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Tuesday, 17 February 2026
रत्न धारण कैसे करें?
Jyotishgurumk
बृहद संहिता पुराणों पर आधारित आचार्य वाराहमिहिर द्वारा स्वरचित सुन्दर ग्रन्थ है। वाराहमिहिर के इस ग्रन्थ में रत्नों की उत्पत्ति व गुण दोषों का सुन्दर वर्णन मिलता है। इसके अलावा रत्न के विषय में अनेक ग्रंथों में वर्णन है ।
👉 रत्न धारण करने से ना शुभता आती है ना अशुभता आती है । रत्नों के माध्यम से ग्रहों से संबंधित रश्मि या ऊर्जा की मात्रा में वृद्धि किया जाता है ।
👉 जन्म कुंडली विश्लेषण के अनुसार यदि कोई ग्रह हमें लाभ देने वाले हैं या हमारे जीवन में उनका बहुत ज्यादा महत्व है यदि वह कमजोर हैं , तब उनके बल में वृद्धि करने के लिए रत्न धारण किया जाता है । जिससे हमें पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके ।
👉 मुख्यतः ग्रह अंश बल , स्थान बल , पक्ष बल ( और भी कई प्रकार से ग्रहों का बल देखा जाता है ) में कमजोर होते हैं या 6 , 8 , 12 भाव में चले जाते हैं तब कमजोर होते हैं या नीच राशि में विराजमान होते हैं तब कमजोर होते हैं ।
अब ऐसी स्थिति में उन ग्रहों से संबंधित लाभ लेने के लिए रत्न धारण किया जाता है ।
👉 परंतु रत्न धारण करते समय यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जो ग्रह कमजोर है उसकी दृष्टि किस राशि एवं किस ग्रह पर पड़ रही है । यदि वहां दृष्टि डालकर वह परेशानी का योग बना रहे हैं या जहां विराजमान है वहां के अनुसार भी परेशानी का योग बना रहे हैं तब रत्न धारण नहीं करेंगे बल्कि उसका मंत्र जाप इत्यादि करेंगे ।
👉 यदि कोई ग्रह बल में कमजोर नहीं है तो उसका रत्न धारण नहीं करना चाहिए उससे आपको कोई लाभ नहीं होगा ।
👉 कुछ लोग जिन्होंने कभी कोई रत्न धारण नहीं किया है ना करवाया है । रत्न ज्योतिष का कोई ज्ञान नहीं है ना ही उसका कोई एक्सपीरियंस है ऐसे लोग लोगों को भड़काते रहते हैं कि 6 , 8 , 12 में चला गया तो उसका रत्न मत धारण करो । नीच राशि में विराजमान ग्रह का रत्न धरण मत करो जबकि मैंने सैकड़ो लोगों को 6 , 8 , 12 भाव में गए ग्रह का धारण करवाया है । मैं स्वयं 12 भाव में विराजमान ग्रह का रत्न धारण किया हूं । और श्रेष्ठ लाभ प्राप्त हुआ है ।
👉 परंतु बिना संपूर्ण विश्लेषण के किसी भी ग्रह का रत्न धारण नहीं किया जा सकता है । क्योंकि रत्न धारण करने से पहले ग्रहों के फलादेश को समझना आवश्यक है ।
♦️ यहां दो वृष लग्न की कुंडली पोस्ट किया गया है । पहली कुंडली में शनि द्वादश भाव में नीच राशि में विराजमान है । वह किसी ग्रह पर दृष्टि डालकर पीड़ित नहीं कर रहा है । इसलिए इसका रत्न धारण किया जा सकता है ।
दूसरी कुंडली में शनि द्वितीय भाव में सूर्य एवं मंगल पर दृष्टि डाल रहे हैं । जिसके कारण धन , कुटुंब , माता , भूमि , भवन एवं वैवाहिक जीवन में परेशानी का योग बनेगा । अतः यहां पर शनि का रत्न नहीं धारण कर सकते हैं । यहां हम उसका मंत्र जाप कर सकते हैं या लोहे का छल्ला धारण कर सकते हैं ।
👉 अब यदि दोनों व्यक्ति नीलम धारण करेंगे तो अपना-अपना अनुभव बताएंगे । एक बोलेगा मुझे तो लाभ हुआ दूसरा बोलेगा मुझे हानि हुई । अब दूसरा सब लोगों को भड़काएगा की 12 भाव में विराजमान ग्रह का रत्न नहीं धारण करना चाहिए हानि पहुंचती है । जबकि वह अपनी कुंडली का विश्लेषण नहीं चेक कर रहा है कि क्यों परेशानी हो रही है ।
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आपका Personal Year क्या है? 30 सेकंड में कैल्कुलेट करें।
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2026 की सटीक भविष्यवाणी: अंक ज्योतिष से जानें कैसा रहेगा आपका भविष्य फल।
नमस्कार दोस्तों, मैं हूँ Astro Manoj।
क्या 2026 आपके लिए वह 'लकी' साल साबित होने वाला है जिसका आप लंबे समय से इंतजार कर रहे थे? हर नया साल ब्रह्मांड की एक नई ऊर्जा और नई उम्मीदें लेकर आता है। लेकिन वैदिक अंक ज्योतिष (Vedic Numerology) के अनुसार, 2026 आपके व्यक्तिगत जीवन के लिए क्या संकेत दे रहा है, यह आपके "पर्सनल ईयर" (Personal Year) और "अंतरदशा" की गणना पर निर्भर करता है।
अक्सर लोग केवल सामान्य भविष्यफल देखते हैं, लेकिन यह पद्धति आपके जन्म की तारीख और उस विशेष दिन (वार) के आधार पर काम करती है, जिससे परिणाम कहीं अधिक सटीक हो जाते हैं। आइए जानते हैं कि आप खुद घर बैठे अपनी गणना कैसे कर सकते हैं।
वह अनोखा सूत्र: अपनी 'अंतरदशा' और 'पर्सनल ईयर' कैसे निकालें?
अंक ज्योतिष का यह विशेष सूत्र "जन्म वार" (Birth Weekday) को जोड़ने के कारण बहुत प्रभावशाली माना जाता है। अपनी गणना करने के लिए आपको नीचे दिए गए अंकों को जोड़ना होगा:
गणना की विधि:
1. जन्म का दिन: अपनी जन्म तिथि के अंकों का योग।
2. जन्म का महीना: अपने जन्म के महीने का अंक।
3. लक्ष्य वर्ष (2026): यहाँ हम केवल वर्ष के अंतिम दो अंकों (26) का उपयोग करेंगे, यानी 2+6 = 8।
4. जन्म वार का अंक: जिस दिन आपका जन्म हुआ, उसका निर्धारित अंक नीचे दी गई तालिका से लें:
* रविवार (Sunday) = 1 और 4
* सोमवार (Monday) = 2 और 7
* मंगलवार (Tuesday) = 9
* बुधवार (Wednesday) = 5
* गुरुवार (Thursday) = 3
* शुक्रवार (Friday) = 6
* शनिवार (Saturday) = 8
एक उदाहरण से समझें: मान लीजिए किसी व्यक्ति की जन्म तिथि 12/02/1999 है और उनका जन्म शुक्रवार (Friday) को हुआ था। वे 2026 के लिए अपनी दशा जानना चाहते हैं।
* (जन्म दिन): 1 + 2 = 3
* (जन्म महीना): 0 + 2 = 2
* (साल 2026 के अंक): 2 + 6 = 8
* (जन्म वार - शुक्रवार): 6
कुल योग: (3) + (2) + (8) + (6) = 19 इसे एकल अंक (Single Digit) में बदलें: 1 + 9 = 10 -> 1 + 0 = 1
इस प्रकार, इस व्यक्ति का पर्सनल ईयर 1 बना।
सूर्य का प्रभाव: पर्सनल ईयर 1 का भविष्य फल
यदि आपकी गणना का कुल योग '1' आता है, तो यह "सूर्य का वर्ष" है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य को ग्रहों का राजा और आत्मा का कारक माना गया है। पर्सनल ईयर 1 का मतलब है कि आप एक नए 9-साल के चक्र में प्रवेश कर रहे हैं। यह समय अपनी 'ऊर्जा' (Energy) को केंद्रित करने और पुराने डर को छोड़कर नेतृत्व संभालने का है।
"सूर्य महादशा में सूर्य अंतरदशा चल रही है — और यह साल जातक के लिए शुभ संकेत देता है।"
यदि आपका पर्सनल ईयर 1 है, तो 2026 में आप मानसिक रूप से अधिक सशक्त महसूस करेंगे। यह साल आपके भीतर के 'संकल्प' को जगाने और सफलता की नई इबारत लिखने के लिए श्रेष्ठ है।
1 से 9 तक के अंकों का भविष्यफल नीचे देखें।
2026 में आपका पर्सनल ईयर अंक आपकी मानसिकता और परिस्थितियों को किस तरह प्रभावित करेगा, आइए विस्तार से जानते हैं:
* पर्सनल ईयर 1: नई शुरुआत – यह साल नेतृत्व और आत्मविश्वास का है। मानसिक रूप से आप नए जोखिम लेने और अपनी पहचान बनाने के लिए पूरी तरह तैयार रहेंगे।
* पर्सनल ईयर 2: सहयोग और संबंध – आपकी मानसिकता दूसरों के प्रति संवेदनशील रहेगी। यह साल अकेले चलने का नहीं, बल्कि साझेदारी और रिश्तों में तालमेल बिठाने का है।
* पर्सनल ईयर 3: क्रिएटिविटी – आपकी रचनात्मक ऊर्जा चरम पर होगी। आप खुद को अभिव्यक्त करने के नए तरीके खोजेंगे और सामाजिक दायरे में आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी।
* पर्सनल ईयर 4: मेहनत – यह अनुशासन का साल है। आपकी सहनशक्ति की परीक्षा होगी; ध्यान रखें कि इस साल कोई भी शॉर्टकट काम नहीं आएगा, केवल ठोस योजना ही सफल होगी।
* पर्सनल ईयर 5: बदलाव – जीवन में अनपेक्षित मोड़ आ सकते हैं। आप मानसिक रूप से स्वतंत्रता और रोमांच की तलाश में रहेंगे, जिससे यात्रा या करियर में बड़े बदलाव संभव हैं।
* पर्सनल ईयर 6: परिवार और जिम्मेदारी – आपका ध्यान घर और अपनों पर केंद्रित रहेगा। यह अपनी जिम्मेदारियों को निभाने और पारिवारिक सुख-शांति को प्राथमिकता देने का समय है।
* पर्सनल ईयर 7: आध्यात्म – आप भीड़भाड़ से दूर एकांत की तलाश करेंगे। आत्म-चिंतन और गहन अध्ययन के लिए यह साल बेहतरीन है, जहाँ आप जीवन के गहरे रहस्यों को समझेंगे।
* पर्सनल ईयर 8: धन और करियर – यह कर्मों के फल का साल है। आर्थिक उन्नति और करियर में सत्ता हासिल करने की तीव्र इच्छा आप पर हावी रहेगी; आपकी मेहनत का परिणाम धन के रूप में दिखेगा।
* पर्सनल ईयर 9: समापन – यह सफाई का साल है। जो चीजें अब आपके काम की नहीं हैं (चाहे वे विचार हों या रिश्ते), उन्हें छोड़कर नए चक्र के लिए जगह बनाने की मानसिकता बनी रहेगी।
अंक ज्योतिष हमें केवल भविष्य नहीं बताता, बल्कि हमें आने वाली चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है। जब आप अपनी 'अंतरदशा' को जान लेते हैं, तो आप अपनी ऊर्जा को सही दिशा में प्रवाहित कर सकते हैं। 2026 का साल हर किसी के लिए एक अलग सबक लेकर आ रहा है—चाहे वह अंक 1 की नई शुरुआत हो या अंक 8 की भौतिक सफलता।
आपका पर्सनल ईयर कौन सा आया? क्या आप 2026 के इन बदलावों के लिए तैयार हैं?
अपनी गणना नीचे कमेंट बॉक्स में साझा करें और हमें बताएं कि आप इस साल क्या नया शुरू करने वाले हैं। ऐसी ही सटीक ज्योतिषीय जानकारियों के लिए चैनल सबस्क्राइब करें और लाईक शेयर करें और हमारे साथ जुड़े रहें ।
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Tuesday, 18 February 2025
राशि अनुसार विवाह के उपाय, तुरंत बनेंगे विवाह के योग।
आप में से कई लोग ऐसे होंगे, जो विवाह तो करना चाह रहे हैं लेकिन विवाह होने में कोई ना कोई परेशानी बनी रहती है।
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कुछ लोग ऐसे होते हैं,जीवनसाथी तो मिल गया है लेकिन विवाह में समस्या आ रही है। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके विवाह में ऐन मौके पर कोई ना कोई अड़चन आ रही है,इस वजह से विवाह में देरी हो रही है। शास्त्र के अनुसार, किसी भी जातक की कुंडली में विवाह का कारक भाव *सप्तम भाव* को माना गया है। सप्तम भाव के कारक ग्रह शुक्र और गुरु ग्रह हैं। जब व्यक्ति की कुंडली में शुक्र और गुरु की अवस्था सही नहीं होती है तो विवाह में दिक्कतें आती हैं। इसके अलावा अगर सप्तम भाव राहु, केतु और शनि जैसे पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो भी व्यक्ति के विवाह में कोई ना कोई परेशानी रहती है। ऐसे में राशि अनुसार उपाय करेंगे तो आपकी समस्या का जल्द समाधान मिलेगा। जानते हैं शीघ्र विवाह के लिए राशि अनुसार कौन से उपाय करें....
मेष राशि:-
मेष राशि के स्वामी मंगल ग्रह हैं इसलिए मेष राशि के व्यक्ति शिवालय में जाकर *माता गौरी* को गुड़ अर्पित करें और गुड़ के प्रसाद के तौर पर ग्रहण भी कर लें। ऐसे में विवाह के शुभ योग बनने लग जाते हैं।
वृष राशि:-
वृष राशि के स्वामी शुक्र ग्रह हैं इसलिए वृष राशि वाले *माता गौरी *को पीपल का पत्ता अर्पित करें। ऐसा करने से विवाह संबंधी समस्याएं दूर हो जाएंगी और शीघ्र विवाह के योग बनने लग जाएंगे।
मिथुन राशि:-
मिथुन राशि के स्वामी बुध ग्रह हैं इसलिए मिथुन राशि वाले *माता गौरी को हरे रंग* का धागा अर्पित करें और फिर उसको अपने पास रखें। ऐसा करने से योग्य जीवनसाथी मिलेगी और विवाह में आ रही परेशानियां दूर होंगी।
कर्क राशि:-
कर्क राशि के स्वामी चंद्र ग्रह हैं इसलिए कर्क राशि वाले माता गौरी को *पीपल के पत्ते पर सिंदूर* लगाकर अर्पित करें। ऐसा करने से विवाह संबंधी परेशानियां खत्म होंगी और माता गौरी की कृपा से विवाह के शुभ योग भी बनने लग जाएंगे।
सिंह राशि:-
सिंह राशि के स्वामी सूर्यदेव हैं इसलिए सिंह राशि *माता मंगला गौरी को लाल धागा* अर्पित करें और फिर उस धागे को अपने पास रखें। ऐसा करने से विवाह संबंधी समस्या दूर होगी और योग्य जीवनसाथी मिलेगा।
कन्या राशि:-
कन्या राशि के स्वामी बुध ग्रह हैं इसलिए कन्या राशि वाले जातक को *ॐ गौरी शंकराय नमः* मंत्र का सुबह शाम 108 बार जप करें। ऐसा करने से विवाह और वैवाहिक जीवन में जो भी परेशानियां चल रही हैं, वे सभी दूर हो जाएंगी।
तुला राशि:-
तुला राशि के स्वामी शुक्र ग्रह हैं इसलिए तुला राशि के जातक *माता मंगला गौरी को मसूर दाल* अर्पित करें और इसके बाद मसूर दाल के कुछ दाने अपने पास रख लें। ऐसा करने से जिनकी शादी नहीं हो रही है, उनकी शादी जल्द हो जाएगी और दांपत्य जीवन में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे।
वृश्चिक राशि:-
वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल ग्रह हैं इसलिए वृश्चिक राशि वाले हर रोज शाम के समय *चमेली के तेल* का दीपक जलाएं। ऐसा करने से विवाह के शीघ्र योग बनने लग जाते हैं।
धनु राशि:-
धनु राशि के स्वामी बृहस्पति ग्रह हैं इसलिए धनु राशि वाले हर रोज *मंगला गौरी स्तोत्र* का पाठ करें। ऐसा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होगी और शादी विवाह में आ रही परेशानियों से मुक्ति मिलेगी।
मकर राशि:-
मकर राशि के स्वामी शनि ग्रह हैं इसलिए मकर राशि वाले किसी शिवालय में जाकर *देवी मंगला गौरी* को *लाल चुनरी* अर्पित करें। ऐसा करने से जीवन में शुभता आएगी और शीघ्र विवाह के योग बनने लग जाते हैं।
कुंभ राशि:-
कुंभ राशि के स्वामी शनि ग्रह हैं इसलिए कुंभ राशि वाले *पान के पत्ते में सिंदूर* लगाकर माता *मंगला गौरी *को अर्पित करें। ऐसा करने से माता की आप पर विशेष कृपा होगी और शादी में आ रही बाधा दूर होंगी।
मीन राशि:-
मीन राशि के स्वामी गुरु ग्रह हैं इसलिए मीन राशि वाले देवी माता के मंदिर में *माता के चरणों में सिंदूर* अर्पित करें। ऐसा करने से समस्याओं से छुटकारा मिलेगा।
किसी भी समस्या के समाधान के लिए सम्पर्क करें व्हाट्सऐप नंबर 9333112719 पर। हमारे प्रसिद्ध ज्योतिष गुरु के द्वारा सटीक मार्गदर्शन देंगे। धन्यवाद 🙏
Saturday, 26 August 2023
Merucary,पारा, वास्तु, शास्त्र में पारद शिवलिंग के महत्व
USES OF MERCURY (PARAD) BEAD IN REMOVING VAASTU DOSHAS
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INTRODUCTION:
Parad (Mercury) as per ancient text is considered sperm of Lord Shiva. At a room temperature the mercury is liquid, but if treated as per Parad Samhita it can solidify and becomes a boon to the mankind. Very few people in the whole world knows the correct way to to do full 8 treatments which makes the pars a "paras Mani". We are specialised into this. Ancient Vedas has considered Parad as the most pure and auspicious metal which not only has religious importance but medical importance too. Parad is also very useful in controlling various diseases like High Blood Pressure, Asthma and increase the Sex Power. Parad has special significance in Ayurveda too. Parad benefits have been proved beneficial from Astrological as well as Scientific point of view also. Parad Gutika if placed correctly in the house gives the inmates extreme protection from evil souls, black magic, occult and negative forces. It has a tremendous medicinal value and and keeps the Chakras fine tuned.
USES OF MERCURY/PARAD BEAD: (SIDDH GUTIKA)
Following the the few great uses of purified Parad beads.
1. AWAKENING OF KUNDALNI SHAKTI
By keeping solid mercury upon the top of the head, the Kundalini-Shakti will gradually awaken in course of time and the siddhi will be obtained.
2. INCREASE IN PURE WILL POWER
By using solid Mercury, will-power can be increased to a great extent.
3. CURE OF ALL DISEASES
• 3a. It can cure all kinds of diseases. It makes the physical body powerful, agile and lustrous. Solid Mercury ball should be dipped 4 times only (not more) in 200 ml of raw milk and then it should be taken before the night sleep. In order to get rid of all diseases, the aforesaid milk should be continuously taken for a minimum of 41 days and maximum 3 months without any break.
• 3b. Drinking water of Siddh Gutika helps in overcoming depression, tension and worries. For this keep siddh gutika for 5 minutes in water and than drink it.
• 3c. If worn on right hand of man and left hand of women or worn on chest , it keeps evils away, controls high blood pressure and protects from untimely death.
4. SUCCESS IN COURT CASES
Keeping the Siddh gutika with you during hearing of court cases gives favourable decisions.
5. INCREASES MEMORY POWER
Siddh gutika when worn by students increases their memory and grasping power.
6. NIGHT DREAMS & FISTULA
The Mercury ball should be tied on the waist in such a way that it is in close contact with the skin . This will cure such diseases. Siddh Gutika can be kept near pillow while sleeping to prevent from nightmares and evil eyes.
7. CURE FROM EVIL SPIRITS
The solid Mercury ball should be threaded and kept like a locket in the neck of the affected person until recovery. It will prevent the attack of evil spirits upon the body.
8. HEART - DISEASES
The Mercury ball should be kept like a locket in the neck so that it touches the heart centre.
9. BODY - PAIN
In case of any kind of pain on the surface of the body, the mercury ball should be fixed on that portion during night sleep or day time with an adhesive plaster so that the affected body skin touches the ball. The ball should be kept on the body-skin until the pain is completely cured. The mercury ball should be kept in pure Ghee or oil for 24 hours and it should be massaged on any part of the body for the cure of pain. The Ghee or oil must be cool. For digestive problems, constipation , gas in stomach , headache etc the the Mercury ball should be kept at the naval point for 15/20 minutes daily until recovery.
10. EYE - DISEASES
The Mercury ball should be kept on closed eye-lids with the help of cloth bandage for 15 minutes daily at the time of night sleep. The ball should be kept in cold water for 24 hours and then the water should be sprinkled into eye-balls daily in the morning.
11. LONG FOOT WALK
During long foot journey to pilgrimages etc. The ball should be tied on the waist in close contact with skin . This would prevent tiredness and fatigue.
12. MINERAL DISCOVERY
In order to know the type of mineral (like gold, silver, copper, iron , etc) mixed in any kind of fruit, flower, plant, leaves, stone or water the solid Mercury ball should be kept in water or squeezed juice or powdered form of that commodity for one hour and the concerned mineral will slowly change the colour of ball. The ball should be taken out of juice or water or powder after one hour and be dried up in air. You will see that Mercury ball has taken the colour of mineral mixed in that commodity.
13. MATTER TECHNOLOGY
In general the body of each person is constituted of one specific matter like sky, air, fire, water, earth according to their planetary birth-time. The other four types of matter remain as complementary elements in the same body. In order to know this particular element, the Mercury ball should be hung in the neck. When the ball becomes dirty with the perspiration of physical body, it changes its colour like blue, violet, red, white, or green according to the above mentioned five principal matters. This colour will indicate his particular Tattva or matter in the body. This experience can be gained only when body is perspiring during summer season.
PARAD BEAD (SIDDHA GUTIKA)
Eight stage of Purifications done as per Parad Sanmhita and removal of Saptakanchuki(100 % medicated and hygienic); the Siddha Parad (Mercury mouth closed with Aghor Vidhya) is formed to make Murthi-Badhha/Agnibadha(sustain the heat) Parad gutika. This Gutika gives 24 Ras and 5 Tatva which removes all diseases in the body
Size: 13mm;
Weight: 13 gms;
The parad bead is capped in silver.
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Wednesday, 19 July 2023
ब्रेकअप के बाद प्रेमी को वापस पाने के कुंडली योग
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ब्रेकअप के बाद अपने प्रेमी के वापस आने के योग -:
जब किसी प्रेम प्रेमिकाओं के बीच में ब्रेकअप हो जाता है तो उस स्थिति में हमें प्रेम प्रेमिका में से किसी एक की भी जन्म कुंडली को देख क पता कर सकते हैं कि उनके प्रेमी उनके जीवन में वापस आने के योग बनते हैं कि नहीं,
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इसके लिए हमें सबसे पहले जन्म कुंडली के पंचम भाव को देखना होता है। क्योंकि जन्म कुंडली का पंचम भाव हमारे प्रेम को रिप्रजेंट करता है। पता है जब हमारा पंचम भाव में किसी पाप ग्रह का आगमन हो और पंचम भाव का स्वामी किसी बुरे भाव में पाप ग्रहों से संबंध बनाकर पीड़ित हो जाता है। उस स्थिति में हमारे बीच में किसी न किसी बात को लेकर विवाद बढ जाता है और हमारा ब्रेकअप हो जाता है। इस स्थिति में हमें देखना होता है की पंचम भाव का स्वामी व द्वादश भाव के स्वामी के बीच में किसी भी प्रकार का युति संबंध दृष्टि संबंध दशा अंतर्दशा अथवा गोचर में सम्बन्ध बन रहा है तो उस कंडीशन में उस जातक जातिका को 101% उसका खोया हुआ प्रेम वापस मिलता है। अर्थात जिस समय पंचम भाव व द्वादश भाव का आपस में पॉजिटिव संबंध बन जाता है। उसी समय उनका बिछड़ा हुआ प्रेम उनको 100 प्रतिशत वापस मिल पाता है।
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उपाय -:
इस प्रकार अपने पिछड़े प्रेम को प्राप्त करने के लिए अपनी जन्म कुंडली के अकॉर्डिंग द्वादश भाव के स्वामी को पॉजिटिव करने के उपाय करने चाहिए। जैसे वृषभ लग्न पत्रिका के चार्ट में द्वादश भाव में मिथुन राशि आती है उसके स्वामी बुध देव होते हैं अतः उसी स्थिति में हमें बुद्धदेव को प्रसन्न करने के लिए बुधदेव के बीज मंत्र का जाप कर सकते हैं बुधवार का व्रत कर सकते हैं तो निश्चित रूप से हमें हमारे प्रेमी को वापस लाने में सफलता प्राप्त होती है।
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कुंडली में प्रेम संबंध विच्छेद योग
कुंडली में प्रेम संबंध विच्छेद योग
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जन्म कुंडली में प्रेम का शत्रु भाव -:
जन्म कुंडली में पंचम भाव हमारी भावनाओं हमारे रोमांस अर्थात हमारे प्रेम रिलेशनशिप को रिप्रेजेंट करता है या यूं कहें कि हमारे जीवन में प्रेम का उद्गम पंचम भाव से देखा जाता है। जबकि हमें हमारे रिलेशन शिप के बारे में जानना होता है तो हमें पंचम भाव का अध्ययन करना होता है। पंचम भाव से गणना करने पर जन्मकुंडली का टेंन्थ हाउस षष्टम भाव बनता है। तथा षष्टम भाव हमारी शत्रुता का हमारे नेगेटिव एनर्जी का होता है। अतः जब गोचर दशा में दशम भाव का संबंध पंचम भाव से या पंचम भाव के स्वामी के साथ होता है। तो वह समय हमारे प्रेम संबंधों में अलगाववादी स्थिति उत्पन्न करता है। यदि पंचम भाव व दशम भाव के स्वामियो के बीच मित्रता का संबंध होता है तो वह समय थोड़ा बहत डिस्टेंस होकर या मन मुटाव हो कर शांत हो जाता है। किंतु पंचम भाव व दशम भाव के स्वामी आपस में एक दूसरे के शत्रु होते हैं तो उस स्थिति में जब इनका संबंध गोचर में बनता है तो वो रिलेशनशिप में बहुत अधिक दूरियां और नफरत पैदा कर देता है। अतः जब यह गोचर बन रहा हो तो उस समय हमें दशम भाव के स्वामी को डीएक्टिव व पंचम भाव के स्वामी को एक्टिव करने की आवश्यकता होती है। जिससे हम हमारे रिलेशनशिप को बैटर बनाकर रख सकते हैं।
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Monday, 23 January 2023
संतान सुख की प्राप्ति किस ग्रह के कारण होते हैं?
संतान सुख में कौन से ग्रह बाधक बनते हैं?
नीचे पढ़ें समाधान @
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एक कुशल ज्योतिषी व्यक्ति के जन्मांग से ज्योतिष के द्वारा उसके भूत, भविष्य, प्रकृति और चरित्र को जान लेता है। जन्मांग व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का दर्पण होता है। कुंडली के बाहर भाव जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से संबंधित रहते हैं लेकिन मैं यहां केवल पंचम भाव से संबंधित संतान क्षेत्र को ही पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं।
बुद्धि प्रबंधात्मजमंत्र विद्या विनेयगर्भ स्थितिनीति संस्था:।
सुताभिधाने भवने नराणां होरागमज्ञै: परिचिन्तनीयम्।।
जातकाभरणम्
बुद्धि, प्रबंध, संतान, मंत्र (गुप्त विचार), गर्भ की स्थिति, नीति आदि शुभाशुभ विचार पंचम भाव से करना चाहिए। पंचम भाव की राशि एवं पंचमेश, पंचमेश किस राशि एवं स्थान में बैठा है तथा उसके साथ कौन-कौन से ग्रह स्थित हैं। पंचम भाव पर किन-किन ग्रहों की दृष्टि है, पुत्र कारक गुरु, नवम भाव तथा नवमेश की स्थिति, नवम भाव पंचम से पंचम होता है।
अत: यह पोते का स्थान भी कहलाता है। पंचम भाव के स्वामी पर किन-किन भावेशों की दृष्टि है, पंचमेश कारक है या अकारक, सौम्य ग्रह है या दृष्ट ग्रह तथा पंचम भाव से संबंधित दशा, अंतर्दशा और प्रत्यंतदशा आदि।
संतानधिपते: पञ्चषष्ठरि: फस्थिवेखले।
पुत्रोभावो भवेत्तस्य यदि जातो न जीवति।।
पंचमेश से 5/6/10 में यदि केवल पापग्रह हो तो उसको संतान नहीं होती, हो भी तो जीवित नहीं रहती हैं।
मंदस्य वर्गे सुतभाव संस्थे निशाकरस्थेऽपि च वीक्षितेऽमिन्।
दिवाकरेणोशनसा नरस्क पुनर्भवासंभव सूनुलब्धे:।।
पंचम भाव में शनि के वर्ग हों तथा उसमें चंद्रमा बैठा हो और रवि अथवा शुक्र से दृष्ट हो तो उसको पौनर्भ व (विधवा स्त्री से विवाह करके उत्पन्न) पुत्र होता है।
नवांशका: पंचम भाव संस्था यावन्मितै : पापखगै:द्रदृष्टा:।
नश्यंति गर्भ: खलु तत्प्रमाणाश्चे दीक्षितं नो शुभखेचरेंद्रे :।।
पंचम भाव नवमांश पर जितने पापग्रह की दृष्टि हो उतने गर्भ नष्ट होते हैं किन्तु यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो।
भूनंदनों नंदनभावयातो जातं च जातं तनयं निहन्ति।
दृष्टे यदा चित्र शिखण्डिजेन भृगो: सुतेन प्रथमोपन्नम्।।
पंचम भाव में केवल मंगल का योग हो तो संतान बार-बार होकर मर जाती है। यदि गुरु या शुक्र की दृष्टि हो तो केवल एक संतति नष्ट होती है और अन्य संतति जीवित रहती है। बंध्या योग, काक बंध्या योग, विषय कन्या योग, मृतवत्सा योग, संतित बाधा योग एवं गर्भपात योग स्त्रियों की कुंडली में होकर उन्हें संतान सुख से वंचित कर देते हैं। इस प्रकार के कुछ योग निम्रलिखित हैं :
लगन और चंद्र लगन से पंचम एवं नवम स्थान से पापग्रहों के बैठने से तथा उस पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। लगन, पंचम, नवम तथा पुत्रकारक गुरु पर पाप प्रभाव हो लगन से पंचम स्थान में तीन पाप ग्रहों और उन पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। आठवें स्थान में शनि या सूर्य स्वक्षेत्री हो। तीसरे स्थान पर स्वामी तीसरे ही स्थान में पांचवें या बारहवें में हो और पंचम भाव का स्वामी छठे स्थान में चला गया हो।
जिस महिला जातक की कुंडली में लगन में मंगल एवं शनि इकट्ठे बैठे हों। लगन में मकर या कुम्भ राशि हो। मेष या वृश्चिक हो और उसमें चंद्रमा स्थित हो तथा उस पर पापग्रहों की दृष्टि हो।
पांचवें या सातवें स्थान में सूर्य एवं राहू एक साथ हों। पांचवें भाव का स्वामी बारहवें स्थान में व बारहवें स्थान का स्वामी पांचवें भाव में बैठा हो और इनमें से कोई भी पाप ग्रह की पूर्ण दृष्टि में हो।
आठवें स्थान में शुभ ग्रह स्थित हो साथ ही पांचवें तथा ग्यारहवें घर में पापग्रह हों। सप्तम स्थान में मंगल-शनि का योग हो और पांचवें स्थान का स्वामी त्रिक स्थान में बैठा हो।
पंचम स्थान में मेष या वृश्चिक राशि हो और उसमें राहू की उपस्थिति हो या राहू पर मंगल की दृष्टि हो। शनि यदि पंचम भाव में स्थित हो और चंद्रमा की पूर्ण दृष्टि में हो और पंचम भाव का स्वामी राहू के साथ स्थित हो।
मंगल दूसरे भाव में, शनि तीसरे भाव में तथा गुरु नवम या पंचम भाव में हो तो पुत्र संतान का अभाव होता है। यदि गुरु-राहू की युति हो। पंचम भाव का स्वामी कमजोर हो एवं लग्न का स्वामी मंगल के साथ स्थित हो अथवा लगन में राहू हो, गुरु साथ में हो और पांचवें भाव का स्वामी त्रिक स्थान में चला गया हो।
पंचम भाव में मिथुन या कन्या राशि हो और बंधु मंगल के नवमांश में मंगल के साथ ही बैठ गया हो और राहू तथा गुलिक लगन में स्थित हो। आदि-आदि कई योगों का वर्णन ज्योतिष ग्रंथों में मिलता है जो संतति सुख हानि करता है तथा कुंडली मिलान करते समय सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए इन्हें विचार में लाना अति आवश्यक होता है।
पति या पत्नी में से किसी एक की कुंडली में संतानहीनता योग होता है तो दाम्पत्य जीवन नीरस हो जाता है। अनुभव में यह भी नहीं पाया गया है कि संतानहीनता योग वाली महिला की शादी संतति योग वाले पुरुष के साथ की जाए अथवा संतानहीन योग वाले पुरुष की शादी संतित योगा वाली महिला के साथ की जाए और इस प्रकार का कुयोग दूर हो जाए लेकिन यह कुयोग नहीं कटता और जीवन भर संतान का अभाव बना रहता है। ऐसी स्थिति में ईश कृपा, देव कृपा या संत कृपा ही इस कुयोग को काट सकती है। निम्र उपाय भी संतान सुख देने में सहायक होते हैं।
षष्ठी देवी का जप पूजन एवं स्त्रोत पाठ आदि का अनुष्ठान पुत्रहीन व्यक्ति को सुयोग पुत्र संतान देने में सहायक होता है।
संतान गोपाल मंत्र- ॐ क्लीं ॐ क्लीं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि ने तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ का जप एवं संतान गोपाल स्रोत का नियमित पाठ भी संतति सुख प्रदान करने वाला होता है।
इसके अतिरिक्त भगवान शिव की आराधना एवं जप, पूजा, अनुष्ठान, कन्या दान, गौदान एवं अन्य यंत्र-तंत्र तथा औषधियां अपनाने से भी संतति सुख प्राप्त किया जा सकता है।
गुरु, माता-पिता, ब्राह्मण, गाय आदि की सेवा, पुण्य, दान, यज्ञ आदि संतानहीनता को मिटाने वाले होते हैं।
नवरात्रि में सर्ववाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:। मनुष्यों मत्प्रसादेन भवि यति न संशय:।।
इस मंत्र से दुर्गा सप्तशती का नवचंडी या शतचंडी पाठ का अनुष्ठान भी संतान सुख देता है।
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