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Tuesday, 17 February 2026

रत्न धारण कैसे करें?

Jyotishgurumk बृहद संहिता पुराणों पर आधारित आचार्य वाराहमिहिर द्वारा स्वरचित सुन्दर ग्रन्थ है। वाराहमिहिर के इस ग्रन्थ में रत्नों की उत्पत्ति व गुण दोषों का सुन्दर वर्णन मिलता है। इसके अलावा रत्न के विषय में अनेक ग्रंथों में वर्णन है । 👉 रत्न धारण करने से ना शुभता आती है ना अशुभता आती है । रत्नों के माध्यम से ग्रहों से संबंधित रश्मि या ऊर्जा की मात्रा में वृद्धि किया जाता है । 👉 जन्म कुंडली विश्लेषण के अनुसार यदि कोई ग्रह हमें लाभ देने वाले हैं या हमारे जीवन में उनका बहुत ज्यादा महत्व है यदि वह कमजोर हैं , तब उनके बल में वृद्धि करने के लिए रत्न धारण किया जाता है । जिससे हमें पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके । 👉 मुख्यतः ग्रह अंश बल , स्थान बल , पक्ष बल ( और भी कई प्रकार से ग्रहों का बल देखा जाता है ) में कमजोर होते हैं या 6 , 8 , 12 भाव में चले जाते हैं तब कमजोर होते हैं या नीच राशि में विराजमान होते हैं तब कमजोर होते हैं । अब ऐसी स्थिति में उन ग्रहों से संबंधित लाभ लेने के लिए रत्न धारण किया जाता है । 👉 परंतु रत्न धारण करते समय यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जो ग्रह कमजोर है उसकी दृष्टि किस राशि एवं किस ग्रह पर पड़ रही है । यदि वहां दृष्टि डालकर वह परेशानी का योग बना रहे हैं या जहां विराजमान है वहां के अनुसार भी परेशानी का योग बना रहे हैं तब रत्न धारण नहीं करेंगे बल्कि उसका मंत्र जाप इत्यादि करेंगे । 👉 यदि कोई ग्रह बल में कमजोर नहीं है तो उसका रत्न धारण नहीं करना चाहिए उससे आपको कोई लाभ नहीं होगा । 👉 कुछ लोग जिन्होंने कभी कोई रत्न धारण नहीं किया है ना करवाया है । रत्न ज्योतिष का कोई ज्ञान नहीं है ना ही उसका कोई एक्सपीरियंस है ऐसे लोग लोगों को भड़काते रहते हैं कि 6 , 8 , 12 में चला गया तो उसका रत्न मत धारण करो । नीच राशि में विराजमान ग्रह का रत्न धरण मत करो जबकि मैंने सैकड़ो लोगों को 6 , 8 , 12 भाव में गए ग्रह का धारण करवाया है । मैं स्वयं 12 भाव में विराजमान ग्रह का रत्न धारण किया हूं । और श्रेष्ठ लाभ प्राप्त हुआ है । 👉 परंतु बिना संपूर्ण विश्लेषण के किसी भी ग्रह का रत्न धारण नहीं किया जा सकता है । क्योंकि रत्न धारण करने से पहले ग्रहों के फलादेश को समझना आवश्यक है । ♦️ यहां दो वृष लग्न की कुंडली पोस्ट किया गया है । पहली कुंडली में शनि द्वादश भाव में नीच राशि में विराजमान है । वह किसी ग्रह पर दृष्टि डालकर पीड़ित नहीं कर रहा है । इसलिए इसका रत्न धारण किया जा सकता है । दूसरी कुंडली में शनि द्वितीय भाव में सूर्य एवं मंगल पर दृष्टि डाल रहे हैं । जिसके कारण धन , कुटुंब , माता , भूमि , भवन एवं वैवाहिक जीवन में परेशानी का योग बनेगा । अतः यहां पर शनि का रत्न नहीं धारण कर सकते हैं । यहां हम उसका मंत्र जाप कर सकते हैं या लोहे का छल्ला धारण कर सकते हैं । 👉 अब यदि दोनों व्यक्ति नीलम धारण करेंगे तो अपना-अपना अनुभव बताएंगे । एक बोलेगा मुझे तो लाभ हुआ दूसरा बोलेगा मुझे हानि हुई । अब दूसरा सब लोगों को भड़काएगा की 12 भाव में विराजमान ग्रह का रत्न नहीं धारण करना चाहिए हानि पहुंचती है । जबकि वह अपनी कुंडली का विश्लेषण नहीं चेक कर रहा है कि क्यों परेशानी हो रही है । 🔹🔹🔹🔹🔹 जन्मकुंडली का संपूर्ण विश्लेषण करवाना चाहते हैं तो मेरा Website देखें । एवं फोन करें 👇 https://whatsapp.com/channel/0029VbBKJUV2phHULNytR638 Mo - 9333112719

आपका Personal Year क्या है? 30 सेकंड में कैल्कुलेट करें।

Jyotishgurumk 2026 की सटीक भविष्यवाणी: अंक ज्योतिष से जानें कैसा रहेगा आपका भविष्य फल। नमस्कार दोस्तों, मैं हूँ Astro Manoj। क्या 2026 आपके लिए वह 'लकी' साल साबित होने वाला है जिसका आप लंबे समय से इंतजार कर रहे थे? हर नया साल ब्रह्मांड की एक नई ऊर्जा और नई उम्मीदें लेकर आता है। लेकिन वैदिक अंक ज्योतिष (Vedic Numerology) के अनुसार, 2026 आपके व्यक्तिगत जीवन के लिए क्या संकेत दे रहा है, यह आपके "पर्सनल ईयर" (Personal Year) और "अंतरदशा" की गणना पर निर्भर करता है। अक्सर लोग केवल सामान्य भविष्यफल देखते हैं, लेकिन यह पद्धति आपके जन्म की तारीख और उस विशेष दिन (वार) के आधार पर काम करती है, जिससे परिणाम कहीं अधिक सटीक हो जाते हैं। आइए जानते हैं कि आप खुद घर बैठे अपनी गणना कैसे कर सकते हैं। वह अनोखा सूत्र: अपनी 'अंतरदशा' और 'पर्सनल ईयर' कैसे निकालें? अंक ज्योतिष का यह विशेष सूत्र "जन्म वार" (Birth Weekday) को जोड़ने के कारण बहुत प्रभावशाली माना जाता है। अपनी गणना करने के लिए आपको नीचे दिए गए अंकों को जोड़ना होगा: गणना की विधि: 1. जन्म का दिन: अपनी जन्म तिथि के अंकों का योग। 2. जन्म का महीना: अपने जन्म के महीने का अंक। 3. लक्ष्य वर्ष (2026): यहाँ हम केवल वर्ष के अंतिम दो अंकों (26) का उपयोग करेंगे, यानी 2+6 = 8। 4. जन्म वार का अंक: जिस दिन आपका जन्म हुआ, उसका निर्धारित अंक नीचे दी गई तालिका से लें: * रविवार (Sunday) = 1 और 4 * सोमवार (Monday) = 2 और 7 * मंगलवार (Tuesday) = 9 * बुधवार (Wednesday) = 5 * गुरुवार (Thursday) = 3 * शुक्रवार (Friday) = 6 * शनिवार (Saturday) = 8 एक उदाहरण से समझें: मान लीजिए किसी व्यक्ति की जन्म तिथि 12/02/1999 है और उनका जन्म शुक्रवार (Friday) को हुआ था। वे 2026 के लिए अपनी दशा जानना चाहते हैं। * (जन्म दिन): 1 + 2 = 3 * (जन्म महीना): 0 + 2 = 2 * (साल 2026 के अंक): 2 + 6 = 8 * (जन्म वार - शुक्रवार): 6 कुल योग: (3) + (2) + (8) + (6) = 19 इसे एकल अंक (Single Digit) में बदलें: 1 + 9 = 10 -> 1 + 0 = 1 इस प्रकार, इस व्यक्ति का पर्सनल ईयर 1 बना। सूर्य का प्रभाव: पर्सनल ईयर 1 का भविष्य फल यदि आपकी गणना का कुल योग '1' आता है, तो यह "सूर्य का वर्ष" है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य को ग्रहों का राजा और आत्मा का कारक माना गया है। पर्सनल ईयर 1 का मतलब है कि आप एक नए 9-साल के चक्र में प्रवेश कर रहे हैं। यह समय अपनी 'ऊर्जा' (Energy) को केंद्रित करने और पुराने डर को छोड़कर नेतृत्व संभालने का है। "सूर्य महादशा में सूर्य अंतरदशा चल रही है — और यह साल जातक के लिए शुभ संकेत देता है।" यदि आपका पर्सनल ईयर 1 है, तो 2026 में आप मानसिक रूप से अधिक सशक्त महसूस करेंगे। यह साल आपके भीतर के 'संकल्प' को जगाने और सफलता की नई इबारत लिखने के लिए श्रेष्ठ है। 1 से 9 तक के अंकों का भविष्यफल नीचे देखें। 2026 में आपका पर्सनल ईयर अंक आपकी मानसिकता और परिस्थितियों को किस तरह प्रभावित करेगा, आइए विस्तार से जानते हैं: * पर्सनल ईयर 1: नई शुरुआत – यह साल नेतृत्व और आत्मविश्वास का है। मानसिक रूप से आप नए जोखिम लेने और अपनी पहचान बनाने के लिए पूरी तरह तैयार रहेंगे। * पर्सनल ईयर 2: सहयोग और संबंध – आपकी मानसिकता दूसरों के प्रति संवेदनशील रहेगी। यह साल अकेले चलने का नहीं, बल्कि साझेदारी और रिश्तों में तालमेल बिठाने का है। * पर्सनल ईयर 3: क्रिएटिविटी – आपकी रचनात्मक ऊर्जा चरम पर होगी। आप खुद को अभिव्यक्त करने के नए तरीके खोजेंगे और सामाजिक दायरे में आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी। * पर्सनल ईयर 4: मेहनत – यह अनुशासन का साल है। आपकी सहनशक्ति की परीक्षा होगी; ध्यान रखें कि इस साल कोई भी शॉर्टकट काम नहीं आएगा, केवल ठोस योजना ही सफल होगी। * पर्सनल ईयर 5: बदलाव – जीवन में अनपेक्षित मोड़ आ सकते हैं। आप मानसिक रूप से स्वतंत्रता और रोमांच की तलाश में रहेंगे, जिससे यात्रा या करियर में बड़े बदलाव संभव हैं। * पर्सनल ईयर 6: परिवार और जिम्मेदारी – आपका ध्यान घर और अपनों पर केंद्रित रहेगा। यह अपनी जिम्मेदारियों को निभाने और पारिवारिक सुख-शांति को प्राथमिकता देने का समय है। * पर्सनल ईयर 7: आध्यात्म – आप भीड़भाड़ से दूर एकांत की तलाश करेंगे। आत्म-चिंतन और गहन अध्ययन के लिए यह साल बेहतरीन है, जहाँ आप जीवन के गहरे रहस्यों को समझेंगे। * पर्सनल ईयर 8: धन और करियर – यह कर्मों के फल का साल है। आर्थिक उन्नति और करियर में सत्ता हासिल करने की तीव्र इच्छा आप पर हावी रहेगी; आपकी मेहनत का परिणाम धन के रूप में दिखेगा। * पर्सनल ईयर 9: समापन – यह सफाई का साल है। जो चीजें अब आपके काम की नहीं हैं (चाहे वे विचार हों या रिश्ते), उन्हें छोड़कर नए चक्र के लिए जगह बनाने की मानसिकता बनी रहेगी। अंक ज्योतिष हमें केवल भविष्य नहीं बताता, बल्कि हमें आने वाली चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है। जब आप अपनी 'अंतरदशा' को जान लेते हैं, तो आप अपनी ऊर्जा को सही दिशा में प्रवाहित कर सकते हैं। 2026 का साल हर किसी के लिए एक अलग सबक लेकर आ रहा है—चाहे वह अंक 1 की नई शुरुआत हो या अंक 8 की भौतिक सफलता। आपका पर्सनल ईयर कौन सा आया? क्या आप 2026 के इन बदलावों के लिए तैयार हैं? अपनी गणना नीचे कमेंट बॉक्स में साझा करें और हमें बताएं कि आप इस साल क्या नया शुरू करने वाले हैं। ऐसी ही सटीक ज्योतिषीय जानकारियों के लिए चैनल सबस्क्राइब करें और लाईक शेयर करें और हमारे साथ जुड़े रहें । धन्यवाद! 🙏

Thursday, 17 February 2022

त्रिक और त्रिकोण भाव की विशेषता

त्रिक भाव, त्रिकोण भाव, पनफर भाव, अपोकोलिक भाव, उपचय भाव की विशेषता क्या है.... http://asthajyotish.in ज्योतिष और वास्तु समाधान 🏠Vastu Guru_ Mk.✋ 👉WP. 9333112719
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Thursday, 25 November 2021

गायत्री मंत्र में कौन समपुष्ट मंत्र लगाने से क्या लाभ मिलेगा....

Jyotish Shastra: गायत्री मंत्र के साथ कौन सा सम्पुट लगाने पर क्या फल मिलता है, जानें... ज्योतिष और वास्तु समाधान 🏠Vastu Guru_ Mk.✋
👉WP. 9333112719 Jyotish Shastra: शास्त्रों में गायत्री मंत्र का बहुत महत्व है। मान्यता है कि गायत्री मंत्र से बड़ा कोई मंत्र नहीं है। जो व्यक्ति प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। वहीं गायत्री मंत्र के साथ सम्पुट मंत्रों का जाप करने से गायत्री मंत्र और अधिक प्रभावी हो जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि गायत्री मंत्र के साथ में कौन से सम्पुट मंत्र का जाप करना चाहिए। तो आइए जानते हैं गायत्री मंत्र के साथ कौन सा सम्पुट लगाने पर क्या फल मिलता है। Jyotish Shastra: शास्त्रों में गायत्री मंत्र का बहुत महत्व है। मान्यता है कि गायत्री मंत्र से बड़ा कोई मंत्र नहीं है। जो व्यक्ति प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। वहीं गायत्री मंत्र के साथ सम्पुट मंत्रों का जाप करने से गायत्री मंत्र और अधिक प्रभावी हो जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि गायत्री मंत्र के साथ में कौन से सम्पुट मंत्र का जाप करना चाहिए। तो आइए जानते हैं गायत्री मंत्र के साथ कौन सा सम्पुट लगाने पर क्या फल मिलता है। वैदिक गायत्री मंत्र ॐ भूर्भुव: स्व : ॐ ह्रीं तत्सवितुर्वरेण्यं ॐ श्रीं भर्गो देवस्य धीमहि ॐ क्लीं धियो यो न: प्रचोदयात ॐ नम:। ॐ भूर्भुव: स्व : ॐ ह्रीं तत्सवितुर्वरेण्यं ॐ श्रीं भर्गो देवस्य धीमहि ॐ क्लीं धियो यो न: प्रचोदयात ॐ नम:। ॐ भूर्भुव: स्व : ॐ ऐं तत्सवितुर्वरेण्यं ॐ क्लीं भर्गो देवस्य धीमहि ॐ सौ: धियो यो न: प्रचोदयात ॐ नम:। ॐ श्रीं ह्रीं ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ ऐं ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं ॐ क्लीं ॐ भर्गोदेवस्य धीमहि ॐ सौ: ॐ धियो यो न: प्रचोदयात ॐ ह्रीं श्रीं ॐ।। शास्त्रों के अनुसार वैदिक गायत्री मंत्र जपने का अधिकार उन व्यक्तियों को है जो नियमित स्नान के उपरांत संध्योपासन करते हैं और जो नहीं करते हैं वे पौराणिक गायत्री मंत्र का जाप कर सकते हैं। पौराणिक गायत्री मंत्र ह्रीं यो देव: सविताSस्माकं मन: प्राणेन्द्रियक्रिया:। प्रचोदयति तदभर्गं वरेण्यं समुपास्महे ।। सम्पुट प्रयोग गायत्री मंत्र के आसपास कुछ बीज मंत्रों का सम्पुट लगाने का भी विधान है जिनसे विशिष्ट कार्यों की सिद्धि होती है । बीज मंत्र इस प्रकार हैं। ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं मंत्र का सम्पुट लगाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। ॐ ऐं क्लीं सौ: मंत्र का सम्पुट लगाने से विद्या प्राप्ति होती है। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं मंत्र का सम्पुट लगाने से संतान प्राप्ति, वशीकरण और मोहन होता है। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं मंत्र का सम्पुट के प्रयोग से शत्रु उपद्रव, समस्त विघ्न बाधाएं और संकट दूर होकर भाग्योदय होता है। ॐ ह्रीं मंत्र इस सम्पुट के प्रयोग से रोग नाश होकर सब प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। ॐ आँ ह्रीं क्लीं मंत्र इस सम्पुट के प्रयोग से पास के द्रव्य की रक्षा होकर उसकी वृद्धि होती है तथा इच्छित वस्तु की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार किसी भी मंत्र की सिद्धि और विशिष्ट कार्य की शीघ्र सिद्धि के लिए भी दुर्गा सप्तशती के मंत्रों के साथ सम्पुट लगा देने का भी विधान है। गायत्री मंत्र समस्त मंत्रों का मूल है तथा यह आध्यात्मिक शान्ति देने वाले हैं। गायत्री शताक्षरी मंत्र ॐ भूर्भुव: स्व : तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात। ॐ जातवेदसे सुनवाम सोममराती यतो निदहाति वेद:। स न: पर्षदतिदुर्गाणि विश्वानावेव सिंधु दुरितात्यग्नि:। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्धनम। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात। शास्त्र में कहा गया है कि गायत्री मंत्र जपने से पहले गायत्री शताक्षरी मन्त्र की एक माला अवश्य कर लेनी चाहिये। माला करने पर मंत्र में चेतना आ जाती है। (Disclaimer: इस स्टोरी में दी गई सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं। इनकी पुष्टि नहीं करता है। इन तथ्यों को अमल में लाने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)https://sites.google.com/view/asthajyotish

Tuesday, 21 September 2021

व्यापार वृद्धि उपाय लाल मिर्च द्वारा

 व्यापार वृद्धि के लिए लाल मिर्च से करें यह उपाय, मिलेगा बरदस्त लाभ 🔯


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हमारे जीवन कई बार ऐसी समस्याएं आ जाती है जिनसे बाहर

निकलने के लिए हमें कई मशक्कतें करनी पड़ती है, उसके

बावजूद भी हम उससे निजात नहीं पात।


ऐसी समस्याओं का समाधान आसान नहीं होता। आप काफी

विचार और कोशिशों के बाद भी इन समस्याओं से बाहर नहीं

निकल पाते।


लेकिन तांत्रिक इस चीज़ का दावा करते हैं कि टोने-टोटकों से

बड़ी से बड़ी समस्या का हल निकाला जा सकता है। आज हम

आपको ऐसे ही टोटकों के बारे में बताएंगे जिनका प्रयोग करने से

आपके लिए लाभदायक साबित होगा।


ज्योतिषशास्त्र के अनुसार लाल मिर्च के साथ कुछ उपाय करने

से आपके रुके हुए कार्य बनने लगते हैं। जी हां लालमिर्च आपके

खाने का स्वाद तो बढ़ाती ही है बल्कि उसके साथ साथ यह

आपकी किस्मत भी चमका सकती है।


आपको बतादें कि इन उपायों में कुछ टोटके हैं और कुछ लोक

मान्यताओं पर आधारित टोटके। इन टोटकों को लोग कई सालों

से करते आए हैं, जो आज भी चले आ रहे हैं।

भूत-प्रेत से बचने के लिए

यदि किसी भी व्यक्ति पर भूत-प्रेत का साया है ऐसा लगने पर

पीली सरसों कुछ दाने उसके ऊपर से उतारकर, जला दें। ऐसा

करने से उस व्यक्ति पर असर कर रही सभी नकारात्मक शक्तियों

का असर खत्म हो जाता है।

शत्रु को मित्र बनाने के लिए

यदि आपको कोई शत्रु परेशान कर रहा है तो पीली सरसों के तेल

में हल्दी मिलाएं। और उस तेल का दीपक जलाकर 'ऊं बगलायै

नमः' मंत्र का जप करें। ऐसा लगातार एक हफ्ते तक करने से

व्यक्ति शत्रुता का व्यवहार छोड़कर आपसे मित्रवत व्यवहार करने लगेगा।

व्यापार में वृद्धि के लिए

व्यापार में वृद्धि करने के लिए मिट्टी के तीन दीपक में पीली सरसों के दाने, तिल, साबुत नमक और साबुत धनिया मिलाकर अपने व्यापार स्थल पर रख दें। इससे व्यापार में वृद्धि होने को साथ-साथ ग्राहकों पर भी असर दिखाई देगा।

अटके हुए काम पूरे करने के लिए

यदि किसी सरकारी उद्योग या विभाग में आपको कोई काम अटक गया है और आप उसके नहीं होने से परेशान हैं तो पीली सरसों को आक के दूध में मिलाकर हवन करें। हवन करने के बाद देखेंगे कि आपको फायदा होने लगा।

गृह क्लेश खत्म करने के लिए

जिस घर में रोज़-रोज़ लड़ाई झगड़े होते है, उस घर में लक्ष्मी का वास नहीं होता।

क्लेश दूर करने के लिए पीली सरसों में गुड़, शहद, गाय का घी, चंदन, गूग्गल, शिलाजीत, सलई की धूप तथा नागरमोथा मिलाकर हवन करें। ऐसा करने से सुख-शांति का माहौल बन जाता है।

और जादा जानकारी और समाधान और उपाय या भविष्य फल या रत्न विश्लेषण या वास्तुदोष सम्बन्धित या शारीरिक रोग या प्रेम विवाह लव मैरिज अरेंज मैरिज कोर्ट मैरिज या कुंण्डली विश्लेषण के लिए सम्पर्क करे।

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Sunday, 15 August 2021

कैंसर रोग और कारक ग्रह

 किस ग्रह के कारण कैंसर रोग होते हैं

ग्रह और कैंसर रोग  
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निरोगी शरीर का अर्थ है शरीर का रोग से रहित होना ।रोग दो प्रकार के होते है एक- साध्य रोग जो कि उचित उपचार, आहार,व्यबहार ठीक हो जाते हैं दूसरे – असाध्य रोग जो कि उपचार के बाद भी व्यक्तिओं का पीछा नही छोडते है. इन्ही असाध्य रोगों मे अधिकाश रोग जिन्दगी भर साथ रहते है तथा उचित उपचार के साथ जिन्दगी के लिये घातक नही होते हैं परन्तु दो असाध्य रोग ऐसे है जिनका कोई उपचार नही है तथा वे दोनो रोगी की जान लेकर ही रहते हैं वे दो रोग हैं 01.–कैंसर02.–एड्स.
इस आलेख मे हम कैंसर रोग के ज्योतिषीय पहलू का विवेचन करने का प्रयास करते है।
 आइये पहले यह जाने कि कैंसर रोग क्या है ??
आयुर्वेद के अनुसार त्वचा की छठी परत जिसे आयुर्वेद मे रोहिणी कहते है जिसका संस्कृत मे अर्थ है कोशिकाओं की रचना. जब ये कोशिकाये क्षतिग्रस्त होती हैं तो शरीर के उस हिस्से मे एक ग्रन्थि बन जाती है इस ग्रन्थि को असमान्य शोथ भी कहती है.जिसे आयुर्वेद मे बिभिन्न स्थान और प्रकार के नामों से जाना जा ता है जैसे: अर्बुद, गुल्म, शालुका आदि. जब ये शोथ त्रिदोषों (वात,पित्त,कफ) के नियंत्रण से परे हो जाते हैं . तब यह ग्रन्थि कैंसर क रूप ले लेती हैं
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार ज्योतिष पूर्वजन्म के किये हुए कर्मो का आधार है अर्थात हम ज्योतिष द्वारा ज्ञात कर सकते हैं कि हमारे पूर्वजन्म के किये हुए कर्मो का परिणाम हमे इस जन्म मे किस प्रकार प्राप्त होगा ज्योतिर्विग्यान के अनुसार कोई भी रोग पूर्व जन्मकृत कर्मों का ही फल होता है. ग्रह उन फलों के संकेतक हैं, ज्योतिष विग्यान कैंसर सहित सभी रोगों की पहचान मे बहुत ही सहायक होता है. पहचान के साथ –साथ यह भी मालूम किया जा सकता है कि कैंसर रोग किस अवस्था मे होगा तथा उसके कारण मृत्यु आयेगी या नही, यह सभी ज्योतिष द्वारा सटीक जाना जा सकता है
वर्तमान समय में कैंसर सर्वाधिक भयप्रद बीमारी के रुप में चर्चित है । वैज्ञानिकों की लाख चेष्टा के बावजूद अभी तक इसका समुचित उपचार ढूढ़ा नहीं जा सका है । थोड़े-बहुत जो भी उपचार हैं, वो बहुत ही अर्थ साध्य हैं और पूरे तौर पर सुनिश्चित भी नहीं हैं । समुचित उपचार का अभाव ही रोग को अधिक भयावह बना दिया है । रोग का निश्चय हो जाना, मृत्यु घोषित हो जाने जैसा है । सबसे बड़ी बात ये होती है कि प्रायः घोषणा ही तब होती है जब रोग चौथे स्तर में पहुँच चुका होता है । फलतः उपचार के लिए समुचित समय भी नहीं मिल पाता ।
मानव शरीर में कैंसर की उत्पत्ति में कोशिकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कोशिकाओं में श्वेत एवं लाल रक्त कण होते हैं। ज्योतिष में श्वेत रक्त कण का सूचक कर्क राशि का स्वामी चंद्र तथा लाल रक्त कण का सूचक मंगल है। कर्क राशि का अंग्रेजी नाम कैंसर है तथा इसका चिह्न केकड़ा है। केकड़े की प्रकृति होती है कि वह जिस स्थान को अपने पंजों से जकड़ लेता है, उसे अपने साथ लेकर ही छोड़ता है। इसी प्रकार कोशिकाएं मानव शरीर के जिस अंग को अपना स्थान बना लेती है उसे शरीर से अलग करके ही कोशिकाओं को हटाया जाता है। इसलिए ज्योतिष में कैंसर जैसे भयानक रोग के लिए कर्क राशि के स्वामी चंद्र का विशेष महत्व है। इसी प्रकार रक्त में लाल कण की कमी होने पर प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ जाती है। 
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि वैदिक ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार कोई भी रोग पूर्व जन्मकृत कर्मों का ही फल होता है। ग्रह उन फलों के संकेतक हैं, ज्योतिष विज्ञान कैंसर सहित सभी रोगों की पहचान में सहायक होता है। पहचान के साथ-साथ यह भी मालूम किया जा सकता है कि कैंसर रोग किस अवस्था में होगा तथा उसके कारण मृत्यु आयेगी या नहीं, यह सभी ज्योतिष विधि द्वारा जाना जा सकता है |
इस रोग के होने में ग्रहों के साथ भाव भी पीड़ित होना चाहिए। फिर दशा/अन्तर्दशा का आंकलन किया जाना चाहिए, उसके बाद अंत में गोचर देखा जाना चाहिए |कैंसर एक लम्बी अवधि तक होने वाला रोग हैं. इसलिए छ्ठे भाव व अष्टम भाव का संबंध बनना आवश्यक है क्योकि छठा भाव रोग और आठवाँ भाव लम्बी अवधि तक होने वाले रोग हैं. शनि और राहु लम्बे समय तक चलने वाले रोगो की सूचना देते हैं. इसलिए इन दोनो ग्रहों की भूमिका भी कैंसर रोग के होने में मुख्य होती है।
कैंसर रोग का संबंध राहु, पीड़ित चंद्रमा, पीड़ित बृहस्पति या शनि से होता है और यह मेष, वृष, कर्क, तुला और, मकर राशियों से संबंधित होता है. किसी व्यक्ति की कुण्डली में चंद्रमा जब षष्ठेश या अष्टमेश होकर पीड़ित होता है और साथ ही दशा भी प्रतिकूल चल रही हो तब व्यक्ति को कैंसर रोग होने की संभावना बनती है.|शनि असाध्य एवं भयानक लंबे समय तक चलने वाले रोगों का परिचालक है। इसके संयोग से अधिक इसकी दृष्टि पीड़ादायक है।शरीर में किसी भी प्रकार की रसौली जल से होता है। अत: जल राशियों कर्क, वृश्चिक और मीन। ये जल राशियां हैं। इनके पाप ग्रस्त होने पर कैंसर की संभावना प्रबल होती है |
जन्म कुंडली में जब एक भाव पर ही अधिकतर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है, विशेषकर शनि, राहु व मंगल से तब उस संबंधित भाव वाले अंग में कैंसर होने की संभावना बनती है. जन्म कुंडली में यदि नेप्च्यून व यूरेनस आमने-सामने हो तब इसे अत्यधिक अशुभ माना जाता है और यह बहुत ही घातक परिणाम देने वाले सिद्ध हो सकते हैं। 
यदि जन्म कुंडली में दशानाथ पीड़ित होता है तब इस रोग के होने की संभावना अधिक होती है। कैंसर रोग जिस दशा में होता है, उसके बाद आने वाली दशाओं का आंकलन किया जाना चाहिए. यदि यह दशाएँ शुभ ग्रहों की है या अनुकूल ग्रह की है या योगकारक ग्रह की दशा आती है तब रोग का पता आरंभ में ही चल जाता है और उपचार भी हो जाता है.
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए भले ही कैंसर एक नयी बीमारी हो, किन्तु भारतीय विज्ञान- आयुर्वेद और ज्योतिषशास्त्र के लिए बिलकुल नया नहीं है । आयुर्वेद में कर्कटार्बुद नाम से विशद वर्णन है इस व्याधि का और समुचित चिकित्सा भी सुझायी गयी है । इसी भांति ज्योतिष में भी इसकी पर्याप्त चर्चा है । किन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि हमें अपने शास्त्रों पर भरोसा नहीं है । इसे पढ़ने, जानने, अनुसंधान करने में उतनी अभिरुचि नहीं है, जितनी पाश्चात्य पद्धतियों में । ये भी सोलह आने सच है कि हमारे शास्त्रीय विज्ञान को वर्बरता पूर्वक विदेशियों द्वारा नष्ट-भ्रष्ट किया गया है । खेद है कि आज भी वही काम , पहले से भी कहीं बढ़-चढ़कर स्वदेशियों द्वारा जारी है ।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राहु-केतु जिन भावों में होते हैं, उनसे संबंधित अंगों में कैंसर की आशंका होती है। इसके अतिरिक्त इनकी जिन ग्रहों से युति हो उनसे संबंधित अंगों में भी कैंसर होने की संभावना अधिक होती है। इनके अलावा भी जन्म कुंडली में कुछ दोष होने पर कैंसर हो सकता है। ये उपाय करें ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुंडली में स्थित जिन ग्रहों के कारण कैंसर होने की संभावना बन रही है, उन ग्रहों से संबंधित ज्योतिषिय उपाय करें व उन ग्रहों के जप पूर्ण विधि-विधान से करें। उपरोक्त उपाय करने से कैंसर होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं अथवा कैंसर होने पर भी इसका समुचित उपचार हो जाता है।

कैंसर के मुख्य कारक ग्रह मंगल, शनि, राहु, केतु एवं यूरेनस हैं। खासकर केतु एवं यूरेनस जब शनि, मंगल एवं राहु को अशुभ रूप से प्रभावित करते हैं तो कैंसर रोग होता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि राहु ग्रह का कुंडली के छठे भाव पर बुरे प्रभाव से रोग उत्पन्न होते हैं।


 
सर्वविदित है कि ज्योतिषशास्त्र पूर्वानुमान और सुनिश्चय का शास्त्र है । इसका सहारा लेकर यदि विचार करें तो समय से बहुत पहले ही स्थिति ज्ञात हो जा सकती है और तदनुरुप समुचित उपचार भी कर सकते हैं । आज इसी आलोक में अर्बुदकर्कट / कर्कटार्बुद पर विचार करते हैं ।
ज्योतिर्विग्यान के अनुसार कोई भी रोग पूर्व जन्मकृत कर्मों का ही फल होता है. ग्रह उन फलों के संकेतक हैं, ज्योतिष विज्ञान, सहित सभी रोगों की पहचान मे बहुत ही सहायक होता है. पहचान के साथ –साथ यह भी मालूम किया जा सकता है कि कैंसर रोग किस अवस्था मे होगा तथा उसके कारण मृत्यु आयेगी या नही, यह सभी ज्योतिष द्वारा सटीक जाना जा सकता है केंसर या कर्क रोग की पहचान निम्न ज्योतिषीय योग होने पर बडी आसानी से की जा सकती है—
रोग होने की स्थिति में जन्म कुंडली के साथ नवांश कुंडली, षष्टियाँश कुंडली और अष्टमांश कुंडली का भी भली-भाँति विश्लेषण करना चाहिए उसके बाद किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए। राहु को कैंसर का कारक माना गया है लेकिन शनि व मंगल भी यह रोग देते हैं. गुरु को वृद्धि का कारक ग्रह माना जाता है और कैंसर शरीर के किसी अंग में अवांछित वृद्धि से ही होता है और साथ ही यदि यह षष्ठेश या अष्टमेश होकर पीड़ित है तब कैंसर की संभावना बनती है। योगानुसार निम्न योग कैंसर कारक हो सकते हैं…
1. राहु को विष माना गया है यदि राहु का किसी भाव या भावेश से संबंध हो एवं इसका लग्न या रोग भाव से भी सम्बन्ध हो तो शरीर में विष की मात्रा बढ़ जाती है।
2. षष्टेश लग्न, अष्टम या दशम भाव मे स्थित होकर राहु से दृष्ट हो तो कैंसर होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
3. बारहवें भाव में शनि-मंगल या शनि-राहु, शनि-केतु की युति हो तो जातक को कैंसर रोग देती है।
4. राहु की त्रिक भाव या त्रिकेश पर दृष्टि हो भी कैंसर रोग की संभावना बढ़ाती है।
5. षष्टम भाव तथा षष्ठेश पीडि़त या क्रूर ग्रह के नक्षत्र में स्थित हो।
6. बुध ग्रह त्वचा का कारक है अत: बुध अगर क्रूर ग्रहों से पीडि़त हो तथा राहु से दृष्ट हो तो जातक को कैंसर रोग होता है।
7. बुध ग्रह की पीडि़त या हीनबली या क्रूर ग्रह के नक्षत्र में स्थिति भी कैंसर को जन्म देती है।
बृहत पाराशरहोरा शास्त् के अनुसार षष्ठ पर क्रूर ग्रह का प्रभाव स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद होता है यथा ”रोग स्थाने गते पापे , तदीशी पाप….. अत: जातक रोगी होगा और यदि षष्ठ भाव में राहु व शनि हो तो असाध्य रोग से पीडि़त हो सकता है।
8.सभी लग्नो में कर्क लग्न के जातकों को सबसे ज्यादा खतरा इस रोग का होता है|
9.कर्क लग्न में बृहस्पति कैसर का मुख्य कारक है, यदि बृहस्पति की युति मंगल और शनि के साथ छठे, आठवे, बारहवें या दूसरे भाव के स्वामियों के साथ हो जाये व्यक्ति की मृत्यु कैंसर के कारण होना लगभग तय है|
10.शनि या मंगल किसी भी कुंडली में यदि छठे या आठवे स्थान में राहू या केतु के साथ हों तो कैंसर होने की प्रबल सम्भावना होती है|
11.छठे भाव का स्वामी लग्न, आठवे या दसवे में भाव में बैठा हो और पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो भी कैंसर की प्रबल सम्भावना होती है|
12.किसी जातक की कुंडली में सूर्य यदि छठे, आठवे या बढ़ावे भाव में पाप ग्रहों के साथ हो तो जातक को पेट या आंतों में अल्सर और कैंसर होने की प्रबल सम्भावना होती है|
13.किसी जातक की कुंडली में यदि सूर्य कही भी पाप ग्रहों के साथ हो और लग्नेश या लग्न भी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो भी कैंसर की प्रबल सम्भावना रहती है|
14.कमज़ोर चंद्रमा पापग्रहों की राशी में छठे, आठवे या बारहवे हो और लग्न अथवा चंद्रमा, शनि और मंगल से दृष्ट हो तो अवश्य ही कैंसर होता है|
15. चंद्रमा व शनि छठे भाव में स्थिति है तब व्यक्ति को पचपन वर्ष की उम्र पार करने के बाद रक्त कैंसर हो सकता है.
16. आश्लेषा नक्षत्र, लग्न या छठे भाव से संबंधित होने पर और मंगल से पीड़ित होने पर कैंसर होने की संभावना बनती है.
17. शनि छठे भाव में राहु के नक्षत्र में स्थित हो और पीड़ित हो तब कैंसर रोग की संभावना बनती है.
18. शनि और मंगल की युति छठे भाव में आर्द्रा या स्वाति नक्षत्र में हो रही हो.तो कैंसर की संभावना बनती है |
19. मंगल और राहु छठे या आठवें भाव को पीड़ित कर रहे हों तब त्वचा का कैंसर हो सकता है.
20. छ्ठे भाव में मेष राशि हो या स्वाति या शतभिषा नक्षत्र पड़ रहा हो और शनि छठे भाव को पीड़ित कर रहा हो तब त्वचा कैंसर का रोग हो सकता है.
21. जन्म कुंडली में राहु या केतु लग्न में षष्ठेश के साथ हो तो पेट का कैंसर हो सकता है |
22. छठा भाव पीड़ित हो और राहु या केतु, आठवें या दसवें भाव में स्थित हो तो पेट का कैंसर हो सकता है |
23. यदि किसी जातिका की कुण्डली में लग्नेश अष्टम, षष्टम अथवा द्वाद्श में चला गया हो, लग्न स्थान पर क्रूर व पापी ग्रहों की स्थिति हो, चतुर्थ स्थान का अधिपति शत्रुगृही होकर पीड़ित हो, छठे भाव का अधिपति चतुर्थेश से संबंध बना रहा हो तो ऐसी स्थिति में जातिका को ब्रेस्ट कैंसर या स्तनों में बड़े विकार की संभावना प्रबल रूप से मौज़ूद होती है।
24. छठे भाव में कर्क अथवा मकर राशि का शनि स्तन कैंसर का संकेत देता है।
25. छठे भाव में कर्क या मकर का मंगल स्तन कैंसर का द्योतक है।
26. यदि छठे भाव का स्वामी पाप ग्रह हो और लग्नेश आठवें या दसवें घर में बैठा हो तो कैंसर रोग की आशंका रहती है।
27. छठे भाव में कर्क राशि में चंद्रमा हो, तब भी कैंसर का द्योतक है।
28. चंद्रमा से शनि का सप्तम होना कैंसर की संभावना को प्रबल बनाता है।
इनके अतिरिक्त ज्योतिष रत्न के पाठ 24 के अनुसार—
१. राहु को विष माना गया है यदि राहु का किसी भाव या भावेश से संबन्ध हो एवम इसका लग्न या रोग भाव से भी सम्बन्ध हो तो शरीर मे विष की मात्रा बढ जाती है
२. षष्टेश लग्न ,अष्टम या दशम भाव में स्थित होकर राहु से दृष्ट हो तो कैंसर होने की सम्भावना बढ जाती है
३. बारहवे भाव मे शनि-मंगल या शनि –राहु,शनि-केतु की युतिहो तो जातक को कैंसर रोग देती है.
४. राहु की त्रिक भाव या त्रिकेश पर दृष्टि हो भी कैंसर रोग की संभावना बढाती है.
इनके अलावा निम्न बिन्दु भी कैसर रोग की पह्चान के लिये मेरे अनुभव सिद्ध है
१ षष्टम भाव तथा षष्ठेश पीडित या क्रूर ग्रह के नक्षत्र मे स्थित हो
२ बुध ग्रह त्वचा का कारक है अतः बुध अगर क्रूर ग्रहो से पीडित हो तथा राहु से दृष्ट हो तो जातक को कैसर रोग होता है
३ बुध ग्रह की पीडित या हीनबली या क्रूर ग्रह के नक्षत्र मे स्थिति भी कैंसर को जन्म देती है
बृहत पाराशरहोरा शास्त् के अनुसार षष्ठ पर क्रूर ग्रह का प्रभाव स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद होता है यथा ” रोग स्थाने गते पापे , तदीशी पाप..
अतः जातक रोगी होगा और यदि षष्ठ भाव में राहु व शनि हो तो असाध्य रोग से पीडित हो सकता है
कैंसर नाम की एक राशि होती है, जिसे भारतीय ज्योतिष में कर्कराशि कहते हैं । मेषादि राशिक्रम में इसका स्थान चौथा है । इसके स्वामी चन्द्रमा हैं । स्वभाव से यह चर राशि है । कालपुरुष के हृदय का प्रतिनिधित्व करती है ये राशि, फलतः जातक के हृदय से इसका विशेष सम्बन्ध माना जाता है । लग्नादि क्रम से चतुर्थ भाव को कर्क का प्रतिनिधित्व मिला है । अतः भले ही किसी जातक का जन्मलग्न कोई भी हो, उसके चतुर्थ भाव का विचार कर्करोग (कैंसर) विचार के सम्बन्ध में अवश्य करना चाहिए । साथ ही ये भी देखना चाहिए कि कर्कराशि जातक की कुण्डली में किस भाव में पड़ी हुयी, यानी कि जातक का जन्मलग्न क्या है ।  
जन्मांकचक्र के चतुर्थ भाव में राहु की अवस्थिति हो, अथवा कर्कराशि पर आरुढ़ होकर राहु किसी भी भाव में विराज रहा हो तो कर्करोग होने की सर्वाधिक आशंका जतायी जा सकती है । साथ ही ये भी देखना चाहिए कि चतुर्थ भाव और इसका भावेश किसी न किसी तरह यदि राहु से प्रभावित – दृष्ट, पीड़ित हो तो कर्करोग की आशंका जतायी जा सकती है । राहु की पूर्ण दृष्टिभोग के सम्बन्ध में अन्यान्य ग्रहों से किंचित भिन्न मत पर ध्यान देना चाहिए ।
यथा—सुत मदन नवान्ते पूर्ण दृष्टिं तमस्य , युगल दशम गेहे चार्द्ध दृष्टिं वदन्ति । सहज रिपु पश्यन् पाददृष्टिं मुनीन्द्राः , निज भुवन मुपेतो लोचनांधः प्रदिष्टः ।।  
(पंचम,सप्तम,नवम- पूर्ण दृष्टि, द्वितीय और दशम- अर्द्ध दृष्टि, तृतीय और षष्ठम पाद दृष्टि तथा स्वगृह(कन्या राशि पर)राहु लोचनांध होते हैं । )
 चतुर्थ भावपति का नीचस्थ वा शत्रुक्षेत्रस्थ होने पर भी कर्करोग की स्थिति हो सकती है । इन स्थितियों के अतिरिक्त चन्द्रमा, शनि, मंगल, सूर्य आदि का भी गम्भीरता से विचार अवश्य कर लेना चाहिए । क्यों कि उक्त ग्रहों की स्थिति, युति, दृष्टि आदि का सीधा प्रभाव पड़ता है रोग की स्थिति, मात्रा और अंग वा प्रकार पर । जैसे मंगल की विकृति से ब्लडकैंसर का खतरा हो सकता है । बुध की विकृति से ग्रन्थियों का बाहुल्य रहेगा इत्यादि 
मुख्यतः लोग षष्ठम भाव से रोग का विचार करते हैं, किन्तु इसके अतिरिक्त प्रथम, अष्टम व द्वादश भाव का भी गहन विचार करना चाहिए । साथ ही द्वितीय एवं सप्तम भाव को मारकेशत्व प्रधान होने के कारण इनपर भी विचार अवश्य करना चाहिए । रोग की साध्यासाध्यता की जानकारी हेतु सूर्य के बलाबल का ध्यान देना आवश्यक है । प्रभावी (जिम्मेवार) ग्रह (रोगकारक) की महादशा, अन्तर्दशादि के समय रोग की उग्रता समझनी चाहिए । मारकेशत्वों के बलाबल से साध्यासाध्यता की पहचान की जा सकती है ।
समझें केंसर के उपचार और उपाय को–
जन्म कुंडली में भावों के अनुसार शरीर से संबंधित ग्रहों के रत्नों का धारण करने से रोग-मुक्ति संभव होती है। लेकिन कभी-कभी जिसके द्वारा रोग उत्पन्न हुआ है, उसके शत्रु ग्र्रह का रत्न धारण करना भी लाभप्रद होता है। इसका आकलन किसी नीम हकीम ज्योतिषी से करवाना घातक हो सकता है |जिसे बहुत गंभीर समझ हो उसकी ही सलाह इस रोग में लेनी चाहिए और ज्योतिषीय उपाय करने चाहिए।
एक बात बहुत स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि मात्र ज्योतिषीय मंत्र-तंत्र-यंत्र से ही किसी रोग का निवारण नहीं किया जा सकता है।क्योकि ग्रह स्थितियों को सुधारकर भी आप शरीर में आये भौतिक परिवर्तन को नहीं बदल सकते |दूध जब तक दूध है तभी तक उसे बचा सकते हैं ,दही बनने पर वह दूध नहीं हो सकता वापस |इसलिए मात्र ज्योतिषीय उपायों के बल पर बैठना घातक होगा |
तंत्र मंत्र की सीमा वहां तक है की रोगी में सकारात्मक ऊर्जा ,धनात्मक ऊर्जा बढ़ा देंगे जिससे लड़ने की क्षमता बढ़ जाए |भाग्य अगर किन्ही नकारात्मक ऊर्जा के कारण बाधित है अथवा नकारात्मक ऊर्जा रोग बढ़ा रही है तो उसे तंत्र मंत्र हटा देंगे |जीवनी शक्ति बढ़ा देंगे ,पर रोग हो गया तो उसे केवल इनसे ख़त्म करना मुश्किल है। 
ज्योतिषीय उपाय ,तंत्र मंत्र के साथ अवचेतन को बल देना बेहतर होता है क्योकि अंततः सारा खेल अवचेतन को ही करना होता है अगर यह निराश हताश हुआ तो फिर न दवा काम करेगी न कोई उपाय | इन सभी के साथ-साथ औषधि सेवन, चिकित्सकों के द्वारा दी गई सलाह आदि का पालन किया जाना उतना ही आवश्यक है। तभी इसका पूर्ण लाभ उठाया जा सकता हैै। अगर समय से पूर्व किसी भी घटना या दुर्घटना के बारे में जानकारी हो जाये तो उससे बचने का हर संभव प्रयास किया जा सकता है पर दुर्घटना होने के बाद मुश्किल हो जाती है।
स्तन कैंसर के ज्योतिषीय कारण –आखिर ब्रेस्ट कैंसर होता क्यों है ??
इसका जवाब जब आप ज्योतिष से जानने की कोशिश करेंगे तो आपको आसानी होगी।
क्या स्तन कैंसर का कोई ज्योतिषीय कारण भी हो सकता है? विज्ञान इसे खारिज कर सकता है परंतु सदियों पुराने ज्योतिष शास्त्र में इस व्याधि की ओर भी संकेत किया गया है।
जातक की कुंडली के कई योग बताते हैं कि अगर वे प्रभावशाली हो जाएं तो स्तन कैंसर जैसा रोग उत्पन्न हो सकता है। जानिए कारण और निवारण के बारे में।
यदि लग्नेश स्वस्थान से आठवें, छठे या बारहवें भाव में चला गया हो एवं लग्न के स्थान पर क्रूर ग्रह बैठे हों तो, चौथे स्थान का स्वामी शत्रु के घर में विराजमान हो और छठे का मालिक चौथे से संबंध बनाए तो संभव है कि उस महिला को स्तन संबंधी कोई बड़ा रोग हो जाए। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि यदि किसी महिला की कुंडली का लग्न कमजोर हो, उस पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि हो अथवा वहां ऐसे ग्रह विराजमान हों जो शुभ फल देने में सक्षम न हों तो रोगी होने की आशंका प्रबल होती है। 
अगर उसके साथ ही छठा भाव भी श्रेष्ठ परिणाम न देने वाला हो, चंद्र की स्थिति प्रभावी न हो तो महिला को स्तन कैंसर हो सकता है।
अगर महिला की कुंडली में छठे या आठवें भाव में कोई क्रूर ग्रह स्थित हो तो उसे असाध्य रोग होने की आशंका होती है। 
वहीं चतुर्थ भाव में क्रर ग्रहों का योग सीने में दर्द एवं बड़े रोगों की ओर इशारा करता है। अगर समय रहते उनका इलाज नहीं कराया तो स्थिति बेकाबू हो सकती है।
ऐसे में रोगी महिला को अपने खानपान पर पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। स्वस्थ जीवनशैली की आदत डालते हुए योग, ध्यान, प्राणायाम आदि करने चाहिए। इससे वह इस स्तन कैंसर के संकट को टाल सकती है।
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Saturday, 7 August 2021

हर मुसीबत से छुटकारा दिलाने के टोटके

 हर मुसीबत से छुटकारा दिलाने वाले टोटके


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार व्यक्ति की रक्षा के लिए अनंत काल से रक्षा सूत्र, रक्षा कवच, रक्षा रेखा, रक्षा यंत्र आदि का उपयोग होता आया है। यह सदैव दुर्भिक्षों, अनहोनी घटनाओं, कुदृष्टि, मारण, उच्चाटन, विद्वेषण आदि तांत्रिक प्रयोगों से गुप्त रूप से सुरक्षा का काम करते रहे हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस रक्षा-सुरक्षा क्रम-उपक्रम में ही कीलन का उपयोग देखने को मिलता है।


तांत्रिक विद्या के अनुसार भांति-भांति की कीलों से तंत्र क्रियाओं द्वारा किसी स्थान को कीलने से अर्थात है वहां पर सुरक्षा कवच को स्थापित करना। बताया जाता है कीलन सुरक्षा की दृष्टि से तो किया ही जाता है परंतु इसके विपरीत ईर्ष्या-द्वेष, अनहित की भावना, शत्रुवत व्यवहार आदि के चलते भी स्थान का कीलन कर दिया जाता है।


कहने का मतलब है कि कीलन से अर्थ है सुरक्षा कवच। बांधने की क्रिया अर्थात किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान को सुरक्षा कवच में बाधने को कीलन या स्तम्भन कहते हैं। तो वहीं बंधे हुए को मुक्त करवाने की क्रिया को उत्कीलन कहा जाता है।


तंत्र विद्या की मानें तो कीलन सकारात्मक और नकारात्मक दो प्रकार से प्रयोग में लिए जाते हैं, उदाहरण:- किसी के काम से अन्य लोगों को हानि हो रही हो तो कीलन की विशेष प्रक्रिया द्वारा उसके काम को रोक दिया जाता है या दूसरे शब्दों में कहे तो कील दिया जाता है या स्तम्भित कर दिया जाता है।


साधना विधि-

इस मंत्र की साधना आप कभी भी शुरू कर सकते है। कीलन मंत्र साधना के लिए मंगलवार या शनिवार अच्छा रहता है। इस मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला से करने से इसका प्रभाव ओर बढ़ जाट है। आपको रोजाना दिन में एक बार इसका जाप करना होता है। पूर्व की तरफ मुख करके रुद्राक्ष की माला से किसी भी आसन का उपयोग कर इसका जप करें। कीलन मंत्र जपने के वक्त दो अगरबत्ती,कुछ पुष्प और कोई सी भी मिठाई पास रखनी चाहिए। इस तरह करने से कीलन मंत्र सिद्ध हो जाता है। ध्यान रहे जब भी किसी साधना को शुरू करना हो तो कीलन मंत्र का केवल 11 बार मंत्र जप करें। ऐसा करने से आपके सभी विघ्न, बाधाओं से रक्षा मिलेगी।


कीलन मंत्र-👉👉👉

*सिल्ली सिद्धिर वजुर के ताला, सात सौ देवी लूरे अकेला, धर दे वीर,पटक दे वीर,पछाड़ दे वीर, अरे-अरे विभीषण बल देखो तेरा, शरीर बाँध दे मेरा, मेरी भक्ति,गुरु की शक्ति, फुरो मंत्र ,इश्वरो वाचा!


*आस कीलूं पास कीलूं, कीलूं अपनी काया जागदा मसान कीलूं बैठी कीलूं छाया इसर का कोट बर्मा की थाली मेरे घाट पिंड का हनुमान वीर रखवाला!


*हनुमन् सर्वधर्मज्ञ, सर्वकार्य विधायक। अकस्मादागतोत्पातं नाशयाशु नमोऽस्तुते।।🕉️


कहा जाता है जो व्यक्ति पर भूत-प्रेत या जादू टोने या अभिचार कर्म से ग्रसित हो उसक हित के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है। इसके अलावा इस मंत्र का प्रयोग किसी मकान अथवा व्यापारिक प्रतिष्ठान पर जिसको किसी शत्रु ने बांध दिया हो, उसके बंधन को तोड़ने के लिए इस मंत्र अति प्रभावशाली सिद्ध होता है। ज्यादा प्रभावशाली बनाने के लिए लगातार 11 दिन तक प्रतिदिन इस मंत्र का 3000 बार जप करें।

👉👉👉

*सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याऽखिलेश्वरी। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ।।🕉️

 श्री दुर्गा सप्तशती का यह मंत्र अत्यन्त प्रभावशाली है।

Monday, 26 July 2021

नक्षत्र और उनके प्रकार शुभ/अशुभ कार्य

 स्वभाव के आधार पर नक्षत्रों को सात श्रेणियों में बाँटा गया है :

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१. स्थिर नक्षत्र : रोहिणी, उत्तर-फाल्गुनी,उत्तरा-आषाढ़, उत्तरा-भाद्रपद,(४,१२,२१,२६) ये चार नक्षत्र स्थिर होते हैं | भवन निर्माण, कृषि कार्य, ग्रह प्रवेश, नौकरी ज्वायन करना, उपनयन संस्कार आदि के लिए शुभ होते हैं |
२. चर(चंचल) नक्षत्र : पुनर्वशु, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा,(७,१५,२२,२३,२४,) ये पांच नक्षत्र चर अथवा चंचल प्रकृति के होते हैं | मोटरकार चलाना या खरीदना, घुड़सवारी करना, यात्रा करना आदि गतिशील कार्यों के लिए शुभ रहते हैं |
३. क्रूर(उग्र) नक्षत्र : भरनी, मघा, पूर्वा-फाल्गुनी, पूर्वा-आषाढ़, पूर्वा-भाद्रपद, (२,१०,११,२०,२५) ये पांच नक्षत्र क्रूर अथवा उग्र प्रकृति के होते हैं | सर्जरी करना, भट्टे लगाना, अस्त्र-शस्त्र चलाना व्यापार करना, खोज कार्य करना, शोध कार्य करना, मारपीट करना, आग जलाना, आदि के लिए शुभ रहते हैं |
४. मिश्र (साधारण) नक्षत्र : कृतिका, विशाखा,(३,१६) ये दो नक्षत्र मिश्र अथवा साधारण प्रकृति के होते हैं | बिजली सम्बन्धी कार्य, दवाई बनाने का कार्य, लोहा भट्टी, गैस भट्टी, भाप इंजन आदि के कार्य करने शुभ रहते हैं |
५. लघु नक्षत्र : अश्विनी, पुष्य, हस्त,(१,८,१३,) ये तीन नक्षत्र लघु प्रकृति के होते हैं | नाटक, नौटंकी,रूपसज्जा, गायन, दूकान,शिक्षा,लेखन,प्रकाशन, आभूषण, आदि के कार्यों को करने के लिए शुभ रहते हैं |
६. मृदु (मित्रवत) नक्षत्र : मृगशिरा,चित्रा, अनुराधा, रेवती,(५,१४,१७,२७) ये चार नक्षत्र मृदु अथवा मित्रवत प्रकृति के होते हैं | कपडे बनाना, सिलाई कार्य,खेल, आभूषण बनवाना, सेवा कार्य,व्यापार,सत्संग आदि कार्य करना शुभ रहते हैं |
७. तीक्ष्ण (दारुण) नक्षत्र : आद्रा,आश्लेषा,ज्येष्ठा, मूल,(६,९,१८,१९) ये चार नक्षत्र तीक्ष्ण अथवा दुखदायी प्रकृति के होते हैं |लड़ाई-झगड़े करना, जानवरों को वश में करना, कोई हानिकारक कार्य करना, जादू-टोना करना आदि कार्य शुभ रहते हैं |
शुभाशुभ फल के आधार पर नक्षत्रों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है |
१. शुभ फलदायी नक्षत्र : १,४,८,१२,१३,१४,१७,२१,२२,२३,२४,२६,२७, कुल १३ नक्षत्र शुभ फलदायी होते हैं |
२. मध्यम फलदायी नक्षत्र : ५,७,१०,१६, कुल चार नक्षत्र मध्यम फलदायी होते हैं |
३. अशुभ फलदायी नक्षत्र : २,३,६,९,११,१५,१८,१९,२०,२५, कुल १० नक्षत्र अशुभ फलदायी होते हैं |
चोरी गयी वस्तु प्राप्ति अथवा अप्राप्ति के आधार पर नक्षत्रों को चार भागों में बाँटा गया है :
१. अंध लोचन नक्षत्र : ४,७,१२,१६,२०,२३,२७, ये सात अंध लोचन नक्षत्र कहलाते हैं | इन नक्षत्रों में खोई या चोरी गई वस्तु पूर्व दिशा में जाती या होती है एवं शीघ्र/ जल्दी मिल जाती है |
२. मंद लोचन नक्षत्र :१,५,९,१३,१७,२१,२४, ये सातनक्षत्र मंद लोचन नक्षत्र कहलाते हैं | खोई हुई वस्तु या चोरी गई वस्तु पश्चिम दिशा में जाती या होती है एवं प्रयत्न करने पर मिल जाती है |
३. मध्य लोचन नक्षत्र :२,६,१०,१४,१८,२५, ये छः नक्षत्र मध्य लोचन नक्षत्र कहलाते हैं | इन नक्षत्रों में चोरी गई या खोई वस्तु दक्षिण दिशा में जाती या होती है तथा सूचना मिलने या मालूम होने पर भी नहीं मिलती है |
४. सुलोचन नक्षत्र :३,८,११,१५,१९,२२,२६, ये सात नक्षत्र सुलोचन नक्षत्र कहलाते हैं | इन नक्षत्रों में चोरी गई या खोई वस्तु उत्तर दिशा में जाती या होती है | उत्तर दिशा में जाने वाली वस्तु की न तो कोई जानकारी या सूचना मिलती है और न ही वो वस्तु वापिस मिलती है |

Monday, 9 November 2020

विवाह कहां होगी शंका समाधान

 *ज्योतिष चर्चा*

*कन्या विवाह संबंधित शंका समाधान*

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*विवाह कहां होगा* 


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माता-पिता अपनी कन्या का विवाह करने के लिए वर की कुंडली का गुण मिलान करते हैं। कन्या के भविष्य के प्रति चिंतित माता-पिता का यह कदम उचित है। किंतु, इसके पूर्व उन्हें यह देखना चाहिए कि लड़की का विवाह किस उम्र में, किस दिशा में तथा कैसे घर में होगा? उसका पति किस वर्ण का, किस सामाजिक स्तर का तथा कितने भाई-बहनों वाला होगा? लड़की की जन्म लग्न कुंडली से उसके होने वाले पति एवं ससुराल के विषय में सब कुछ स्पष्टतः पता चल सकता है। ज्योतिष विज्ञान में फलित शास्त्र के अनुसार लड़की की जन्म लग्न कुंडली में लग्न से सप्तम भाव उसके जीवन, पति, दाम्पत्य जीवन तथा वैवाहिक संबंधों का भाव है। इस भाव से उसके होने वाले पति का कद, रंग, रूप, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय या कार्यक्षेत्र, परिवार से संबंध कि आदि की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यहां सप्तम भाव के आधार पर कन्या के विवाह से संबंधित विभिन्न तथ्यों का विश्लेषण प्रस्तुत है।


ससुराल की दूरी:

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सप्तम भाव में अगर वृष, सिंह, वृश्चिक या कुंभ राशि स्थित हो, तो लड़की की शादी उसके जन्म स्थान से 90 किलोमीटर के अंदर ही होगी। यदि सप्तम भाव में चंद्र, शुक्र तथा गुरु हों, तो लड़की की शादी जन्म स्थान के समीप होगी। यदि सप्तम भाव में चर राशि मेष, कर्क, तुला या मकर हो, तो विवाह उसके जन्म स्थान से 200 किलोमीटर के अंदर होगा। अगर सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि स्थित हो, तो विवाह जन्म स्थान से 80 से 100 किलोमीटर की दूरी पर होगा। यदि सप्तमेश सप्तम भाव से द्वादश भाव के मध्य हो, तो विवाह विदेश में होगा या लड़का शादी करके लड़की को अपने साथ लेकर विदेश चला जाएगा।


शादी की आयु:

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यदि जातक या जातका की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में सप्तमेश बुध हो और वह पाप ग्रह से प्रभावित न हो, तो शादी 13 से 18 वर्ष की आयु सीमा में होता है। सप्तम भाव में सप्तमेश मंगल पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो शादी 18 वर्ष के अंदर होगी। शुक्र ग्रह युवा अवस्था का द्योतक है। सप्तमेश शुक्र पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो 25 वर्ष की आयु में विवाह होगा। चंद्रमा सप्तमेश होकर पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो विवाह 22 वर्ष की आयु में होगा। बृहस्पति सप्तम भाव में सप्तमेश होकर पापी ग्रहों से प्रभावित न हो, तो शादी 27-28 वें वर्ष में होगी। सप्तम भाव को सभी ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तथा सप्तम भाव में शुभ ग्रह से युक्त हो कर चर राशि हो, तो जातिका का विवाह दी गई आयु में संपन्न हो जाता है। यदि किसी लड़की या लड़के की जन्मकुंडली में बुध स्वराशि मिथुन या कन्या का होकर सप्तम भाव में बैठा हो, तो विवाह बाल्यावस्था में होगा।


विवाह वर्ष ज्ञात करने की ज्योतिषीय विधि:

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आयु के जिस वर्ष में गोचरस्थ गुरु लग्न, तृतीय, पंचम, नवम या एकादश भाव में आता है, उस वर्ष शादी होना निश्चित समझना चाहिए। परंतु शनि की दृष्टि सप्तम भाव या लग्न पर नहीं होनी चाहिए। अनुभव में देखा गया है कि लग्न या सप्तम में बृहस्पति की स्थिति होने पर उस वर्ष शादी हुई है।


विवाह कब होगा यह जानने की दो विधियां यहां प्रस्तुत हैं। जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में स्थित राशि अंक में 10 जोड़ दें। योगफल विवाह का वर्ष होगा। सप्तम भाव पर जितने पापी ग्रहों की दृष्टि हो, उनमें प्रत्येक की दृष्टि के लिए 4-4 वर्ष जोड़ योगफल विवाह का वर्ष होगा।


जहां तक विवाह की दिशा का प्रश्न है, ज्योतिष के अनुसार गणित करके इसकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। जन्मांग में सप्तम भाव में स्थित राशि के आधार पर शादी की दिशा ज्ञात की जाती है। उक्त भाव में मेष, सिंह या धनु राशि एवं सूर्य और शुक्र ग्रह होने पर पूर्व दिशा, वृष, कन्या या मकर राशि और चंद्र, शनि ग्रह होने पर दक्षिण दिशा, मिथुन, तुला या कुंभ राशि और मंगल, राहु, केतु ग्रह होने पर पश्चिम दिशा, कर्क, वृश्चिक, मीन या राशि और बुध और गुरु ग्रह होने पर उत्तर दिशा की तरफ शादी होगी। अगर जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो और उस भाव पर अन्य ग्रह की दृष्टि न हो, तो बलवान ग्रह की स्थिति राशि में शादी की दिशा समझनी चाहिए। एक अन्य नियम के अनुसार शुक्र जन्म लग्न कुंडली में जहां कहीं भी हो, वहां से सप्तम भाव तक गिनें। उस सप्तम भाव की राशि स्वामी की दिशा में शादी होनी चाहिए। जैसे अगर किसी कुंडली में शुक्र नवम भाव में स्थित है, तो उस नवम भाव से सप्तम भाव तक गिनें तो वहां से सप्तम भाव वृश्चिक राशि हुई। इस राशि का स्वामी मंगल हुआ। मंगल ग्रह की दिशा दक्षिण है। अतः शादी दक्षिण दिशा में करनी चाहिए।


पति कैसा मिलेगा:

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ज्योतिष विज्ञान में सप्तमेश अगर शुभ ग्रह (चंद्रमा, बुध, गुरु या शुक्र) हो या सप्तम भाव में स्थित हो या सप्तम भाव को देख रहा हो, तो लड़की का पति सम आयु या दो-चार वर्ष के अंतर का, गौरांग और सुंदर होना चाहिए। अगर सप्तम भाव पर या सप्तम भाव में पापी ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु या केतु का प्रभाव हो, तो बड़ी आयु वाला अर्थात लड़की की उम्र से 5 वर्ष बड़ी आयु का होगा। सूर्य का प्रभाव हो, तो गौरांग, आकर्षक चेहरे वाला, मंगल का प्रभाव हो, तो लाल चेहरे वाला होगा। शनि अगर अपनी राशि का उच्च न हो, तो वर काला या कुरूप तथा लड़की की उम्र से काफी बड़ी आयु वाला होगा। अगर शनि उच्च राशि का हो, तो, पतले शरीर वाला गोरा तथा उम्र में लड़की से 12 वर्ष बड़ा होगा।


सप्तमेश अगर सूर्य हो, तो पति गोल मुख तथा तेज ललाट वाला, आकर्षक, गोरा सुंदर, यशस्वी एवं राजकर्मचारी होगा। चंद्रमा अगर सप्तमेश हो, तो पति शांत चित्त वाला गौर वर्ण का, मध्यम कद तथा, सुडौल शरीर वाला होगा। मंगल सप्तमेश हो, तो पति का शरीर बलवान होगा। वह क्रोधी स्वभाव वाला, नियम का पालन करने वाला, सत्यवादी, छोटे कद वाला, शूरवीर, विद्वान तथा भ्रातृ-प्रेमी होगा तथा सेना, पुलिस या सरकारी सेवा में कार्यरत होगा।


पति कितने भाई-बहनों वाला होगा:

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लड़की की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव से तृतीय भाव अर्थात नवम भाव उसके पति के भाई-बहन का स्थान होता है। उक्त भाव में स्थित ग्रह तथा उस पर दृष्टि डालने वाले ग्रह की संख्या से 2 बहन, मंगल से 1 भाई व 2 बहन, बुध से 2 भाई 2 बहन वाला कहना चाहिए। लड़की की जन्मकुंडली में पंचम भाव उसके पति के बड़े भाई-बहन का स्थान है। पंचम भाव में स्थित ग्रह तथा दृष्टि डालने वाले ग्रहों की कुल संख्या उसके पति के बड़े भाई-बहन की संख्या होगी। पुरुष ग्रह से भाई तथा स्त्री ग्रह से बहन समझना चाहिए।


पति का मकान कहां एवं कैसा होगा:

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लड़की की जन्म लग्न कुंडली में उसके लग्न भाव से तृतीय भाव पति का भाग्य स्थान होता है। इसके स्वामी के स्वक्षेत्री या मित्रक्षेत्री होने से पंचम और राशि वृद्धि से या तृतीयेश से पंचम जो राशि हो, उसी राशि का श्वसुर का गांव या नगर होगा। प्रत्येक राशि में 9 अक्षर होते हैं। राशि स्वामी यदि शत्रुक्षेत्री हो, तो प्रथम, द्वितीय अक्षर, सम राशि का हो, तो तृतीय, चतुर्थ अक्षर मित्रक्षेत्री हो, तो पंचम, षष्ठम अक्षर, अपनी ही राशि का हो तो सप्तम, अष्टम अक्षर, उच्च क्षेत्री हो, तो नवम अक्षर प्रसिद्ध नाम होगा। तृतीयेश के शत्रुक्षेत्री होने से जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि ससुराल या भवन की होगी। यदि तृतीय से शत्रु राशि में हो और तृतीय भाव में शत्रु राशि में पड़ रहा हो ,तो दसवी राशि ससुर के गांव की होगी। लड़की की कुंडली में दसवां भाव उसके पति का भाव होता है। दशम भाव अगर शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, या दशमेश से युक्त या दृष्ट हो, तो पति का अपना मकान होता है। राहु, केतु, शनि, से भवन बहुत पुराना होगा। मंगल ग्रह में मकान टूटा होगा। सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु एवं शुक्र से भवन सुंदर, सीमेंट का दो मंजिला होगा। अगर दशम स्थान में शनि बलवान हो, तो मकान बहुत विशाल होगा।


पति की नौकरी:

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लड़की की जन्म लग्न कुंडली में चतुर्थ भाव पति का राज्य भाव होता है। अगर चतुर्थ भाव बलयुक्त हो और चतुर्थेश की स्थिति या दृष्टि से युक्त सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र की स्थिति या चंद्रमा की स्थिति उत्तम हो, तो नौकरी का योग बनता है।


पति की आयु:

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लड़की के जन्म लग्न में द्वितीय भाव उसके पति की आयु भाव है। अगर द्वितीयेश शुभ स्थिति में हो या अपने स्थान से द्वितीय स्थान को देख रहा हो, तो पति दीर्घायु होता है। अगर द्वितीय भाव में शनि स्थित हो या गुरु सप्तम भाव, द्वितीय भाव को देख रहा हो, तो भी पति की आयु 75 वर्ष की होती है।

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Saturday, 8 August 2020

महामृत्युंजय मंत्र जप करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है

 Astha Jyotish Asansol

Vastu Guru Mkpoddar

ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !! 

कौन कैसे पढ़े महामृत्युंजय मंत्र

महामृत्युंजय के अलग-अलग मंत्र हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार जो भी मंत्र चाहें चुन लें और नित्य पाठ में या आवश्यकता के समय प्रयोग में लाएँ। मंत्र निम्नलिखित हैं-

तांत्रिक बीजोक्त मंत्र- ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ ॥ ( साधकों के लिए)

संजीवनी मंत्र : ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूर्भवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनांन्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ। ( व्यापारियों, विद्यार्थियों और नौकरीपेशा लोगों के लिए विशेष फलदायी)

कालजयी मंत्र: ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥ ( समस्त गृहस्थों के लिए। विशेषकर रोगों से और कष्टों से मुक्ति के लिए)

रोगों से मुक्ति के लिए बीज मंत्र

रोगों से मुक्ति के लिए यूं तो महामृत्युंजय मंत्र विस्तृत है लेकिन आप बीज मंत्र के स्वस्वर जाप करके रोगों से मुक्ति पा सकते हैं। इस बीज मंत्र को जितना तेजी से बोलेंगे आपके शरीर में कंपन होगा और यही औषधि रामबाण होगी। जाप के बाद शिवलिंग पर काले तिल और सरसो का तेल ( तीन बूंद) चढाएं।

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ॐ हौं जूं सः ( तीन माला)  

महामृत्युंजय मंत्र: रखें सावधानी  

1. महामंत्र का उच्चारण शुद्ध रखें

2. एक निश्चित संख्या में जप करें।

3. मंत्र का मानसिक जाप करें।

4. पूरे विधि-विधान और धूप-दीप के साथ जाप करें

5. रुद्राक्ष की माला पर ही जप करें।

6. माला को गोमुखी में रखें।

7. जप काल में महामृत्युंजय यंत्र की पूजा करें।

8. महामृत्युंजय के जप कुशा के आसन पर बैठकर करें।

9. जप काल में दुग्ध मिले जल से शिवजी का अभिषेक करते रहें।

10. महामृत्युंजय मंत्र का जाप पूर्व दिशा की तरफ मुख करके ही करें।
 11. जितने दिन जप करें इस समय ब्ररहामचर का पालन करें।

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Thursday, 6 August 2020

Kundli में उच्च शिक्षा प्राप्ति योग

 ॐ।

🙏जय माता दी🙏

Vastu Guru //Mk Poddar//

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कुंडली मे उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए ग्रह योग के बारे में बता रहा हूँ आप अपनी कुंडली से देख कर पता कर सकते है ।

1-यदि गुरु केंद्र(1,4,7व 10) में हो तो जातक बुद्धिमान होता है। गुरु उच्च अथवा स्वग्रही हो तो और अच्छा फल देता है।

2-पंचम भाव में सूर्य सिंह राशि में हो तो जातक मनोनुकूल शिक्षा पूर्ण करता है।

3-बुध पंचम में हो तथा पंचमेश बली होकर केंद्र में स्थित हो तथा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक बुद्धिमान होता है।

4-पंचमेश उच्च का केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो तो जातक पूर्ण शिक्षा पाता है।

5-गुरु शुक्र व बुध यदि केंद्र व त्रिकोण में एक साथ या अलग-अलग स्थित हों तथा गुरु उच्च, स्वग्रही या मित्र क्षेत्र में हो तो सरस्वती योग बनता है। ऐसे जातक पर सरस्वती की विशेष कृपा होती है।

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6-दशमेश व पंचमेश का स्थान परिवर्तन अर्थात् दशम भाव का स्वामी पंचम में तथा पंचम भाव का स्वामी दशम में हो तो व्यक्ति अच्छी शिक्षा प्राप्त करता है।

7-बुध, चंद्रमा व मंगल पर शुक्र या गुरु की दृष्टि हो तो भी जातक बड़ा बुद्धिमान होता है।

8-पंचम भाव में गुरु हो तो जातक अनेक शास्त्रों का ज्ञाता पुत्र व मित्रों से समृद्ध, बुद्धिमान व धैर्यवान होता है।

9-लग्नेश यदि 12वें या 8वें भाव में हो तो जातक सिद्धि प्राप्त करता है और वह विद्या विशारद होता है।

10-चतुर्थेश सप्तम व लग्न में हो तो जातक बहुत सी विद्या का ज्ञाता होता है।

11-चंद्रमा से गुरु त्रिकोण में हो, बुध से मंगल त्रिकोण में और गुरु से बुध एकादश स्थान में हो तो जातक अच्छी शिक्षा प्राप्त करके बहुत सा धन अर्जन करता है।

12-शिक्षा प्राइज़ में सूर्य चंद्र, बुध, गुरु, मंगल व शनि ग्रह की विशेष भूमिका है। इसके अतिरिक्त लग्नेश, पंचमेश व नवमेश तथा इन भावों का विश्लेषण भी उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु करना चाहिए। लग्नेश निर्बल हुआ तो बुद्धि व भाग्य व्यर्थ हो जाएंगे, यदि पंचम भाव निर्बल हुआ तो शरीर और भाग्य क्या करेंगे और यदि भाग्य कमजोर हुआ तो शरीर व बुद्धि व्यर्थ होंगे।

13-पंचमेश शुभ ग्रह हो और पंचमेश का नवांशपति भी शत्रु ग्रहों से युत व दृष्टा न हो तो उच्च शिक्षा प्राप्त होती है।

14-गुरु केंद्र या त्रिकोण में होकर शनि, राहु, केतु से युत या दृष्ट हो तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त कर विद्वान बनता है।

15-गुरु द्वितीयेश होकर बलवान सूर्य व शुक्र से दृष्ट हो तो जातक व्याकरण शास्त्र का ज्ञाता होता है।

16-पंचम भाव व पंचमेश बुध व मंगल के प्रभाव में हो तो जातक व्?यापार संबंधी उच्?च शिक्षा प्राप्त करता है।

17-धन भाव में मंगल शुभ ग्रहों से दृष्ट हो या धनभाव में चंद्र, मंगल की युति हो व बुध द्वारा दृष्ट हो तो जातक गणित विषय का ज्ञाता होता है।

18-यदि द्वितीयेश से 8वें, 12वें शुभ ग्रह हों तो जातक प्रखर विद्वान होता है।

19-लग्नेश, पंचमेश, नवमेश में परस्?पर युति या दृष्टि संबंध हो तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करता है।

20-गुरु व चंद्रमा एक-दूसरे के घर में हो तो चंद्रमा पर गुरु की दृष्टि हो तो सरस्वती योग होता है, जिससे जातक साहित्य, कला व काव्य में उच्च शिक्षा पाकर लोकप्रिय होता है।

21- गुरु लग्न में हो तथा चंद्र से तृतीय सूर्य, मंगल, बुध हो तो जातक विज्ञान विषय में उच्च शिक्षा पाकर वैज्ञानिक बनता है।

22-यदि मेष लग्न हो और पंचम में बुध तथा सूर्य पर गुरु की दृष्टि पड़े तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

23-यदि वृष लग्न हो और उसमें सूर्य बुध की युति लग्न, चतुर्थ या अष्टम में हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

24-यदि मिथुन लग्न हो और लग्न में शनि, तृतीय में शुक्र तथा नवम में गुरु स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

25-यदि कर्क लग्न हो और उसमें लग्न में बुध, गुरु व शुक्र की युति हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

26-यदि सिंह लग्न हो और मंगल-गुरु की युति चतुर्थ, पंचम या एकादश भाव में हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

27-यदि कन्या लग्न हो और उसमें एकादश भाव में गुरु, चंद्र तथा नवम भाव में बुध स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

28-यदि तुला लग्न हो और अष्टम में शनि गुरु द्वारा दृष्ट हो तथा नवम में बुध स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

29-यदि वृश्चिक लग्न हो और उसमें बुध सूर्य हो तथा नवम भाव में गुरु चंद्र स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

30- यदि धनु लग्न हो और उसमें गुरु हो तथा पंचम में मंगल व चंद्र स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

31- यदि मकर लग्न हो और उसमें शुक्र-मंगल की युति हो तथा पंचम भाव में चंद्र गुरु द्वारा दृष्ट हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

32- यदि कुंभ लग्न और एकादश भाव में चंद्र तथा षष्ठ भाव में गुरु स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

33- यदि मीन लग्न हो और उसमें गुरु षष्ठ, शुक्र अष्ठम, शनि नवम तथा मंगल-चंद्र एकादश भाव में हों तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

(आप अपनी कुण्डली में उक्त योगों को विचारकर शिक्षा संबंधी विश्लेषण कर सकते हैं।)गुरु कृपा केवलं।।WP. 9333112719 🙏

Monday, 3 August 2020

इन वास्तु दोष के कारण होती है, (मधुमेह)/Daivitig शुगर की बीमारी

यदि भवन का निर्माण कार्य वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत करने पर, उस स्थान पर निवास एवं कार्य करने वाले व्यक्तियों के विचार तथा कार्यशैली निश्चित ही दुष्पभावी होगी। जिसके कारण मानसिक अशांति एवं परेशानियाँ बढ़ जायेंगी। इन पांच तत्वों के उचित संतुलन एवं तालमेल के अभाव में शारीरिक स्वास्थ्य तथा बुद्धि भी विचलित हो जाती है।
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ज्योतिष और वास्तु समाधान Vastu Guru_ Mk.
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मधुमेह /डायबिटीज निवारण हेतु के लिए वास्तु नियम–
वास्तु शास्त्र प्राचीन वैज्ञानिक जीवन शैली है वास्तु विज्ञान सम्मत तो है ही साथ ही वास्तु का सम्बन्ध ग्रह नक्षत्रों एवम धर्म से भी है ग्रहों के अशुभ होने तथा वास्तु दोष विद्यमान होने से व्यक्ति को बहुत भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ता है. वास्तु शास्त्र अनुसार पंच तत्वों पृथ्वी,जल,अग्नि,आकाश और वायु तथा वास्तु के आठ कोण दिशाए एवम ब्रह्म स्थल केन्द्र को संतुलित करना अति आवश्यक होता है जिससे जीवन हमारा एवं परिवार सुखमय रह सके.

चिकित्सा शास्त्र में बहुत से लक्षण सुनने और देखने में मिलते है लेकिन वास्तु शास्त्र में बिलकुल स्पष्ट है कि घर/भवन का दक्षिण-पश्चिम भाग अर्थात नैऋत्य कोण ही इस रोग का जनक बनता है देखिये कैसे—
( कुछ प्रमुख वास्तुदोष जिनके कारण मधुमेह/शुगर या डायबिटीज का रोग हो सकता हें)….

—- दक्षिण-पश्चिम कोण में कुआँ,जल बोरिंग या भूमिगत पानी का स्थान मधुमेह बढाता है।
—–दक्षिण-पश्चिम कोण में हरियाली बगीचा या छोटे छोटे पोधे भी शुगर का कारण है।
—–घर/भवन का दक्षिण-पश्चिम कोना बड़ा हुआ है तब भी शुगर आक्रमण करेगी।
—–यदि दक्षिण-पश्चिम का कोना घर में सबसे छोटा या सिकुड भी हुआ है तो समझो मधुमेह का द्वार खुल गया।
——दक्षिण-पश्चिम भाग घर या वन की ऊँचाई से सबसे नीचा है मधुमेह बढेगी. इसलिए यह भाग सबसे ऊँचा रखे।
——-दक्षिण-पश्चिम भाग में सीवर का गड्ढा होना भी शुगर को निमंत्रण देना है।
——ब्रह्म स्थान अर्थात घर का मध्य भाग भारी हो तथा घर के मध्य में अधिक लोहे का प्रयोग हो या ब्रह्म भाग से जीना सीडीयां ऊपर कि और जा रही हो तो समझ ले कि मधुमेह का घर में आगमन होने जा रहा हें अर्थात दक्षिण-पश्चिम भाग यदि आपने सुधार लिया तो काफी हद तक आप असाध्य रोगों से मुक्त हो जायेगे..

मधुमेह/शुगर या डायबिटीज के उपचार के लिए वास्तु नियम—
——अपने भूखंड और भवन के बीच के स्थान में कोई स्टोर, लोहे का जाल या बेकार का सामान नही होना चाहिए, अपने घर क़ी उत्तर-पूर्व दिशा में नीले फूल वाला पौधा लगाये..
——अपने बेडरूम में कभी भी भूल कर भी खाना ना खाए।
——अपने बेडरूम में जूते चप्पल नए या पुराने बिलकुल भी ना रखे।
——मिटटी के घड़े का पानी का इस्तेमाल करे तथा घडे में प्रतिदिन सात तुलसी के पत्ते डाल कर उसे प्रयोग करे।
—–दिन में एक बार अपनी माता के हाथ का बना हुआ खाना अवश्य खाए।
—–अपने पिता को तथा जो घर का मुखिया हो उसे पूर्ण सम्मान दे।
——प्रत्येक मंगलवार को अपने मित्रों को मिष्ठान जरूर दे।
—-वृहस्पति देव की हल्दी की एक गाँठ लेकर एक चम्मच शहद में सिलपत्थर में घिस कर सुबह खाली पेट पीने से मधुमेह से मुक्त हो सकते है।
——रविवार भगवान सूर्य को जल दे कर यदि बन्दरों को गुड खिलाये तो आप स्वयं अनुभव करेंगे की मधुमेह शुगर कितनी जल्दी जा रही है।
——ईशानकोण से लोहे की सारी वस्तुए हटा ले।
इन सब के करने से आप मधुमेह मुक्त हो सकते है.
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डायबिटीज का ज्योतिषीय उपचार—
मधुमेह (डायबिटीज) एक वंशानुगत रोग भी है। शरीर में जब इंसुलिन की कमी हो जाती है, तो यह रोग होता है। दवाओं से इसको काबू किया जा सकता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जलीय राशि कर्क, वृश्चिक या मीन एवं शुक्र की राशि तुला में दो अथवा अधिक पापी ग्रह हों तो इस रोग की आशंका होती है। शुक्र के साथ ही बृहस्पति या चंद्रमा के दूषित होने, त्रिक् भाव में होने तथा शत्रु राशि या क्रूर ग्रहों (राहु, शनि, सूर्य व मंगल) से दृष्ट होने से भी यह रोग होता है।
अनुभूत ग्रह स्थितियां :—-
कई बार ऐसे जातक भी देखने में आए हैं जिनकी कुंडली में लग्न पर शनि-केतु की पाप दृष्टि होती है। चतुर्थ स्थान में वृश्चिक राशि में शुक्र-शनि की युति, मीन पर सूर्य व मंगल की दृष्टि और तुला राशि पर राहु स्थित होकर चंद्रमा पर दृष्टि रखे, ऐसे में जातक प्रतिष्ठित, लेकिन डायबिटीज से भी पीड़ित होता है।
प्रमुख कारण :—-
ज्योतिष के अनुसार यदि मीन राशि में बुध पर सूर्य की दृष्टि हो या बृहस्पति लग्नेश के साथ छठे भाव में हो या फिर दशम भाव में मंगल-शनि की युति या मंगल दशम स्थान पर शनि से दृष्ट हो, तो यह रोग होता है। इसके अतिरिक्त लग्नेश शत्रु राशि में, नीच का या लग्न व लग्नेश पाप ग्रहों से दृष्ट हो व शुक्र अष्टम में विद्यमान हो।
कुछ मामलों में चतुर्थ भाव में वृश्चिक राशि मधुमें शनि-शुक्र की 
यदि भवन का निर्माण कार्य वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत करने पर, उस स्थान पर निवास एवं कार्य करने वाले व्यक्तियों के विचार तथा कार्यशैली निश्चित ही दुष्पभावी होगी। जिसके कारण मानसिक अशांति एवं परेशानियाँ बढ़ जायेंगी। इन पांच तत्वों के उचित संतुलन एवं तालमेल के अभाव में शारीरिक स्वास्थ्य तथा बुद्धि भी विचलित हो जाती है।

मधुमेह /डायबिटीज निवारण हेतु के लिए वास्तु नियम–
वास्तु शास्त्र प्राचीन वैज्ञानिक जीवन शैली है वास्तु विज्ञान सम्मत तो है ही साथ ही वास्तु का सम्बन्ध ग्रह नक्षत्रों एवम धर्म से भी है ग्रहों के अशुभ होने तथा वास्तु दोष विद्यमान होने से व्यक्ति को बहुत भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ता है. वास्तु शास्त्र अनुसार पंच तत्वों पृथ्वी,जल,अग्नि,आकाश और वायु तथा वास्तु के आठ कोण दिशाए एवम ब्रह्म स्थल केन्द्र को संतुलित करना अति आवश्यक होता है जिससे जीवन हमारा एवं परिवार सुखमय रह सके.

चिकित्सा शास्त्र में बहुत से लक्षण सुनने और देखने में मिलते है लेकिन वास्तु शास्त्र में बिलकुल स्पष्ट है कि घर/भवन का दक्षिण-पश्चिम भाग अर्थात नैऋत्य कोण ही इस रोग का जनक बनता है देखिये कैसे—
( कुछ प्रमुख वास्तुदोष जिनके कारण मधुमेह/शुगर या डायबिटीज का रोग हो सकता हें)….

—- दक्षिण-पश्चिम कोण में कुआँ,जल बोरिंग या भूमिगत पानी का स्थान मधुमेह बढाता है।
—–दक्षिण-पश्चिम कोण में हरियाली बगीचा या छोटे छोटे पोधे भी शुगर का कारण है।
—–घर/भवन का दक्षिण-पश्चिम कोना बड़ा हुआ है तब भी शुगर आक्रमण करेगी।
—–यदि दक्षिण-पश्चिम का कोना घर में सबसे छोटा या सिकुड भी हुआ है तो समझो मधुमेह का द्वार खुल गया।
——दक्षिण-पश्चिम भाग घर या वन की ऊँचाई से सबसे नीचा है मधुमेह बढेगी. इसलिए यह भाग सबसे ऊँचा रखे।
——-दक्षिण-पश्चिम भाग में सीवर का गड्ढा होना भी शुगर को निमंत्रण देना है।
——ब्रह्म स्थान अर्थात घर का मध्य भाग भारी हो तथा घर के मध्य में अधिक लोहे का प्रयोग हो या ब्रह्म भाग से जीना सीडीयां ऊपर कि और जा रही हो तो समझ ले कि मधुमेह का घर में आगमन होने जा रहा हें अर्थात दक्षिण-पश्चिम भाग यदि आपने सुधार लिया तो काफी हद तक आप असाध्य रोगों से मुक्त हो जायेगे..

मधुमेह/शुगर या डायबिटीज के उपचार के लिए वास्तु नियम—
——अपने भूखंड और भवन के बीच के स्थान में कोई स्टोर, लोहे का जाल या बेकार का सामान नही होना चाहिए, अपने घर क़ी उत्तर-पूर्व दिशा में नीले फूल वाला पौधा लगाये..
——अपने बेडरूम में कभी भी भूल कर भी खाना ना खाए।
——अपने बेडरूम में जूते चप्पल नए या पुराने बिलकुल भी ना रखे।
——मिटटी के घड़े का पानी का इस्तेमाल करे तथा घडे में प्रतिदिन सात तुलसी के पत्ते डाल कर उसे प्रयोग करे।
—–दिन में एक बार अपनी माता के हाथ का बना हुआ खाना अवश्य खाए।
—–अपने पिता को तथा जो घर का मुखिया हो उसे पूर्ण सम्मान दे।
——प्रत्येक मंगलवार को अपने मित्रों को मिष्ठान जरूर दे।
—-वृहस्पति देव की हल्दी की एक गाँठ लेकर एक चम्मच शहद में सिलपत्थर में घिस कर सुबह खाली पेट पीने से मधुमेह से मुक्त हो सकते है।
——रविवार भगवान सूर्य को जल दे कर यदि बन्दरों को गुड खिलाये तो आप स्वयं अनुभव करेंगे की मधुमेह शुगर कितनी जल्दी जा रही है।
——ईशानकोण से लोहे की सारी वस्तुए हटा ले।
इन सब के करने से आप मधुमेह मुक्त हो सकते है.
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डायबिटीज का ज्योतिषीय उपचार—
मधुमेह (डायबिटीज) एक वंशानुगत रोग भी है। शरीर में जब इंसुलिन की कमी हो जाती है, तो यह रोग होता है। दवाओं से इसको काबू किया जा सकता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जलीय राशि कर्क, वृश्चिक या मीन एवं शुक्र की राशि तुला में दो अथवा अधिक पापी ग्रह हों तो इस रोग की आशंका होती है। शुक्र के साथ ही बृहस्पति या चंद्रमा के दूषित होने, त्रिक् भाव में होने तथा शत्रु राशि या क्रूर ग्रहों (राहु, शनि, सूर्य व मंगल) से दृष्ट होने से भी यह रोग होता है।
अनुभूत ग्रह स्थितियां :—-
कई बार ऐसे जातक भी देखने में आए हैं जिनकी कुंडली में लग्न पर शनि-केतु की पाप दृष्टि होती है। चतुर्थ स्थान में वृश्चिक राशि में शुक्र-शनि की युति, मीन पर सूर्य व मंगल की दृष्टि और तुला राशि पर राहु स्थित होकर चंद्रमा पर दृष्टि रखे, ऐसे में जातक प्रतिष्ठित, लेकिन डायबिटीज से भी पीड़ित होता है।
प्रमुख कारण :—-
ज्योतिष के अनुसार यदि मीन राशि में बुध पर सूर्य की दृष्टि हो या बृहस्पति लग्नेश के साथ छठे भाव में हो या फिर दशम भाव में मंगल-शनि की युति या मंगल दशम स्थान पर शनि से दृष्ट हो, तो यह रोग होता है। इसके अतिरिक्त लग्नेश शत्रु राशि में, नीच का या लग्न व लग्नेश पाप ग्रहों से दृष्ट हो व शुक्र अष्टम में विद्यमान हो।
कुछ मामलों में चतुर्थ भाव में वृश्चिक राशि मधुमें शनि-शुक्र की 

यदि भवन का निर्माण कार्य वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत करने पर, उस स्थान पर निवास एवं कार्य करने वाले व्यक्तियों के विचार तथा कार्यशैली निश्चित ही दुष्पभावी होगी। जिसके कारण मानसिक अशांति एवं परेशानियाँ बढ़ जायेंगी। इन पांच तत्वों के उचित संतुलन एवं तालमेल के अभाव में शारीरिक स्वास्थ्य तथा बुद्धि भी विचलित हो जाती है।

मधुमेह /डायबिटीज निवारण हेतु के लिए वास्तु नियम–
वास्तु शास्त्र प्राचीन वैज्ञानिक जीवन शैली है वास्तु विज्ञान सम्मत तो है ही साथ ही वास्तु का सम्बन्ध ग्रह नक्षत्रों एवम धर्म से भी है ग्रहों के अशुभ होने तथा वास्तु दोष विद्यमान होने से व्यक्ति को बहुत भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ता है. वास्तु शास्त्र अनुसार पंच तत्वों पृथ्वी,जल,अग्नि,आकाश और वायु तथा वास्तु के आठ कोण दिशाए एवम ब्रह्म स्थल केन्द्र को संतुलित करना अति आवश्यक होता है जिससे जीवन हमारा एवं परिवार सुखमय रह सके.

चिकित्सा शास्त्र में बहुत से लक्षण सुनने और देखने में मिलते है लेकिन वास्तु शास्त्र में बिलकुल स्पष्ट है कि घर/भवन का दक्षिण-पश्चिम भाग अर्थात नैऋत्य कोण ही इस रोग का जनक बनता है देखिये कैसे—
( कुछ प्रमुख वास्तुदोष जिनके कारण मधुमेह/शुगर या डायबिटीज का रोग हो सकता हें)….

—- दक्षिण-पश्चिम कोण में कुआँ,जल बोरिंग या भूमिगत पानी का स्थान मधुमेह बढाता है।
—–दक्षिण-पश्चिम कोण में हरियाली बगीचा या छोटे छोटे पोधे भी शुगर का कारण है।
—–घर/भवन का दक्षिण-पश्चिम कोना बड़ा हुआ है तब भी शुगर आक्रमण करेगी।
—–यदि दक्षिण-पश्चिम का कोना घर में सबसे छोटा या सिकुड भी हुआ है तो समझो मधुमेह का द्वार खुल गया।
——दक्षिण-पश्चिम भाग घर या वन की ऊँचाई से सबसे नीचा है मधुमेह बढेगी. इसलिए यह भाग सबसे ऊँचा रखे।
——-दक्षिण-पश्चिम भाग में सीवर का गड्ढा होना भी शुगर को निमंत्रण देना है।
——ब्रह्म स्थान अर्थात घर का मध्य भाग भारी हो तथा घर के मध्य में अधिक लोहे का प्रयोग हो या ब्रह्म भाग से जीना सीडीयां ऊपर कि और जा रही हो तो समझ ले कि मधुमेह का घर में आगमन होने जा रहा हें अर्थात दक्षिण-पश्चिम भाग यदि आपने सुधार लिया तो काफी हद तक आप असाध्य रोगों से मुक्त हो जायेगे..

मधुमेह/शुगर या डायबिटीज के उपचार के लिए वास्तु नियम—
——अपने भूखंड और भवन के बीच के स्थान में कोई स्टोर, लोहे का जाल या बेकार का सामान नही होना चाहिए, अपने घर क़ी उत्तर-पूर्व दिशा में नीले फूल वाला पौधा लगाये..
——अपने बेडरूम में कभी भी भूल कर भी खाना ना खाए।
——अपने बेडरूम में जूते चप्पल नए या पुराने बिलकुल भी ना रखे।
——मिटटी के घड़े का पानी का इस्तेमाल करे तथा घडे में प्रतिदिन सात तुलसी के पत्ते डाल कर उसे प्रयोग करे।
—–दिन में एक बार अपनी माता के हाथ का बना हुआ खाना अवश्य खाए।
—–अपने पिता को तथा जो घर का मुखिया हो उसे पूर्ण सम्मान दे।
——प्रत्येक मंगलवार को अपने मित्रों को मिष्ठान जरूर दे।
—-वृहस्पति देव की हल्दी की एक गाँठ लेकर एक चम्मच शहद में सिलपत्थर में घिस कर सुबह खाली पेट पीने से मधुमेह से मुक्त हो सकते है।
——रविवार भगवान सूर्य को जल दे कर यदि बन्दरों को गुड खिलाये तो आप स्वयं अनुभव करेंगे की मधुमेह शुगर कितनी जल्दी जा रही है।
——ईशानकोण से लोहे की सारी वस्तुए हटा ले।
इन सब के करने से आप मधुमेह मुक्त हो सकते है.
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डायबिटीज का ज्योतिषीय उपचार—
मधुमेह (डायबिटीज) एक वंशानुगत रोग भी है। शरीर में जब इंसुलिन की कमी हो जाती है, तो यह रोग होता है। दवाओं से इसको काबू किया जा सकता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जलीय राशि कर्क, वृश्चिक या मीन एवं शुक्र की राशि तुला में दो अथवा अधिक पापी ग्रह हों तो इस रोग की आशंका होती है। शुक्र के साथ ही बृहस्पति या चंद्रमा के दूषित होने, त्रिक् भाव में होने तथा शत्रु राशि या क्रूर ग्रहों (राहु, शनि, सूर्य व मंगल) से दृष्ट होने से भी यह रोग होता है।
अनुभूत ग्रह स्थितियां :—-
कई बार ऐसे जातक भी देखने में आए हैं जिनकी कुंडली में लग्न पर शनि-केतु की पाप दृष्टि होती है। चतुर्थ स्थान में वृश्चिक राशि में शुक्र-शनि की युति, मीन पर सूर्य व मंगल की दृष्टि और तुला राशि पर राहु स्थित होकर चंद्रमा पर दृष्टि रखे, ऐसे में जातक प्रतिष्ठित, लेकिन डायबिटीज से भी पीड़ित होता है।
प्रमुख कारण :—-
ज्योतिष के अनुसार यदि मीन राशि में बुध पर सूर्य की दृष्टि हो या बृहस्पति लग्नेश के साथ छठे भाव में हो या फिर दशम भाव में मंगल-शनि की युति या मंगल दशम स्थान पर शनि से दृष्ट हो, तो यह रोग होता है। इसके अतिरिक्त लग्नेश शत्रु राशि में, नीच का या लग्न व लग्नेश पाप ग्रहों से दृष्ट हो व शुक्र अष्टम में विद्यमान हो।
कुछ मामलों में चतुर्थ भाव में वृश्चिक राशि मधुमें शनि-शुक्र की 

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