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Tuesday, 17 February 2026
रत्न धारण कैसे करें?
Jyotishgurumk
बृहद संहिता पुराणों पर आधारित आचार्य वाराहमिहिर द्वारा स्वरचित सुन्दर ग्रन्थ है। वाराहमिहिर के इस ग्रन्थ में रत्नों की उत्पत्ति व गुण दोषों का सुन्दर वर्णन मिलता है। इसके अलावा रत्न के विषय में अनेक ग्रंथों में वर्णन है ।
👉 रत्न धारण करने से ना शुभता आती है ना अशुभता आती है । रत्नों के माध्यम से ग्रहों से संबंधित रश्मि या ऊर्जा की मात्रा में वृद्धि किया जाता है ।
👉 जन्म कुंडली विश्लेषण के अनुसार यदि कोई ग्रह हमें लाभ देने वाले हैं या हमारे जीवन में उनका बहुत ज्यादा महत्व है यदि वह कमजोर हैं , तब उनके बल में वृद्धि करने के लिए रत्न धारण किया जाता है । जिससे हमें पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके ।
👉 मुख्यतः ग्रह अंश बल , स्थान बल , पक्ष बल ( और भी कई प्रकार से ग्रहों का बल देखा जाता है ) में कमजोर होते हैं या 6 , 8 , 12 भाव में चले जाते हैं तब कमजोर होते हैं या नीच राशि में विराजमान होते हैं तब कमजोर होते हैं ।
अब ऐसी स्थिति में उन ग्रहों से संबंधित लाभ लेने के लिए रत्न धारण किया जाता है ।
👉 परंतु रत्न धारण करते समय यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जो ग्रह कमजोर है उसकी दृष्टि किस राशि एवं किस ग्रह पर पड़ रही है । यदि वहां दृष्टि डालकर वह परेशानी का योग बना रहे हैं या जहां विराजमान है वहां के अनुसार भी परेशानी का योग बना रहे हैं तब रत्न धारण नहीं करेंगे बल्कि उसका मंत्र जाप इत्यादि करेंगे ।
👉 यदि कोई ग्रह बल में कमजोर नहीं है तो उसका रत्न धारण नहीं करना चाहिए उससे आपको कोई लाभ नहीं होगा ।
👉 कुछ लोग जिन्होंने कभी कोई रत्न धारण नहीं किया है ना करवाया है । रत्न ज्योतिष का कोई ज्ञान नहीं है ना ही उसका कोई एक्सपीरियंस है ऐसे लोग लोगों को भड़काते रहते हैं कि 6 , 8 , 12 में चला गया तो उसका रत्न मत धारण करो । नीच राशि में विराजमान ग्रह का रत्न धरण मत करो जबकि मैंने सैकड़ो लोगों को 6 , 8 , 12 भाव में गए ग्रह का धारण करवाया है । मैं स्वयं 12 भाव में विराजमान ग्रह का रत्न धारण किया हूं । और श्रेष्ठ लाभ प्राप्त हुआ है ।
👉 परंतु बिना संपूर्ण विश्लेषण के किसी भी ग्रह का रत्न धारण नहीं किया जा सकता है । क्योंकि रत्न धारण करने से पहले ग्रहों के फलादेश को समझना आवश्यक है ।
♦️ यहां दो वृष लग्न की कुंडली पोस्ट किया गया है । पहली कुंडली में शनि द्वादश भाव में नीच राशि में विराजमान है । वह किसी ग्रह पर दृष्टि डालकर पीड़ित नहीं कर रहा है । इसलिए इसका रत्न धारण किया जा सकता है ।
दूसरी कुंडली में शनि द्वितीय भाव में सूर्य एवं मंगल पर दृष्टि डाल रहे हैं । जिसके कारण धन , कुटुंब , माता , भूमि , भवन एवं वैवाहिक जीवन में परेशानी का योग बनेगा । अतः यहां पर शनि का रत्न नहीं धारण कर सकते हैं । यहां हम उसका मंत्र जाप कर सकते हैं या लोहे का छल्ला धारण कर सकते हैं ।
👉 अब यदि दोनों व्यक्ति नीलम धारण करेंगे तो अपना-अपना अनुभव बताएंगे । एक बोलेगा मुझे तो लाभ हुआ दूसरा बोलेगा मुझे हानि हुई । अब दूसरा सब लोगों को भड़काएगा की 12 भाव में विराजमान ग्रह का रत्न नहीं धारण करना चाहिए हानि पहुंचती है । जबकि वह अपनी कुंडली का विश्लेषण नहीं चेक कर रहा है कि क्यों परेशानी हो रही है ।
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