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Tuesday, 9 August 2022
रक्षाबंधन 2022 शुभ मुहूर्त कब से है
रक्षाबंधन 2022 शुभ मुहूर्त कब से है
*रक्षाबंधन महापर्व 11 अगस्त 2022*
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आप सभी धर्म प्रेमियों को सादर प्रणाम। रक्षाबंधन के पर्व को लेकर किसी प्रकार का संशय ना रखें हम पूर्व लेख में भी आपको अवगत करा चुके हैं रक्षाबंधन पर्व 11 अगस्त 2022 दिन गुरुवार को ही मनाया जाएगा। क्योंकि रक्षाबंधन पर्व श्रवण नक्षत्र एवं पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। कुछ लोग आप सभी जातकों को भ्रमित करने का पूर्ण प्रयास कर रहे हैं कि रक्षाबंधन पर्व 12 अगस्त को मनाया जाएगा तो मैं आपको पुनः एक बार अवगत कराती हूं 12 अगस्त को पूर्णिमा क्षय है क्योंकि किसी भी पर्व को मनाने के लिए उदया तिथि पर तीन मुहूर्त का होना अति आवश्यक है कई विद्वान आपको यह बोल कर भ्रमित करेंगे कि सूर्योदय से पहले के दो मुहूर्त भी जोड़कर गिना जाएगा परंतु आप स्वयं विचार करें उदया का अर्थ उदय होने से है। यहां यह स्पष्ट होता है सूर्य उदय होने के बाद तीन मुहूर्त होना आवश्यक है परंतु 12 अगस्त को 1:30 मुहूर्त भी पूर्ण नहीं हो रहा है एवं प्रतिपदा तिथि को रक्षाबंधन, उपाकर्म नहीं मनाया जाता। इसके अतिरिक्त श्रवण नक्षत्र भी 12 अगस्त को प्रातः 4:08 पर ही समाप्त हो जाएगा। यहां पर विद्वान जनों को 12 अगस्त रक्षाबंधन एवं उपाकर्म मनाए जाने का तथ्य भी मिथ्या है। तथ्यों को ना जान कर कई विद्वानों द्वारा आपको भद्रा का भय दिखाकर 12 अगस्त को रक्षाबंधन मनाने हेतु बाध्य किया जाएगा। आप सभी को श्लोको के माध्यम से आपको भद्रा की स्थिति को स्पष्ट कराने का प्रयास करूंगा।
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*पीयूष धारा के अनुसार*
*स्वर्गे भद्रा शुभं कुर्यात पाताले च धनागम।*
*मृत्युलोक स्थिता भद्रा सर्व कार्य विनाशनी ।।*
अर्थात भद्रा स्वर्ग लोक में शुभ फल देती हैं पाताल लोक में धन लाभ होता है एवं पृथ्वी लोक पर विनाशकारी कहीं गई है।
*मुहूर्त मार्तण्ड में भी कहा गया है* *“ भद्रा* *सदात्याज्या स्वर्गपातालगा शुभा*”।
अतः यह स्पष्ट है कि मेष, वृष,मिथुन, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु या मकर राशि के चन्द्रमा में भद्रा पड़ रही है तो वह शुभ फल प्रदान करने वाली होती है।।
आप कुछ इस प्रकार भी समझ सकते व्यवहारतः जब कोई वस्तु हमारे पैरों के नीचे हो तो उसका प्रभाव या ऊर्जा निष्क्रिय हो जाता है इसी प्रकार भद्रा भी (हमारे पैरों के नीचे) पाताल लोक में होने से इसका दुष्प्रभाव पृथ्वी लोक पर नहीं पड़ेगा।
*इसके अतिरिक्त रक्षाबंधन पर्व पर गुरुवार पड़ रहा है गुरुवार को सबसे श्रेष्ठ वारों में माना गया है क्योंकि गुरु की दिशा ईशान और ईशान में देवताओं का वास होता है। तथा गुरुवार की भद्रा को पुण्यवती कहा गया है*।
अतः भद्रा से भयभीत ना होकर राहुकाल एवं भद्रा के मुख का समय छोड़कर पूर्णिमा तिथि एवं श्रवण नक्षत्र में रक्षाबंधन एवं उपाकर्म किया जा सकता है।
*राखी का शुभ मुहूर्त*-
11 अगस्त 2022 श्रवण नक्षत्र प्रारंभ प्रातः 6: 53 मिनट से 12 अगस्त 2022 प्रातः 4:08 तक। पूर्णिमा तिथि प्रारंभ 11 अगस्त 2022 प्रातः 10:39 से 12 अगस्त प्रातः 7:06 तक।
रक्षाबंधन हेतु सर्वश्रेष्ठ समय रहेगा *अभिजीत मुहूर्त*
अभिजीत मुहूर्त को समझाने का प्रयास करती हूं।
अभिजीत का सामान्य अर्थ होता है विजय एवं मुहूर्त का अर्थ समय से है। असंख्य दोषों को नष्ट करने का श्रेष्ठ समय। जिसकी स्वामी स्वयं भगवान विष्णु है।
*अभिजीत मुहूर्त रहेगा*
प्रातः 11:59 से दोपहर 12:52 तक।
*राहुकाल*
राहु काल में रक्षाबंधन, उपाकर्म संस्कार ना करें। राहुकाल का समय रहेगा दोपहर 2:05 मिनट से 3 मिनट से 3:45 तक।
भद्रा का मुख काल प्रारंभ होगा सायं 5:51 से मुख काल में रक्षाबंधन उपाकर्म निषेध।
इसके अतिरिक्त जिन जातकों को भद्रा का भय हो वह रात्रि 8:53 से रात्रि 11:00 बजे तक रक्षाबंधन मना सकते हैं। रात्रि 8:52 पर भद्रा समाप्त हो जाएंगे।
*यहां पर एक प्रश्न और आएगा कि रात्रि में राखी नहीं बांधी जाती तो इसका उत्तर में पूर्व में ही देते चलूं निशीथ काल को छोड़कर रक्षाबंधन किया जा सकता है*।
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*रक्षा मंत्र व दिशा*।
रक्षा धागा बांधते समय ध्यान रखें भाई को पूर्व दिशा की ओर बिठाएं। बहन का मुंख पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए। इसके बाद भाई के माथे पर तिलक लगाकर दाहिने हाथ पर रक्षा सूत्र बांधे व इस मंत्र का पाठ करें -:
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल।।
आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं🙏
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Wednesday, 27 July 2022
जन्मकुंडली का कौनसा भाव मजबूत होना जरूरी है
जन्म कुंडली का कौनसा घर(भाव) सबसे मजबूत होना चाहिए, यदि वह कमजोर है तो मजबूत कैसे किया जा सकता हैं।?
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प्रश्न के दो भाग हैं
:१-जन्म पत्रिका में कौन सा भाव सबसे मजबूत होना चाहिए ?
२-यदि वह कमजोर है तो ऐसे भाव को कैसे मजबूत किया जा सकता है?
पहले प्रश्न पर मेरा सुझाव यह है कि सबसे अधिक बली होने की धारणा तर्क संगत नहीं इसके स्थान पर पर्याप्त बली कहना अधिक व्यावहारिक होगा।
★जन्म पत्रिका में लग्न चन्द्रमा और सूर्य ये तीन शरीर,मन और जीवात्मा के प्रतिनिधि होते हैं।
◆क्रम की दृष्टि से लग्न भाव शरीर का प्रतिनिधि होता है ।इसलिए सबसे पहले लग्न भाव ही सबसे अधिक नहीं तो पर्याप्त बली होना चाहिए। क्योंकि यह नींव है जिसके आधार पर जीवन टिका होता है। लग्न से ही ग्रहों की शुभाशुभ प्रकृति तय होती है।
◆दूसरे क्रम में मन का कारक चन्द्रमा है।कहा गया है,मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।। यदि लग्न कमजोर है तो चन्द्रमा पर्याप्त बली होना चाहिए।ऐसी स्थिति में शरीर दुर्बल होने पर भी मन की दृढ़ता के बल पर व्यक्ति जीवन में बहुत कुछ उपलब्ध कर लेता है।
★तीसरे क्रम में आत्मा का कारक सूर्य है।सच तो यह है कि आत्म बल के आगे शरीर और मन की कमजोरी भी उन्नति में आड़े नहीं आ सकती है।
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इस प्रकार तीनो का अपना अपना महत्व है।इसलिए मेरा विचार और अनुभव यही है कि तीनों को पर्याप्त बली होना चाहिए। फिर भी यदि जन्म लग्न, चन्द्र और सूर्य- इन तीनों में से एक भी बली है तो जातक उन्नति कर सकता है।
◆पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार पुरुष की पत्रिका में सूर्य का बली होना आवश्यक जब कि स्त्री की पत्रिका में चन्द्र का बली होना आवश्यक माना गया है।
★प्रश्न का दूसरा भाग यह है कि यदि अपेक्षित भाव कमजोर है तो कैसे मजबूत किया जा सकता है?
★जिस प्रकार दीपक पहले से रखी वस्तु को केवल दिखाता है वैसे ही ग्रह भी पहले के कर्मों के फल को केवल दिखाते हैं।इसलिए ज्योतिष का आधार पुनर्जन्म और कर्मफ़ल का गीता व शास्त्रों में वर्णित कर्मफल सिद्धांत है।
इसलिए यदि—
★1 शरीर भाव को मजबूत करना है तो शरीर की प्रकृति जानना होगी जो लग्न भाव पर वात पित्त कफ त्रिदोष में से किसका प्रभाव अधिक है- इसे देख कर ज्ञात की जा सकती है।
प्रकृति ज्ञात हो जाने पर उसी प्रकृति अनुसार आहार विहार दिनचर्या ,ऋतुचर्या को नियमित करना होगा।
★ व्यक्ति के शरीर की प्रकृति जानने के लिए ज्योतिष बहुत उपयोगी सिद्ध होता है, कैसे ? आइए आप भी जानिए यह सरल है। ज्योतिर्विज्ञान में —
(क) 12 राशियों का अग्नि पृथ्वी वायु जल इन चार तत्व के अनुसार वर्गीकरण है।
(ख) फिर नौ ग्रहों का वात पित्त कफ अनुसार वर्गीकरण है।
(ग) फिर काल पुरुष के अनुसार लग्न में आने वाली राशि के अनुसार शरीर के उस अंग विशेष में व्याधि के प्रति संवेदनाशीलता भी विचारणीय होती है।
•उदाहरण के लिए जैसे कि कर्क लग्न है जो जल तत्त्व प्रधान है तो व्यक्ति को कफ विकार अधिक शीघ्रता से होंगे।
••शनि शीतल वात प्रधान हैऔर लग्न पर इसका भी प्रभाव है तो वातज कफज रोग अधिक संभावित रहेंगे।
जन्मलग्न में जो राशि आ रही है (मेष से सिर, कर्क से छाती,मीन से पैर -इस क्रम से ) वह राशि काल पुरुष के जिस अंग का प्रतिनिधि है, तो व्यक्ति के शरीर का वह अंग अधिक प्रभावित होता है।
◆यह चन्द्रकला नाड़ी का सूत्र है जो मेरे अनुभव के अनुसार शत प्रतिशत सही है।
•जैसे लग्न में धनु राशि है तो धनु कालपुरुष की कमर का प्रतिनिधि होने से व्यक्ति की कमर सम्बन्धी व्याधि के प्रति संवेदनशीलता अधिक होगी । यदि लग्न में कन्या है तो उदर आंतों की व्याधि की संभावना रहेगी पर जैसा ग्रह प्रभाव लग्न पर होगा उसी अनुसार ।
•लग्न यदि अग्नि तत्व के कारक मंगल से प्रभावित तो पित्तज रोग, शस्त्र कष्ट संभावित रहेंगे। इत्यादि।
◆सारांश यह कि लग्न को अर्थात शरीर को बली करना तो उपरोक्त बचाव समझ कर सबसे पहले आयुर्वेदिक प्राकृतिक उपचार करने चाहिए। आहरविहार दिनचर्या इसी व्याधि से बचने के लिए नियमित करना चाहिए
★2 चन्द्र को बली करना है तो उत्साह जनक वातावरण में रहना चाहिए और मन को सदैव प्रसन्न रखने का प्रयास-अभ्यास करना चाहिए।मन को इसतरह से मजबूत बनाने के लिए सबसे सरल , साइडइफेक्ट रहित तरीका यह है कि नित्य 10 से 20 मिनिट प्राणायाम व योगाभ्यास करना चाहिए। इससे मन मजबूत होगा। क्योंकि श्वास से मन का सीधा सम्बन्ध है। ( आपने गौर किया होगा कि क्रोध होने पर साँस बहुत तेज चलती है;मन भारी होने पर व्यक्ति दीर्घ श्वास छोडता है -हाय! हाँ s s ! अरे ! कहते हुए ; शांत चित्त होने पर श्वास बहुत धीमी चलती है। ) इसलिए मन मजबूत होगा तो चन्द्र मजबूत होगा।
★ विशेष ध्यान देने योग्य बात है: मनुष्य केवल शरीर नहीं; मनुष्य केवल मन नहीं। मनुष्य दोनों का जोड़ है- यह 'मनः शरीरी' है psycho somatic है। एक के मजबूत होने से दूसरा भी मजबूत होता है ।
★3 सूर्य को बली करना है तो सूर्योदय समय की लालिमा में खड़े हों। इसके साथ अपने इष्ट देवी-देवता का या गायत्री का या निराकार ब्रह्म का, अपनी अपनी रुचि सामर्थ्य और परम्परा के अनुसार ध्यान करने से आत्म तत्व मजबूत होगा- आत्म तत्व मजबूत हुआ तो जन्मत्रिका का सूर्य मजबूत हुआ समझिए।
इस प्रकार व्यक्ति अपने शरीर ,मन और आत्मतत्व—इन तीनों को मजबूत कर सकता है।
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हो सकता है कि मेरा उत्तर अधिकांश पाठकों को मन माफिक न लगे पर ज्योतिर्विज्ञान से सही मायनों में लाभ लेना है तो यही श्रेष्ठ विधि है अर्थात जिस मार्ग को पूर्वजों ने अपनाया है वही मार्ग श्रेष्ठ है।
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Wednesday, 13 July 2022
संतान योग ग्रह शुभ या अशुभ पंचम भाव से जाने
कौन से ग्रह बाधक बनते है संतान सुख में?
जानें उचित समाधान
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वेदों के अनुसार आत्मा को अजर-अमर कहा गया है। गीता में भी कहा गया है कि, जिस प्रकार मनुष्य फटे हुए जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण कर लेता है। ठीक उसी प्रकार यह जीवात्मा पुराने जीर्ण शरीर को त्यागकर नई देह को धारण कर लेती है। हमारे यहां पुनर्जन्म का सिद्धांत है। हर जीवात्मा अपने पूर्व कर्मों के अनुसार निश्चित मां-बाप के यहां जन्म लेती है और जन्म लेते समय आकाश में ग्रहों और नक्षत्रों की जो स्थिति होती है उस आकाशीय नक्शे के अनुसार व्यक्ति का जीवन निर्धारण होता है। जिसे ज्योतिष शास्त्र जन्मांग या कुंडली का नाम देता है।
एक कुशल ज्योतिषी व्यक्ति के जन्मांग से ज्योतिष के द्वारा उसके भूत, भविष्य, प्रकृति और चरित्र को जान लेता है। जन्मांग व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का दर्पण होता है। कुंडली के बाहर भाव जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से संबंधित रहते हैं लेकिन मैं यहां केवल पंचम भाव से संबंधित संतान क्षेत्र को ही पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं।
बुद्धि, प्रबंध, संतान, मंत्र (गुप्त विचार), गर्भ की स्थिति, नीति आदि शुभाशुभ विचार पंचम भाव से करना चाहिए। पंचम भाव की राशि एवं पंचमेश, पंचमेश किस राशि एवं स्थान में बैठा है तथा उसके साथ कौन-कौन से ग्रह स्थित हैं। पंचम भाव पर किन-किन ग्रहों की दृष्टि है, पुत्र कारक गुरु, नवम भाव तथा नवमेश की स्थिति, नवम भाव पंचम से पंचम होता है।
अत: यह पोते का स्थान भी कहलाता है। पंचम भाव के स्वामी पर किन-किन भावेशों की दृष्टि है, पंचमेश कारक है या अकारक, सौम्य ग्रह है या दृष्ट ग्रह तथा पंचम भाव से संबंधित दशा, अंतर्दशा और प्रत्यंतदशा आदि।
पंचमेश से 5/6/10 में यदि केवल पापग्रह हो तो उसको संतान नहीं होती, हो भी तो जीवित नहीं रहती हैं।
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पंचम भाव में शनि के वर्ग हों तथा उसमें चंद्रमा बैठा हो और रवि अथवा शुक्र से दृष्ट हो तो उसको पौनर्भ व (विधवा स्त्री से विवाह करके उत्पन्न) पुत्र होता है।
पंचम भाव नवमांश पर जितने पापग्रह की दृष्टि हो उतने गर्भ नष्ट होते हैं किन्तु यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो।
पंचम भाव में केवल मंगल का योग हो तो संतान बार-बार होकर मर जाती है। यदि गुरु या शुक्र की दृष्टि हो तो केवल एक संतति नष्ट होती है और अन्य संतति जीवित रहती है। बंध्या योग, काक बंध्या योग, विषय कन्या योग, मृतवत्सा योग, संतित बाधा योग एवं गर्भपात योग स्त्रियों की कुंडली में होकर उन्हें संतान सुख से वंचित कर देते हैं। इस प्रकार के कुछ योग निम्रलिखित हैं :
लगन और चंद्र लगन से पंचम एवं नवम स्थान से पापग्रहों के बैठने से तथा उस पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। लगन, पंचम, नवम तथा पुत्रकारक गुरु पर पाप प्रभाव हो लगन से पंचम स्थान में तीन पाप ग्रहों और उन पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। आठवें स्थान में शनि या सूर्य स्वक्षेत्री हो। तीसरे स्थान पर स्वामी तीसरे ही स्थान में पांचवें या बारहवें में हो और पंचम भाव का स्वामी छठे स्थान में चला गया हो।
जिस महिला जातक की कुंडली में लगन में मंगल एवं शनि इकट्ठे बैठे हों। लगन में मकर या कुम्भ राशि हो। मेष या वृश्चिक हो और उसमें चंद्रमा स्थित हो तथा उस पर पापग्रहों की दृष्टि हो।
पांचवें या सातवें स्थान में सूर्य एवं राहू एक साथ हों। पांचवें भाव का स्वामी बारहवें स्थान में व बारहवें स्थान का स्वामी पांचवें भाव में बैठा हो और इनमें से कोई भी पाप ग्रह की पूर्ण दृष्टि में हो।
आठवें स्थान में शुभ ग्रह स्थित हो साथ ही पांचवें तथा ग्यारहवें घर में पापग्रह हों। सप्तम स्थान में मंगल-शनि का योग हो और पांचवें स्थान का स्वामी त्रिक स्थान में बैठा हो।
पंचम स्थान में मेष या वृश्चिक राशि हो और उसमें राहू की उपस्थिति हो या राहू पर मंगल की दृष्टि हो। शनि यदि पंचम भाव में स्थित हो और चंद्रमा की पूर्ण दृष्टि में हो और पंचम भाव का स्वामी राहू के साथ स्थित हो।
मंगल दूसरे भाव में, शनि तीसरे भाव में तथा गुरु नवम या पंचम भाव में हो तो पुत्र संतान का अभाव होता है। यदि गुरु-राहू की युति हो। पंचम भाव का स्वामी कमजोर हो एवं लग्न का स्वामी मंगल के साथ स्थित हो अथवा लगन में राहू हो, गुरु साथ में हो और पांचवें भाव का स्वामी त्रिक स्थान में चला गया हो।
पंचम भाव में मिथुन या कन्या राशि हो और बंधु मंगल के नवमांश में मंगल के साथ ही बैठ गया हो और राहू तथा गुलिक लगन में स्थित हो। आदि-आदि कई योगों का वर्णन ज्योतिष ग्रंथों में मिलता है जो संतति सुख हानि करता है तथा कुंडली मिलान करते समय सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए इन्हें विचार में लाना अति आवश्यक होता है।
पति या पत्नी में से किसी एक की कुंडली में संतानहीनता योग होता है तो दाम्पत्य जीवन नीरस हो जाता है। अनुभव में यह भी नहीं पाया गया है कि संतानहीनता योग वाली महिला की शादी संतति योग वाले पुरुष के साथ की जाए अथवा संतानहीन योग वाले पुरुष की शादी संतित योगा वाली महिला के साथ की जाए और इस प्रकार का कुयोग दूर हो जाए लेकिन यह कुयोग नहीं कटता और जीवन भर संतान का अभाव बना रहता है। ऐसी स्थिति में ईश कृपा, देव कृपा या संत कृपा ही इस कुयोग को काट सकती है। निम्र उपाय भी संतान सुख देने में सहायक होते हैं।
षष्ठी देवी का जप पूजन एवं स्त्रोत पाठ आदि का अनुष्ठान पुत्रहीन व्यक्ति को सुयोग पुत्र संतान देने में सहायक होता है।
संतान गोपाल मंत्र- ॐ क्लीं ॐ क्लीं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि ने तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ का जप एवं संतान गोपाल स्रोत का नियमित पाठ भी संतति सुख प्रदान करने वाला होता है।
इसके अतिरिक्त भगवान शिव की आराधना एवं जप, पूजा, अनुष्ठान, कन्या दान, गौदान एवं अन्य यंत्र-तंत्र तथा औषधियां अपनाने से भी संतति सुख प्राप्त किया जा सकता है।
गुरु, माता-पिता, ब्राह्मण, गाय आदि की सेवा, पुण्य, दान, यज्ञ आदि संतानहीनता को मिटाने वाले होते हैं।
नवरात्रि में सर्ववाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:। मनुष्यों मत्प्रसादेन भवि यति न संशय:।।
इस मंत्र से दुर्गा सप्तशती का नवचंडी या शतचंडी पाठ का अनुष्ठान भी संतान सुख देता है।
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Wednesday, 15 June 2022
हस्त रेखा के द्वारा जन्म कुण्डली बनाएं आसान टिप्स
हाथ की रेखा देख कर जन्म कुंडली बनाने की विधि
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जानें कैसे....
कभी कभी किसी कारणवश जन्म तारीख और दिन माह वार आदि का पता नही होता है, कितनी ही कोशिशि की जावे लेकिन जन्म तारीख का पता नही चल पाता है, जातक को सिवाय भटकने के और कुछ नही प्राप्त होता है, किसी ज्योतिषी से अगर अपनी जन्म तारीख निकलवायी भी जावे तो वह क्या कहेगा, इसका भी पता नही होता है, इस कारण के निवारण के लिये आपको कहीं और जाने की जरूरत नही है, किसी भी दिन उजाले में बैठकर एक सूक्षम दर्शी सीसा लेकर बैठ जावें, और अपने दोनो हाथों बताये गये नियमों के अनुसार देखना चालू कर दें, साथ में एक पेन या पैंसिल और कागज भी रख लें, तो देखें कि किस प्रकार से अपना हाथ जन्म तारीख को बताता है।
अपनी वर्तमान की आयु का निर्धारण करें
हथेली मे चार उंगली और एक अगूंठा होता है, अंगूठे के नीचे शुक्र पर्वत, फ़िर पहली उंगली तर्जनी उंगली की तरफ़ जाने पर अंगूठे और तर्जनी के बीच की जगह को मंगल पर्वत, तर्जनी के नीचे को गुरु पर्वत और बीच वाली उंगली के नीचे जिसे मध्यमा कहते है, शनि पर्वत, और बीच वाली उंगले के बाद वाली रिंग फ़िंगर या अनामिका के नीचे सूर्य पर्वत, अनामिका के बाद सबसे छोटी उंगली को कनिष्ठा कहते हैं, इसके नीचे बुध पर्वत का स्थान दिया गया है, इन्ही पांच पर्वतों का आयु निर्धारण के लिये मुख्य स्थान माना जाता है, उंगलियों की जड से जो रेखायें ऊपर की ओर जाती है, जो रेखायें खडी होती है, उनके द्वारा ही आयु निर्धारण किया जाता है, गुरु पर्वत से तर्जनी उंगली की जड से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें जो कटी नही हों, बीचवाली उंगली के नीचे से जो शनि पर्वत कहलाता है, से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें, की गिनती करनी है,ध्यान रहे कि कोई रेखा कटी नही होनी चाहिये,शनि पर्वत के नीचे वाली रेखाओं को ढाई से और बृहस्पति पर्वत के नीचे से निकलने वाली रेखाओं को डेढ से, गुणा करें,फ़िर मंगल पर्वत के नीचे से ऊपर की ओर जाने वाली रेखाओं को जोड लें, इनका योगफ़ल ही वर्तमान उम्र होगी।
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अपने जन्म का महिना और सूर्य राशि को पता करने का नियम।
अपने दोनो हाथों की तर्जनी उंगलियों के तीसरे पोर और दूसरे पोर में लम्बवत रेखाओं को २३ से गुणा करने पर जो संख्या आये, उसमें १२ का भाग देने पर जो संख्या शेष बचती है,वही जातक का जन्म का महिना और उसकी राशि होती है, महिना और राशि का पता करने के लिये इस प्रकार का वैदिक नियम अपनाया जा सकता है:-
१-बैशाख-मेष राशि
२.ज्येष्ठ-वृष राशि
३.आषाढ-मिथुन राशि
४.श्रावण-कर्क राशि
५.भाद्रपद-सिंह राशि
६.अश्विन-कन्या राशि
७.कार्तिक-तुला राशि
८.अगहन-वृश्चिक राशि
९.पौष-धनु राशि
१०.माघ-मकर राशि
११.फ़ाल्गुन-कुम्भ राशि
१२.चैत्र-मीन राशि
इस प्रकार से अगर भाग देने के बाद शेष १ बचता है तो बैसाख मास और मेष राशि मानी जाती है,और २ शेष बचने पर ज्येष्ठ मास और वृष राशि मानी जाती है।
हाथ में राशि का स्पष्ट निशान भी पाया जाता है। प्रकृति ने अपने द्वारा संसार के सभी प्राणियों की पहिचान के लिये अलग अलग नियम प्रतिपादित किये है,जिस प्रकार से जानवरों में अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार उम्र की पहिचान की जाती है,उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में दाहिने या बायें हाथ की अनामिका उंगली के नीचे के पोर में सूर्य पर्वत पर राशि का स्पष्ट निशान पाया जाता है। उस राशि के चिन्ह के अनुसार महिने का उपरोक्त तरीके से पता किया जा सकता है।
पक्ष और दिन का तथा रात के बारे में ज्ञान करना।।
वैदिक रीति के अनुसार एक माह के दो पक्ष होते है,किसी भी हिन्दू माह के शुरुआत में कृष्ण पक्ष शुरु होता है,और बीच से शुक्ल पक्ष शुरु होता है,व्यक्ति के जन्म के पक्ष को जानने के लिये दोनों हाथों के अंगूठों के बीच के अंगूठे के विभाजित करने वाली रेखा को देखिये,दाहिने हाथ के अंगूठे के बीच की रेखा को देखने पर अगर वह दो रेखायें एक जौ का निशान बनाती है, तो जन्म शुक्ल पक्ष का जानना चाहिये। और जन्म दिन का माना जाता है, इसी प्रकार अगर दाहिने हाथ में केवल एक ही रेखा हो, और बायें हाथ में अगर जौ का निशान हो तो जन्म शुक्ल पक्ष का और रात का जन्म होता है,अगर दाहिने और बायें दोनो हाथों के अंगूठों में ही जौ का निशान हो तो जन्म कृष्ण पक्ष रात का मानना चाहिये,।
साधारणत: दाहिने हाथ में जौ का निशान शुक्ल पक्ष और बायें हाथ में जौ का निशान कृष्ण पक्ष का जन्म बताता है।
जन्म तारीख की गणना।
मध्यमा उंगली के दूसरे पोर में तथा तीसरे पोर में जितनी भी लम्बी रेखायें हों,उन सबको मिलाकर जोड लें,और उस जोड में ३२ और मिला लें,फ़िर ५ का गुणा कर लें,और गुणनफ़ल में १५ का भाग देने जो संख्या शेष बचे वही जन्म तारीख होती है। दूसरा नियम है कि अंगूठे के नीचे शुक्र क्षेत्र कहा जाता है,इस क्षेत्र में खडी रेखाओं को गुना जाता है,जो रेखायें आडी रेखाओं के द्वारा काटी गयीं हो,उनको नही गिनना चाहिये,इन्हे ६ से गुणा करने पर और १५ से भाग देने पर शेष मिली संख्या ही तिथि का ज्ञान करवाती है,यदि शून्य बचता है तो वह पूर्णमासी का भान करवाती है,१५ की संख्या के बाद की संख्या को कृष्ण पक्ष की तिथि मानी जाती है।
जन्म वार का पता करना।
अनामिका के दूसरे तथा तीसरे पोर में जितनी लम्बी रेखायें हों,उनको ५१७ से जोडकर ५ से गुणा करने के बाद ७ का भाग दिया जाता है,और जो संख्या शेष बचती है वही वार की संख्या होती है। १ से रविवार २ से सोमवार तीन से मंगलवार और ४ से बुधवार इसी प्रकार शनिवार तक गिनते जाते है।
जन्म समय और लगन की गणना।
सूर्य पर्वत पर तथा अनामिका के पहले पोर पर,गुरु पर्वत पर तथा मध्यमा के प्रथम पोर पर जितनी खडी रेखायें होती है,उन्हे गिनकर उस संख्या में ८११ जोडकर १२४ से गुणा करने के बाद ६० से भाग दिया जाता है,भागफ़ल जन्म समय घंटे और मिनट का होता है,योगफ़ल अगर २४ से अधिक का है,तो २४ से फ़िर भाग दिया जाता है। इस तरह घंटे-मि. आदि जन्मादि काल प्राप्त हो जाता है...
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अब इन सभी से सहज और पूर्ण जन्म कुंंडली तैयार करके, जाचक का सटीक फलित भी किया जा सकता है।
Sunday, 12 June 2022
10 भाव से जाने किस क्षेत्र में सफल होंगे
बहुत से लोगों के मन में दुविधा होती है कि उसे
@नौकरी करना चाहिए या कि व्यापार।
@नौकरी में प्राइवेट नौकरी करना चाहिए या सरकारी?
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व्यापार फलीभूत होगा तो कौनसा व्यापार करना चाहिए? इन्हीं प्रश्नों के समाधान के लिए यहां प्रस्तुत है कुछ सामान्य जानकारी।
कुंडली में क्या है नौकरी या व्यापरा का भाव : कहते हैं कि दशभ भाव से पता चलता है कि व्यक्ति क्या करेगा, ग्यारहवें भाव से पता चलता है कि व्यक्ति क्या कमाएगा और दूसरे भाव से पता चलता है कि व्यक्ति कितना बचा पाएगा। कुंडली में दशम भाव से देखा जाता है कि व्यक्ति क्या करेगा।
दशम भाव : दशम भाव के स्वामी को दशमेश या कर्मेश या कार्येश कहते हैं। इस भाव से यह देखा जाता है कि व्यक्ति सरकारी नौकरी करेगा अथवा प्राइवेट, या व्यापार करेगा तो कौन सा, उसे किस क्षेत्र में अधिक सफलता मिलेगी। सप्तम भाव साझेदारी का होता है। इसमें मित्र ग्रह हों तो पार्टनरशिप से लाभ। शत्रु ग्रह हो तो पार्टनरशिप से नुकसान। मित्र ग्रह सूर्य, चंद्र, बुध, गुरु होते हैं। शनि, मंगल, राहु, केतु ये आपस में मित्र होते हैं।
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सूर्य, बुध, गुरु और शनि दशम भाव के कारक ग्रह हैं। दशम भाव में केवल शुभ ग्रह हों तो अमल कीर्ति नामक योग होता है, किंतु उसके अशुभ भावेश न होने तथा अपनी नीच राशि में न होने की स्थिति में ही इस योग का फल मिलेगा। दशमेश के बली होने से जीविका की वृद्धि और निर्बल होने पर हानि होती है। लग्न से द्वितीय और एकादश भाव में बली एवं शुभ ग्रह हो तो जातक व्यापार से अधिक धन कमाता है। धनेश और लाभेश का परस्पर संबंध धनयोग का निर्माण करता है। दशम भाव का कारक यदि उसी भाव में स्थित हो अथवा दशम भाव को देख रहा हो तो जातक को आजीविका का कोई न कोई साधन अवश्य मिल जाता है।
दशम भावस्थ नवग्रह फलः-
सूर्यः- दसवें भाव में स्थित वृश्चिक राशि का सूर्य चिकित्सा अधिकारी बनाता है। मेष, कर्क, सिंह या धनु राशि का सूर्य सेना, पुलिस या आवकारी अधिकारी बनाता है।
चंद्रः- शुभ प्रभाव में बली चंद्र यदि दशमस्थ हो तो धनी कुल की स्त्रियों से लाभ होता है। यदि ऐसा व्यक्ति दैनिक उपयोग में आनेवाली वस्तुओं का व्यापार करे तो लाभप्रद होता है। चंद्र से मंगल या शनि की युति विफलता का सूचक है।
मंगलः- मेष, सिंह, वृश्चिक या धनु राशि का मंगल जातक को प्राइवेट चिकित्सक और सर्जन बनाता है। ऐसे डाक्टरों को मान-सम्मान और धन की प्राप्ति होती है। मंगल का सूर्य से संबंध हो तो व्यक्ति सुनार या लोहार का काम करता है।
बुधः- लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश या दशमेश होकर कन्या या सिंह राशि का बुध गुरु से दृष्ट या युत हो तो व्यक्ति प्रोफेसर या लेक्चरर बनकर धन अर्जित करता है। बुध बैंकर भी बनाता है। बुध शुक्र के साथ या शुक्र की राशि में हो तो जातक फिल्म या विज्ञापन से संबंधित व्यवसाय करता है।
गुरुः- गुरु का संबंध जब नवमेश से हो तो व्यक्ति धार्मिक कार्यों द्वारा धन अर्जित करता है। गुरु मंगल के प्रभाव में हो तो जातक फौजदारी वकील बनता है। बलवान और राजयोगकारक हो तो जातक न्यायाधीश बना देता है।
शुक्रः- जातक सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, फैंसी वस्तुओं आदि का निर्माता/विक्रेता होता है। शुक्र का संबंध द्वितीयेश, पंचमेश या बुध से हो तो गायन-वादन के क्षेत्र में सफलता मिलती है।
शनिः- शनि का संबंध यदि चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से हो तो जातक लोहे, कोयले मिट्टी के तेल आदि के व्यापार से धन कमाता है। बलवान शनि का मंगल से संबंध हो तो जातक इलेक्ट्रीक/इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर होता है। यदि बुध से संबंध हो तो मेकैनिकल इंजीनियर होता है। शनि का राहु से संबंध हो तो व्यक्ति चप्पल, जूते, रेक्सिन बैग, टायर-ट्यूब आदि के व्यापार में सफल होता है।
राहुः- दशम भाव में मिथुन राशि का राहु राजनीति के क्षेत्र में सफलता दिलाता है। ऐसा जातक सेना, पुलिस, रेलवे में या राजनेता के घर नौकरी करता है।
केतुः- धनु या मीन राशि का दशमस्थ केतु व्यापार में सफलता, वैभव, धन और यश का सूचक है। ऊपर वर्णित बिंदुओं के आधार पर अपने अनुकूल आजीविका का निर्णय करें। शुभ/ योगकारक ग्रहों की महादशा में उनसे या जिन ग्रहों से उनका संबंध हो उनसे संबंधित व्यवसाय करने पर अच्छा लाभ होता है। आजीविका हेतु अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मंत्र, यंत्र, रत्न, दान और पूजा अर्चना आदि समय-समय पर करते रहना चाहिए।
1.यदि लग्न सप्तम, दशम भाव का कार्येश हो तब जातक को कारोबार के द्वारा धनार्जन होगा और यदि षष्ठ और दशम का कार्येश हो तो नौकरी से धन अर्जित करेगा।
2.तृतीय भाव का कार्येश हो तो लेखन, छपाई, एजेंसी, कमीशन एजेंट, रिपोर्टर, सेल्समेन और संस्थाओं से धन प्राप्त होगा। मतलब यह कि वह इस क्षेत्र में अपना करियर बनाएगा।
3.अगर द्वितीय और पंचम का कार्येश हो तो जमीन, घर, बगीचे, वाहन और शिक्षा संस्थानों से धन प्राप्त करेगा। इसके अतिरिक्त नाटक, सिनेमा, ढोल, रेस, जुआ, मंत्र, तंत्र और पौरोहित्य कर्म से धन अर्जित करेगा।
4.यदि द्वितीय और सप्तम का कार्येश हो तो विवाह, विवाह मंडल, पार्टनरशिप और कानूनी सलाहकार के कार्य से धन अर्जित करेगा।
5.यदि दशम भाव में एक से अधिक ग्रह हों और उसमें से जो ग्रह सबसे अधिक बलवान होगा जातक उसके अनुसार ही व्यापार करेगा। जैसे दशम भाव में मंगल बलवान हो तो जातक प्रॉपर्टी, निवेश आदि का व्यवसाय करेगा अथवा पुलिस या सेना में जाएगा।
7.यदि दशम भाव में कोई ग्रह न हो तो दशमेश यानी दशम भाव के स्वामी के अनुसार व्यापार तय होगा। यदि दशम भाव में शुक्र हो तो व्यक्ति कॉस्मेटिक्स, सौंदर्य प्रसाधन, ज्वेलरी आदि के कार्यों से लाभ अर्जित करता है। दशम भाव का स्वामी जिन ग्रहों के साथ होता है उनके अनुसार व्यक्ति व्यापार करता है।
8. सूर्य के साथ गुरु हो तो व्यक्ति होटल व्यवसाय, अनाज आदि के कार्य से लाभ कमाता है। एकादश भाव आय स्थान है। इस भाव में मौजूद ग्रहों की स्थिति के अनुसार व्यापार तय किया जाता है।
9.जन्मकुंडली में कोई ग्रह जब लग्नेश, पंचमेश या नवमेश होकर दशम भाव में स्थित हो, या दशमेश होकर किसी भी त्रिकोण (1, 5, 9 भावों) में, या अपने ही स्थान में स्थित हो तो व्यक्ति की आजीविका के पर्याप्त साधन होते हैं। वह व्यवसाय या नौकरी में अच्छी प्रगति करता है। दशमेश या दशम भावस्थ ग्रह का बल और शुभता दोनों उसके शुभफलों में द्विगुणित वृद्धि करते हैं।
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Thursday, 17 February 2022
हस्तरेखा में * निशान होने पर क्या असर होगा
व्यक्ति को बदनामी दिलाता है इस रेखा पर बना निशान
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हस्तरेखा में क्रॉस का निशान भी बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन इस निशान का कुछ पर्वत पर शुभ परिणाम मिलता है तो कुछ पर नकारात्मक। यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्रॉस का चिह्न कहां है। यहां पर हम आपको क्रॉस के निशान और इसके परिणाम के बारे में बताने जा रहे हैं।
-यदि किसी व्यक्ति के गुरु पर्वत पर क्रॉस का निशान है तो यह उसके सुख में बढ़ोतरी करता है। गुरु पर्वत पर क्रॉस का निशान व्यक्ति के जीवनसाथी के शिक्षित एवं धनी कुल से मिलने का इशारा करता है। हस्तरेखा विज्ञान में गुरु पर्वत यानी बृहस्पति पर्वत पर क्रॉस के चिह्न को शुभ माना गया है। बाकी पर्वत पर इसके नकारात्मक परिणाम मिलते हैं।
-यदि क्रॉस का चिह्न शनि पर्वत पर है तो ऐसे व्यक्ति को लड़ाई में चोट लगती है। इस पर्वत पर निशान व्यक्ति को अकाल मृत्यु की ओर ले जाता है।
-सूर्य पर्वत पर क्रॉस का निशान शुभ नहीं माना गया है। यहां क्रॉस का निशान होने से व्यक्ति बदनामी का पात्र बनता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा व्यापार में घाटा बना रहता है।
-बुध पर्वत पर क्रॉस का निशान व्यक्ति को झूठा और धोखेबाज बनाता है। ऐसे लोगों से हमेशा दूर रहना चाहिए।
-केतु पर्वत पर क्रॉस का निशान होना व्यक्ति की शिक्षा में अवरोध को बताता है। बचपन में बीमारी अथवा अन्य किसी कारण से ऐसे व्यक्ति अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते।
-मंगल पर्वत पर क्रॉस का चिह्न होना व्यक्ति को झगड़ालू बनाता है। यह निशान व्यक्ति को जेल तक पहुंचाता है।
(इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं तथा इन्हें अपनाने से अपेक्षित परिणाम मिलेगा। जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)
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