार का पता करना।
अनामिका के दूसरे तथा तीसरे पोर में जितनी लम्बी रेखायें हों,उनको ५१७ से जोडकर ५ से गुणा करने के बाद ७ का भाग दिया जाता है,और जो संख्या शेष बचती है वही वार की संख्या होती है। १ से रविवार २ से सोमवार तीन से मंगलवार और ४ से बुधवार इसी प्रकार शनिवार तक गिनते जाते है।
जन्म समय और लगन की गणना।
सूर्य पर्वत पर तथा अनामिका के पहले पोर पर,गुरु पर्वत पर तथा मध्यमा के प्रथम पोर पर जितनी खडी रेखायें होती है,उन्हे गिनकर उस संख्या में ८११ जोडकर १२४ से गुणा करने के बाद ६० से भाग दिया जाता है,भागफ़ल जन्म समय घंटे और मिनट का होता है,योगफ़ल अगर २४ से अधिक का है,तो २४ से फ़िर भाग दिया जाता है। इस तरह घंटे-मि. आदि जन्मादि काल प्राप्त हो जाता है...
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अब इन सभी से सहज और पूर्ण जन्म कुंंडली तैयार करके, जाचक का सटीक फलित भी किया जा सकता है।
Sunday, 12 June 2022
10 भाव से जाने किस क्षेत्र में सफल होंगे
बहुत से लोगों के मन में दुविधा होती है कि उसे
@नौकरी करना चाहिए या कि व्यापार।
@नौकरी में प्राइवेट नौकरी करना चाहिए या सरकारी?
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व्यापार फलीभूत होगा तो कौनसा व्यापार करना चाहिए? इन्हीं प्रश्नों के समाधान के लिए यहां प्रस्तुत है कुछ सामान्य जानकारी।
कुंडली में क्या है नौकरी या व्यापरा का भाव : कहते हैं कि दशभ भाव से पता चलता है कि व्यक्ति क्या करेगा, ग्यारहवें भाव से पता चलता है कि व्यक्ति क्या कमाएगा और दूसरे भाव से पता चलता है कि व्यक्ति कितना बचा पाएगा। कुंडली में दशम भाव से देखा जाता है कि व्यक्ति क्या करेगा।
दशम भाव : दशम भाव के स्वामी को दशमेश या कर्मेश या कार्येश कहते हैं। इस भाव से यह देखा जाता है कि व्यक्ति सरकारी नौकरी करेगा अथवा प्राइवेट, या व्यापार करेगा तो कौन सा, उसे किस क्षेत्र में अधिक सफलता मिलेगी। सप्तम भाव साझेदारी का होता है। इसमें मित्र ग्रह हों तो पार्टनरशिप से लाभ। शत्रु ग्रह हो तो पार्टनरशिप से नुकसान। मित्र ग्रह सूर्य, चंद्र, बुध, गुरु होते हैं। शनि, मंगल, राहु, केतु ये आपस में मित्र होते हैं।
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सूर्य, बुध, गुरु और शनि दशम भाव के कारक ग्रह हैं। दशम भाव में केवल शुभ ग्रह हों तो अमल कीर्ति नामक योग होता है, किंतु उसके अशुभ भावेश न होने तथा अपनी नीच राशि में न होने की स्थिति में ही इस योग का फल मिलेगा। दशमेश के बली होने से जीविका की वृद्धि और निर्बल होने पर हानि होती है। लग्न से द्वितीय और एकादश भाव में बली एवं शुभ ग्रह हो तो जातक व्यापार से अधिक धन कमाता है। धनेश और लाभेश का परस्पर संबंध धनयोग का निर्माण करता है। दशम भाव का कारक यदि उसी भाव में स्थित हो अथवा दशम भाव को देख रहा हो तो जातक को आजीविका का कोई न कोई साधन अवश्य मिल जाता है।
दशम भावस्थ नवग्रह फलः-
सूर्यः- दसवें भाव में स्थित वृश्चिक राशि का सूर्य चिकित्सा अधिकारी बनाता है। मेष, कर्क, सिंह या धनु राशि का सूर्य सेना, पुलिस या आवकारी अधिकारी बनाता है।
चंद्रः- शुभ प्रभाव में बली चंद्र यदि दशमस्थ हो तो धनी कुल की स्त्रियों से लाभ होता है। यदि ऐसा व्यक्ति दैनिक उपयोग में आनेवाली वस्तुओं का व्यापार करे तो लाभप्रद होता है। चंद्र से मंगल या शनि की युति विफलता का सूचक है।
मंगलः- मेष, सिंह, वृश्चिक या धनु राशि का मंगल जातक को प्राइवेट चिकित्सक और सर्जन बनाता है। ऐसे डाक्टरों को मान-सम्मान और धन की प्राप्ति होती है। मंगल का सूर्य से संबंध हो तो व्यक्ति सुनार या लोहार का काम करता है।
बुधः- लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश या दशमेश होकर कन्या या सिंह राशि का बुध गुरु से दृष्ट या युत हो तो व्यक्ति प्रोफेसर या लेक्चरर बनकर धन अर्जित करता है। बुध बैंकर भी बनाता है। बुध शुक्र के साथ या शुक्र की राशि में हो तो जातक फिल्म या विज्ञापन से संबंधित व्यवसाय करता है।
गुरुः- गुरु का संबंध जब नवमेश से हो तो व्यक्ति धार्मिक कार्यों द्वारा धन अर्जित करता है। गुरु मंगल के प्रभाव में हो तो जातक फौजदारी वकील बनता है। बलवान और राजयोगकारक हो तो जातक न्यायाधीश बना देता है।
शुक्रः- जातक सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, फैंसी वस्तुओं आदि का निर्माता/विक्रेता होता है। शुक्र का संबंध द्वितीयेश, पंचमेश या बुध से हो तो गायन-वादन के क्षेत्र में सफलता मिलती है।
शनिः- शनि का संबंध यदि चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से हो तो जातक लोहे, कोयले मिट्टी के तेल आदि के व्यापार से धन कमाता है। बलवान शनि का मंगल से संबंध हो तो जातक इलेक्ट्रीक/इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर होता है। यदि बुध से संबंध हो तो मेकैनिकल इंजीनियर होता है। शनि का राहु से संबंध हो तो व्यक्ति चप्पल, जूते, रेक्सिन बैग, टायर-ट्यूब आदि के व्यापार में सफल होता है।
राहुः- दशम भाव में मिथुन राशि का राहु राजनीति के क्षेत्र में सफलता दिलाता है। ऐसा जातक सेना, पुलिस, रेलवे में या राजनेता के घर नौकरी करता है।
केतुः- धनु या मीन राशि का दशमस्थ केतु व्यापार में सफलता, वैभव, धन और यश का सूचक है। ऊपर वर्णित बिंदुओं के आधार पर अपने अनुकूल आजीविका का निर्णय करें। शुभ/ योगकारक ग्रहों की महादशा में उनसे या जिन ग्रहों से उनका संबंध हो उनसे संबंधित व्यवसाय करने पर अच्छा लाभ होता है। आजीविका हेतु अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मंत्र, यंत्र, रत्न, दान और पूजा अर्चना आदि समय-समय पर करते रहना चाहिए।
1.यदि लग्न सप्तम, दशम भाव का कार्येश हो तब जातक को कारोबार के द्वारा धनार्जन होगा और यदि षष्ठ और दशम का कार्येश हो तो नौकरी से धन अर्जित करेगा।
2.तृतीय भाव का कार्येश हो तो लेखन, छपाई, एजेंसी, कमीशन एजेंट, रिपोर्टर, सेल्समेन और संस्थाओं से धन प्राप्त होगा। मतलब यह कि वह इस क्षेत्र में अपना करियर बनाएगा।
3.अगर द्वितीय और पंचम का कार्येश हो तो जमीन, घर, बगीचे, वाहन और शिक्षा संस्थानों से धन प्राप्त करेगा। इसके अतिरिक्त नाटक, सिनेमा, ढोल, रेस, जुआ, मंत्र, तंत्र और पौरोहित्य कर्म से धन अर्जित करेगा।
4.यदि द्वितीय और सप्तम का कार्येश हो तो विवाह, विवाह मंडल, पार्टनरशिप और कानूनी सलाहकार के कार्य से धन अर्जित करेगा।
5.यदि दशम भाव में एक से अधिक ग्रह हों और उसमें से जो ग्रह सबसे अधिक बलवान होगा जातक उसके अनुसार ही व्यापार करेगा। जैसे दशम भाव में मंगल बलवान हो तो जातक प्रॉपर्टी, निवेश आदि का व्यवसाय करेगा अथवा पुलिस या सेना में जाएगा।
7.यदि दशम भाव में कोई ग्रह न हो तो दशमेश यानी दशम भाव के स्वामी के अनुसार व्यापार तय होगा। यदि दशम भाव में शुक्र हो तो व्यक्ति कॉस्मेटिक्स, सौंदर्य प्रसाधन, ज्वेलरी आदि के कार्यों से लाभ अर्जित करता है। दशम भाव का स्वामी जिन ग्रहों के साथ होता है उनके अनुसार व्यक्ति व्यापार करता है।
8. सूर्य के साथ गुरु हो तो व्यक्ति होटल व्यवसाय, अनाज आदि के कार्य से लाभ कमाता है। एकादश भाव आय स्थान है। इस भाव में मौजूद ग्रहों की स्थिति के अनुसार व्यापार तय किया जाता है।
9.जन्मकुंडली में कोई ग्रह जब लग्नेश, पंचमेश या नवमेश होकर दशम भाव में स्थित हो, या दशमेश होकर किसी भी त्रिकोण (1, 5, 9 भावों) में, या अपने ही स्थान में स्थित हो तो व्यक्ति की आजीविका के पर्याप्त साधन होते हैं। वह व्यवसाय या नौकरी में अच्छी प्रगति करता है। दशमेश या दशम भावस्थ ग्रह का बल और शुभता दोनों उसके शुभफलों में द्विगुणित वृद्धि करते हैं।
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Thursday, 17 February 2022
हस्तरेखा में * निशान होने पर क्या असर होगा
व्यक्ति को बदनामी दिलाता है इस रेखा पर बना निशान
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हस्तरेखा में क्रॉस का निशान भी बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन इस निशान का कुछ पर्वत पर शुभ परिणाम मिलता है तो कुछ पर नकारात्मक। यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्रॉस का चिह्न कहां है। यहां पर हम आपको क्रॉस के निशान और इसके परिणाम के बारे में बताने जा रहे हैं।
-यदि किसी व्यक्ति के गुरु पर्वत पर क्रॉस का निशान है तो यह उसके सुख में बढ़ोतरी करता है। गुरु पर्वत पर क्रॉस का निशान व्यक्ति के जीवनसाथी के शिक्षित एवं धनी कुल से मिलने का इशारा करता है। हस्तरेखा विज्ञान में गुरु पर्वत यानी बृहस्पति पर्वत पर क्रॉस के चिह्न को शुभ माना गया है। बाकी पर्वत पर इसके नकारात्मक परिणाम मिलते हैं।
-यदि क्रॉस का चिह्न शनि पर्वत पर है तो ऐसे व्यक्ति को लड़ाई में चोट लगती है। इस पर्वत पर निशान व्यक्ति को अकाल मृत्यु की ओर ले जाता है।
-सूर्य पर्वत पर क्रॉस का निशान शुभ नहीं माना गया है। यहां क्रॉस का निशान होने से व्यक्ति बदनामी का पात्र बनता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा व्यापार में घाटा बना रहता है।
-बुध पर्वत पर क्रॉस का निशान व्यक्ति को झूठा और धोखेबाज बनाता है। ऐसे लोगों से हमेशा दूर रहना चाहिए।
-केतु पर्वत पर क्रॉस का निशान होना व्यक्ति की शिक्षा में अवरोध को बताता है। बचपन में बीमारी अथवा अन्य किसी कारण से ऐसे व्यक्ति अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते।
-मंगल पर्वत पर क्रॉस का चिह्न होना व्यक्ति को झगड़ालू बनाता है। यह निशान व्यक्ति को जेल तक पहुंचाता है।
(इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं तथा इन्हें अपनाने से अपेक्षित परिणाम मिलेगा। जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)
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त्रिक और त्रिकोण भाव की विशेषता
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उपचय भाव की विशेषता क्या है....
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Thursday, 27 January 2022
शनि की साढ़ेसाती और ढैया में क्या अंतर है
क्या है शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या
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शनि एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक गतिशील रहते हैं। इसीलिए उन्हें मंगदामी भी कहते हैं क्योंकि एक घर में इतने दिनों तक रहने वाले शनि अकेले ग्रह हैं, उनका तीव्र प्रभाव एक राशि पहले से एक राशि बाद तक पड़ता है। यही स्थिति साढ़े साती कहलाती है। जब गोचर में शनि किसी राशि से चतुर्थ व अष्टम भाव में होता है तो यह स्थिति ढैय्या कहलाती है। अगर शनि तृतीय, षष्ठ और एकादश भाव में हों तो साढ़ेसाती और ढैय्या करिश्माई परिणाम की साक्षी बनती हैं और तब यह योग जीवन में सफलता लेकर आता है लेकिन अन्य के लिए शुभ परिणाम नहीं लेकर आता है। अगर शनि अष्टम व द्वादश भाव में है तो अधिक कष्ट प्राप्त होने की आशंका होती है। साढ़ेसाती लगभग साढ़ेसात साल और ढैय्या ढाई साल चलती है। हर किसी के जीवन साढ़ेसाती हर 30 साल में जरूर आती है। शनि की महादशा 19 साल की होती है। शनि का रत्न वैदुर्य है जिसे नीलम या ब्लू सफायर भी कहते हैं।
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Saturday, 22 January 2022
कुंडली में ग्रहों का फल कैसे जानें
अपनी जन्म कुंडली के अनुसार ऐसे लें ग्रहों का सही फल! ऐसे करें जन्म समय की सही पहचान
: यदि बालक का जन्म ठीक समय पर होगा तो ग्रहों का फल भी ठीक होगा , और यदि इष्ट में किसी भी प्रकार की चूक या गड़बड़ी हो ...
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ज्योतिषशास्त्र के जानकारों से यह बात छिपी नहीं है कि यदि बालक का जन्म ठीक समय पर होगा तो ग्रहों का फल भी ठीक होगा , और यदि इष्ट में किसी भी प्रकार की चूक या गड़बड़ी हो गई तो सम्पूर्ण फल में गड़बड़ी हो जाती है , इसलिए बालक के पिता को उचित तरीके से प्रसव के समय ऐसी चतुर और जानकार स्त्री को नियुक्त करें जो बच्चे के जन्म लेते ही पहली स्वांस का समय नॉट कर सके। और उसकी सुचना बाहर बच्चे के पिता को दे सके। बिना इस सही समय की जानकारी के जन्म पत्रिका को अशुद्ध माना जाता है।
आपको यह सब मालूम करना चाहिए की बच्चे के जन्म का समय सही है या नहीं इसके लिए लग्न जातक से वह सब डाटा मेल मिल जाये तो मान लो की जन्म का समय ठीक है। यहाँ अपने सटीक समय पली को अपने सामने रख ले और लग्न को देखकर बच्चे के आचरण और उससे जुडी जानकारी से मिलान करें।
: कुंडली में जिस घर में लग्न लिखा है उस घर में जो अंक लिखा है उस नंबर की राशि को ही उसका लग्न घर कहा जाता है जैसे लग्न घर में अंक 2 है या 4 है तो इस प्रकार देखें राशियों का क्रम 1 मेष, 2 वृष, 3 मिथुन, 4 कर्क, 5 सिंह, 6 कन्या, 7 तुला, 8 वृश्चिक, 9 धनु, 10 मकर, 11 कुम्भ, 12 मीन।
2 नंबर की राशि वृष है तो लग्न वृष होगा या लग्न में अंक 4 लिखा हो तो लग्न कर्क होगा , ईसी प्रकार आप अपने कुंडली में लग्न देखकर जन्म समय की सटीकता की जांच करें।
प्रशव घर कोई भी कमरा हो सकता है इसको मुख्य घर न समझे
यदि बालक के जन्म समय में लग्न तुला , वृश्चिक , कुम्भ , मेष , कर्क , हो तो प्रसव के घर का द्वार पूर्वमुख था।
यदि कन्या धनु मीन मिथुन लग्न में बालक का जन्म हो तो प्रसूतिघर का द्वार उत्तर की ओर था।
जन्म लग्न वृष लग्न हो तो प्रसूति द्वार पश्चिम मुख होगा।
जन्म समय सिंह और मकर लग्न हो तो प्रसूता द्वार दक्षिण होना चाहिए।
इसी प्रकार अपने प्रसूति घर के बारे में जानकारी सही मिलान करके भी जन्म समय के समय की सही गलत की जानकारी देख सकते है
ज्योतिष विद्या में बालक के जन्म लेते ही रोने सम्बन्धी जानकारी से भी सही गलत समय की पहचान की जा सकती है
बालक के जन्म समय में मेष , वृष , सिंह , मिथुन , तुला लग्न हो तो बालक जन्म लेते ही रोया करते है ।
कुम्भ, कन्या लग्न वाले बालक कुछ रोदन करते है
कर्क , वृश्चिक , धनु , मीन लग्न में जन्मे बालक जन्म लेते ही नहीं रोते , ये कुछ समय बाद रोते है।
मेष ,वृष , मिथुन , सिंह , तुला लग्नों बालक का जन्म हो तो यह बालक सब ज्ञान को भूलकर बहुत रोदन करता है
कुम्भ और कन्या लग्न वाले कुछ समय के लिए रोते है।
बालक के जन्म कुंडली से जानिए कुछ जन्म से जुड़े ग्रहों के फल
**जिस बालक के जन्मकाल में शुक्र बुध हो और केंद्र स्थान १,४,७,१० में बृहस्पति हो तथा दश में मंगल हो तो उस बालक को कुल का दीपक माना जाता है
*जिस बालक के जन्म लग्न में बुध शुक्र न हो और केंद्र में बृहस्पति न हो दशम घर में मंगल न हो तो उसका जन्म निरर्थक होता है
जो छठे और बारहवें घर में पापग्रह हो तो मत को भयकारक होता है चौथे दशमें स्थान में पापग्रह हो तो पिता को अरिष्ट होता है।
जो लग्न स्थान या सप्तम स्थान में मंगल हो पंचम में सूर्य और बारहवे स्थान में राहु हो तो वह बालक निस्चय प्रसिद्द पुरुष होता है।
*यदि बुध और बृहस्पति दशम स्थान में हो और १,४,७,१० सूर्य मंगल तथा तीसरे ग्यारवें घर में पाप गृह हो तो बालक के हाथ या पेरो में विकार होता है और छ उंगलिया होती है।
*यदि बारहवें स्थान में चन्द्र मंगल हो तो बाई आँख में खराबी करते है यदि बारहवें सूर्य और राहु हो तो दाहिना नेत्र में खराबी होती है।
*यदि तीसरे स्थान में शुक्र हो सिंह और मेष का बृहस्पति हो और दशवें घर में मंगल सूर्य हो तो बालक गूंगा होता है।
*यदि सिंह लग्न में जन्म हो और सप्तम स्थान में शनि हो तो ब्राह्मण घर में जन्म लेते हुए भी म्लेच्छ होगा।
*जो पांचवें सातवें नवें बारहवें आठवें तथा लग्न में इनमे किसी स्थान में क्षिणचन्द्रमा पापगृहयुक्त हो और बलवान होकर शुक्र बुध बृहस्पति इनमे से कोई शुभगृह न देखता हो तो या इनसे युक्त न हो तो बालक की मृत्यु हो जाती है।
*यदि कृष्ण पक्ष में दिन में जन्म हुआ हो और शुक्ल पक्ष में रात को जन्म हुआ हो उस वक्त छठे और आठवें स्थान में चन्द्रमा हो तो सम्पूर्ण अरिष्ट निवारण होते है। ज्योतिष उपाय से कुछ हद तक सहूलियत मिल जाती है।
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